भगवद गीता – अध्याय 9.6 ~ निष्काम भगवद् भक्ति की महिमा का वर्णन  / Bhagwad Geeta Chapter -9 

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अध्याय नौ (Chapter -9)

भगवद गीता – अध्याय 9  में शलोक 26 से  शलोक 34  तक निष्काम भगवद् भक्ति की महिमा का वर्णन !

पत्रं  पुष्पं  फलं   तोयं  यो  मे  भक्त्या  प्रयच्छति । 

       तदहं         भक्त्युपहृतमश्नामि         प्रयतात्मनः ॥ २६ ॥ 

मे   –   मुझको   ;   भक्त्या   –   भक्तिपूर्वक   ;   प्रयच्छति   –   भेंट करता है   ;   अहम्   –  मैं   ; भक्ति-उपहृतम्    –    भक्तिभाव से अर्पित  ;   अश्नामि   –   स्वीकार करता हूँ   ;   प्रयत-आत्मनः   – शुद्धचेतना वाले से   ;   पत्रम्  –  पत्ती   ;   पुष्पम्   –   फूल   ;   फलम्   –  फल   ;   तोयम्  –  जल  ;   यः   –   जो 

यदि कोई प्रेम तथा भक्ति के साथ मुझे पत्र , पुष्प , फल या जल प्रदान करता है , तो मैं उसे स्वीकार करता हूँ । : 

तात्पर्य :- नित्य सुख के लिए स्थायी , आनन्दमय धाम प्राप्त करने हेतु बुद्धिमान व्यक्ति के लिए यह अनिवार्य है कि वह कृष्णभावनाभावित होकर भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति में तत्पर रहे । ऐसा आश्चर्यमय फल प्राप्त करने की विधि इतनी सरल है कि निर्धन से निर्धन व्यक्ति को योग्यता का विचार किये बिना इसे पाने का प्रयास करना चाहिए ।

इसके लिए एकमात्र योग्यता इतनी ही है कि वह भगवान् का शुद्धभक्त हो । इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता कि कोई क्या है और कहाँ स्थित है । यह विधि इतनी सरल है कि यदि प्रेमपूर्वक एक पत्ती , थोड़ा सा जल या फल ही भगवान् को अर्पित किया जाता है तो भगवान् उसे सहर्ष स्वीकार करते हैं । अतः किसी को भी कृष्णभावनामृत से रोका नहीं जा सकता , क्योंकि यह सरल है और व्यापक है ।

ऐसा कौन मूर्ख होगा जो इस सरल विधि से कृष्णभावनाभावित नहीं होना चाहेगा और सच्चिदानन्दमय जीवन की परम सिद्धि नहीं चाहेगा ? कृष्ण को केवल प्रेमाभक्ति चाहिए और कुछ भी नहीं । कृष्ण तो अपने शुद्धभक्त से एक छोटा सा फूल तक ग्रहण करते हैं । किन्तु अभक्त से वे कोई भेंट नहीं चाहते । उन्हें किसी से कुछ भी नहीं चाहिए , क्योंकि वे आत्मतुष्ट हैं , तो भी वे अपने भक्त की भेंट प्रेम तथा स्नेह के विनिमय में स्वीकार करते हैं ।

कृष्णभावनामृत विकसित करना जीवन का चरमलक्ष्य है । इस श्लोक में भक्ति शब्द का उल्लेख दो बार यह घोषित करने के लिए हुआ है कि भक्ति ही कृष्ण के पास पहुँचने का एकमात्र साधन है । किसी अन्य शर्त से , यथा ब्राह्मण , विद्वान् , धनी या महान विचारक होने से , कृष्ण किसी प्रकार की भेंट लेने को तैयार नहीं होते ।

भक्ति ही मूलसिद्धान्त है , जिसके विना वे किसी से कुछ भी लेने के लिए प्रेरित नहीं किये जा सकते । भक्ति कभी हेतुकी नहीं होती । यह शाश्वत विधि है । यह परमब्रह्म की सेवा में प्रत्यक्ष कर्म है । यह वतला कर कि वे ही एकमात्र भोक्ता , आदि स्वामी और समस्त यज्ञ – भेंटों के वास्तविक लक्ष्य हैं , अब भगवान् कृष्ण यह बताते हैं कि वे किस प्रकार की भेंट पसंद करते हैं ।

यदि कोई शुद्ध होने तथा जीवन के लक्ष्य तक पहुँचने के उद्देश्य से भगवद्भक्ति करना चाहता है तो उसे चाहिए कि वह पता करे कि भगवान् उससे क्या चाहते हैं । कृष्ण से प्रेम करने वाला उन्हें उनकी इच्छित वस्तु देगा और कोई ऐसी वस्तु भेंट नहीं करेगा जिसकी उन्हें इच्छा न हो , या उन्होंने न माँगी हो । इस प्रकार कृष्ण को मांस , मछली तथा अण्डे भेंट नहीं किये जाने चाहिए ।

यदि उन्हें इन वस्तुओं की इच्छा होती तो वे इनका उल्लेख करते । उल्टे वे स्पष्ट आदेश देते हैं कि उन्हें पत्र , पुष्प , जल तथा फल अर्पित किये जायें और वे इन्हें स्वीकार करेंगे । अतः हमें यह समझना चाहिए कि वे मांस , मछली तथा अण्डे स्वीकार नहीं करेंगे । शाक , अन्न , फल , दूध तथा जल- ये ही मनुष्यों के उचित भोजन हैं और भगवान् कृष्ण ने भी इन्हीं का आदेश दिया है ।

इनके अतिरिक्त हम जो भी खाते हों , वह उन्हें अर्पित नहीं किया जा सकता , क्योंकि वे उसे ग्रहण नहीं करेंगे । यदि हम ऐसा भोजन उन्हें अर्पित करेंगे तो हम प्रेमाभक्ति नहीं कर सकेंगे । तृतीय अध्याय के तेरहवें श्लोक में श्रीकृष्ण बताते हैं कि यज्ञ का उच्छिष्ट ही शुद्ध होता है , अतः जो लोग जीवन में प्रगति करने तथा भववन्धन से मुक्त होने के इच्छुक हैं , उन्हें इसी को खाना चाहिए ।

उसी श्लोक में वे यह भी बताते हैं कि जो लोग अपने भोजन को अर्पित नहीं करते वे पाप भक्षण करते हैं । दूसरे शब्दों में , उनका प्रत्येक कौर इस संसार की जटिलताओं में उन्हें बाँधने वाला है । अच्छा सरल शाकाहारी भोजन बनाकर उसे भगवान् कृष्ण के चित्र या अर्चाविग्रह के समक्ष अर्पित करके तथा नतमस्तक होकर इस तुच्छ भेंट को स्वीकार करने की प्रार्थना करने से मनुष्य अपने जीवन में निरन्तर प्रगति करता है , उसका शरीर शुद्ध होता है और मस्तिष्क के श्रेष्ठ तन्तु उत्पन्न होते हैं , जिससे शुद्ध चिन्तन हो पाता है ।

सबसे बड़ी बात तो यह है कि यह समर्पण अत्यन्त प्रेमपूर्वक करना चाहिए । कृष्ण को किसी तरह के भोजन की आवश्यकता नहीं रहती , क्योंकि उनके पास सब कुछ है , किन्तु यदि कोई उन्हें इस प्रकार प्रसन्न करना चाहता है , तो वे इस भेंट को स्वीकार करते हैं । भोजन बनाने , सेवा करने तथा भेंट करने में जो सबसे मुख्य बात रहती है , वह है कृष्ण के प्रेमवश कर्म करना ।

वे मायावादी चिन्तक भगवद्गीता के इस श्लोक का अर्थ नहीं समझ सकेंगे , जो यह मानकर चलते हैं कि परब्रह्म इन्द्रियरहित है । उनके लिए यह या तो रूपक है या भगवद्गीता के उद्घोषक कृष्ण के मानवीय चरित्र का प्रमाण है । किन्तु वास्तविकता तो  यह है कि भगवान् कृष्ण इन्द्रियों से युक्त हैं और यह कहा गया है कि उनकी इन्द्रियाँ परस्पर परिवर्तनशील हैं ।

दूसरे शब्दों में , एक इन्द्रिय दूसरी इन्द्रिय का कार्य कर सकती है । कृष्ण को परम ब्रह्म कहने का आशय यही है । इन्द्रियरहित होने पर उन्हें समस्त ऐश्वयों से युक्त नहीं माना जा सकता । सातवें अध्याय में कृष्ण ने बतलाया है कि ये प्रकृति के गर्भ में जीवों को स्थापित करते हैं । इसे वे प्रकृति पर दृष्टिपात करके करते हैं । अतः यहाँ पर भी भक्तों द्वारा भोजन अर्पित करते हुए भक्तों का प्रेमपूर्ण शब्द सुनना कृष्ण के द्वारा भोजन करने तथा उसके स्वाद लेने के ही समरूप है ।

इस बात पर इसलिए बल देना होगा क्योंकि अपनी सर्वोच्च स्थिति के कारण उनका सुनना उनके भोजन करने तथा स्वाद ग्रहण करने के ही समरूप है । केवल भक्त ही बिना तर्क के यह समझ सकता है कि परब्रह्म भोजन कर सकते हैं और उसका स्वाद ले सकते हैं । 

यत्करोषि  यदश्नासि  यज्जुहोषि  ददासि  यत् । 

     यत्तपस्यसि   कौन्तेय   तत्कुरुष्व   मदर्पणम् ॥ २७ ॥ 

यत्  –  जो कुछ   ;   करोषि   –   करते हो   ;   यत्   –   जो भी  ;   अश्नासि   –   खाते हो   ;  यत्  – जो कुछ   ;    जुहोषि   –   अर्पित करते हो   ;   ददासि   –   दान देते हो   ;   यत्   –   जो   ;   यत्  – जो भी   ;   तपस्यसि   –   तप करते हो   ;   कौन्तेय  –  हे कुन्तीपुत्र   ;   तत्  –   वह  ;   कुरुष्व  – करो   ;   मत्   –   मुझको   ;   अर्पणम्    –   भेंट रूप में । 

हे कुन्तीपुत्र ! तुम जो कुछ करते हो , जो कुछ खाते हो , जो कुछ अर्पित करते हो या दान देते हो और जो भी तपस्या करते हो , उसे मुझे अर्पित करते 

तात्पर्य :- इस प्रकार यह प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है कि अपने जीवन को इस प्रकार करो । हुए ढाले कि वह किसी भी दशा में कृष्ण को न भूल सके । प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन निर्वाह के लिए कर्म करना पड़ता है और कृष्ण यहाँ पर आदेश देते हैं कि हर व्यक्ति उनके लिए ही कर्म करे ।

प्रत्येक व्यक्ति को जीवित रहने के लिए कुछ न कुछ खाना पड़ता है अतः उसे चाहिए कि कृष्ण को अर्पित भोजन के उच्छिष्ट को ग्रहण करे । प्रत्येक व्यक्ति को कुछ न कुछ धार्मिक अनुष्ठान करने होते हैं , अतः कृष्ण की संस्तुति है , ” इसे मेरे हेतु करो ” । यही अर्चन है ।

प्रत्येक व्यक्ति कुछ न कुछ दान देता है , अतः कृष्ण कहते हैं , ” यह मुझे दो ” जिसका अर्थ यह है कि अधिक धन का उपयोग आन्दोलन की उन्नति के लिए करो । आजकल लोग ध्यान विधि के प्रति विशेष रुचि कृष्णभावनामृत दिखाते हैं , यद्यपि इस युग के लिए यह व्यावहारिक नहीं है , किन्तु यदि कोई चौबीस घण्टे हरे कृष्ण का जप अपनी माला में करे तो वह निश्चित रूप से महानतम ध्यानी तथा योगी है , जिसकी पुष्टि भगवद्गीता के छठे अध्याय में की गई है ।

शुभाशुभफलैरेवं      मोक्ष्यसे      कर्मबन्धनैः । 

        संन्यासयोगयुक्तात्मा  विमुक्तो  मामुपैष्यसि ॥ २८ ॥ 

शुभ   –   शुभ  ;   अशुभ  –  अशुभ  ;   फलैः   –  फलों के द्वारा  ;   एवम्   –   इस प्रकार  ;   मोक्ष्यसे   –   मुक्त हो जाओगे   ;    कर्म   –   कर्म के   ;    बन्धनैः   –   वन्धन से  ;   संन्यास   – संन्यास के   ;    योग   –   योग से   ;    युक्त-आत्मा    –   मन को स्थिर करके   ;   विमुक्तः   –   मुक्त हुआ   ;    माम्   –   मुझे  ;     उपेष्यसि   –  प्राप्त होगे   । 

इस तरह तुम कर्म के बन्धन तथा इसके शुभाशुभ फलों से मुक्त हो सकोगे । इस संन्यासयोग में अपने चित्त को स्थिर करके तुम मुक्त होकर मेरे पास आ सकोगे । 

तात्पर्य :- गुरु के निर्देशन में कृष्णभावनामृत में रहकर कर्म करने को युक्त कहते हैं । पारिभाषिक शब्द युक्त – वैराग्य है । श्रीरूप गोस्वामी ने इसकी व्याख्या इस प्रकार की है ( भक्तिरसामृत सिन्धु २.२५५ ) 

अनासक्तस्य            विषयान्यथार्हमुपयुञ्जतः ।

  निर्बन्धः   कृष्णसम्बन्धे   युक्तं    वैराग्यमुच्यते ।।

श्रीरूप गोस्वामी कहते हैं कि जब तक हम इस जगत् में हैं , तब तक हमें कर्म करना पड़ता है , हम कर्म करना बन्द नहीं कर सकते । अतः यदि कर्म करके उसके फल कृष्ण को अर्पित कर दिये जायँ तो यह युक्तवैराग्य कहलाता है । वस्तुतः संन्यास में स्थित होने पर ऐसे कर्मों से चित्त रूपी दर्पण स्वच्छ हो जाता है और कर्ता ज्यों – ज्यों क्रमशः आत्म साक्षात्कार की ओर प्रगति करता जाता है , त्यों – त्यों वह परमेश्वर के प्रति पूर्णतया समर्पित होता रहता है ।

अतएव अन्त में वह मुक्त हो जाता है और यह मुक्ति भी विशिष्ट होती है । इस मुक्ति से वह ब्रह्मज्योति में तदाकार नहीं होता , अपितु भगवद्धाम में प्रवेश करता है । यहाँ स्पष्ट उल्लेख है – माम् उपैष्यसि वह मेरे पास आता है , अर्थात् मेरे धाम वापस आता है ।

मुक्ति की पाँच विभिन्न अवस्थाएँ हैं और यहाँ यह स्पष्ट किया गया है कि जो भक्त जीवन भर परमेश्वर के निर्देशन में रहता है , वह ऐसी अवस्था को प्राप्त हुआ रहता है , जहाँ से वह शरीर त्यागने के बाद भगवद्धाम जा सकता है और भगवान् की प्रत्यक्ष संगति में रह सकता है । जिस व्यक्ति में अपने जीवन को भगवत्सेवा में रत रखने के अतिरिक्त अन्य कोई रुचि नहीं होती , वही वास्तविक संन्यासी है ।

ऐसा व्यक्ति भगवान् की परम इच्छा पर आश्रित रहते हुए अपने को उनका नित्य दास मानता है । अतः वह जो कुछ करता है , भगवान् के लाभ के लिए करता है । वह जो कुछ कर्म करता है , भगवान् की सेवा करने के लिए करता है । वह सकामकर्मों या वेदवर्णित कर्तव्यों पर ध्यान नहीं देता । सामान्य मनुष्यों के लिए वेदवर्णित कर्तव्यों को सम्पन्न करना अनिवार्य होता है ।

किन्तु शुद्धभक्त भगवान् की सेवा में पूर्णतया रत होकर भी कभी – कभी वेदों द्वारा अनुमोदित कर्तव्यों का विरोध करता प्रतीत होता है , जो वस्तुतः विरोध नहीं है । अतः वैष्णव आचार्यों का कथन है कि बुद्धिमान से बुद्धिमान व्यक्ति भी शुद्धभक्त की योजनाओं तथा कार्यों को नहीं समझ सकता । ठीक शब्द हैं- तौर वाक्य , क्रिया , मुद्रा विज्ञेह ना बुझय ( चैतन्यचरितामृत , मध्य २३.३ ९ ) ।

इस प्रकार जो व्यक्ति भगवान् की सेवा में रत है , या जो निरन्तर योजना बनाता रहता है कि किस तरह भगवान् की सेवा की जाये , उसे ही वर्तमान में पूर्णतया मुक्त मानना चाहिए और भविष्य में उसका भगवद्धाम जाना ध्रुव है । जिस प्रकार कृष्ण आलोचना से परे हैं , उसी प्रकार वह भक्त भी सारी भौतिक आलोचना से परे हो जाता है ।

समोऽहं   सर्वभूतेषु   न   मे   द्वेष्योऽस्ति  न   प्रियः । 

      ये  भजन्ति  तु  मां  भक्त्या  मयि  ते  तेषु  चाप्यहम् ॥ २ ९ ॥ 

समः  –  समभावः   ;   अहम्   –  मैं  ;  सर्वभूतेषु    –   समस्त जीवों में  ;   न   –  कोई नहीं  ;   मे –  मुझको   ;   द्वेष्य:   –   द्वेषपूर्ण   ;  अस्ति  –  है   ;   न   –  न तो  ;   प्रियः  –   प्रिय   ;   ये  –  जो  ; भजन्ति  –   दिव्यसेवा करते हैं  ;   तु   –   लेकिन   ;  माम्   –   मुझको  ;   भक्त्या  –   भक्ति से  ; मयि   –  मुझमें हैं   ;   ते  –  वेव्यक्ति   ;     तेषु  –  उनमें   ;   च  –  भी   ;   अपि  –   निश्चय ही  ;   अहम्   –  मैं । 

मैं न तो किसी से द्वेष करता हूँ , न ही किसी के साथ पक्षपात करता हूँ । मैं सबों के लिए समभाव हूँ । किन्तु जो भी भक्तिपूर्वक मेरी सेवा करता है , वह मेरा मित्र है , मुझमें स्थित रहता है और मैं भी उसका मित्र हूँ । 

तात्पर्य :- यहाँ यह प्रश्न किया जा सकता है कि जब कृष्ण का सवों के लिए समभाव है और उनका कोई विशिष्ट मित्र नहीं है तो फिर वे उन भक्तों में विशेष रुचि क्यों लेते हैं , जो उनकी दिव्यसेवा में सदैव लगे रहते हैं ? किन्तु यह भेदभाव नहीं है , यह तो सहज है । इस जगत् में हो सकता है कि कोई व्यक्ति अत्यन्त उपकारी हो , किन्तु तो भी वह अपनी सन्तानों में विशेष रुचि लेता है ।

भगवान् का कहना है कि प्रत्येक जीव , चाहे वह जिस योनि का हो , उनका पुत्र है , अतः वे हर एक को जीवन की आवश्यक वस्तुएँ प्रदान करते हैं । वे उस बादल के सदृश हैं जो सबों के ऊपर जलवृष्टि करता है , चाहे यह वृष्टि चट्टान पर हो या स्थल पर , या जल में हो । किन्तु भगवान् अपने भक्तों का विशेष ध्यान रखते हैं । ऐसे ही भक्तों का यहाँ उल्लेख हुआ है- वे सदैव कृष्णभावनामृत में रहते हैं , फलतः वे निरन्तर कृष्ण में लीन रहते हैं ।

कृष्णभावनामृत शब्द ही बताता है कि जो लोग ऐसे भावनामृत में रहते हैं वे सजीव अध्यात्मवादी हैं और उन्हीं में स्थित हैं । भगवान् यहाँ स्पष्ट रूप से कहते हैं- मयि ते अर्थात् वे मुझमें हैं । फलतः भगवान् भी उनमें हैं । इससे ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् की भी व्याख्या हो जाती है- जो भी मेरी शरण में आ जाता है , उसकी मैं उसी रूप में रखवाली करता हूँ ।

यह दिव्य आदान – प्रदान भाव विद्यमान रहता है , क्योंकि भक्त तथा भगवान् दोनों सचेतन हैं । जब हीरे को सोने की अंगूठी में जड़ दिया जाता है तो वह अत्यन्त सुन्दर लगता है । इससे सोने की महिमा बढ़ती है , किन्तु साथ ही हीरे की भी महिमा बढ़ती है । भगवान् तथा जीव निरन्तर चमकते रहते हैं और जब कोई जीव भगवान् की सेवा में प्रवृत्त होता है तो वह सोने की भाँति दिखता है ।

भगवान हीरे के समान हैं , अतः यह संयोग अत्युत्तम होता है । शुद्ध अवस्था में जीव भक्त कहलाते हैं । परमेश्वर अपने भक्तों के भी भक्त बन जाते हैं । यदि भगवान् तथा भक्त में आदान – प्रदान का भाव न रहे तो सगुणवादी दर्शन ही न रहे । मायावादी दर्शन में परमेश्वर तथा जीव के मध्य ऐसा आदान – प्रदान का भाव नहीं मिलता , किन्तु सगुणवादी दर्शन में ऐसा होता है ।

प्रायः यह दृष्टान्त दिया जाता है कि भगवान् कल्पवृक्ष के समान हैं और मनुष्य इस वृक्ष से जो भी माँगता है , भगवान् उसकी पूर्ति करते हैं । किन्तु यहाँ पर जो व्याख्या दी गई है वह अधिक पूर्ण है । यहाँ पर भगवान को भक्त का पक्ष लेने वाला कहा गया है । यह भक्त के प्रति भगवान् की विशेष कृपा की अभिव्यक्ति है ।

भगवान् के आदान – प्रदान  भाव को कर्म के नियम के अन्तर्गत नहीं मानना चाहिए । यह तो उस दिव्य अवस्था से सम्बन्धित रहता है जिसमें भगवान् तथा उनके भक्त कर्म करते हैं । भगवद्भक्ति इस जगत का कार्य नहीं है , यह तो उस अध्यात्म जगत का अंश है , जहाँ शाश्वत आनन्द तथा ज्ञान का प्राधान्य रहता है ।

अपि   चेत्सुदुराचारो   भजते     मामनन्यभाक् । 

      साधुरेव  स  मन्तव्यः  सम्यग्व्यवसितो  हि  सः ॥ ३० ॥ 

 

अपि   –  भी  ;   चेत    –  यदि   ;   सु-दुराचार:  –  अत्यन्त गर्हित कर्म करने वाला   ;   भजते   –  सेवा करता है   ;    माम्  –  मेरी  ;     अनन्य-भाक्   –   दिना विचलित हुए  ;   साधुः   –  साधुपुरुष  ;  एव   –   निश्चय ही   ;   सः  –  वह   ;   मन्तव्यः  –  मानने योग्य  ;   सम्यक्   –  पूर्णतया  ;  व्यवसितः  –   संकल्प वाला  ; हि   –   निश्चय ही  ;   सः   –  वह । 

यदि कोई जघन्य से जघन्य कर्म करता है , किन्तु  यदि वह भक्ति में रत रहता है तो उसे साधु मानना चाहिए , क्योंकि वह अपने संकल्प में अडिग रहता है । 

तात्पर्य :- इस श्लोक का सुदुराचारः शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है , अतः हमें इसे ठीक से समझना होगा । जब मनुष्य बद्ध रहता है तो उसके दो प्रकार के कर्म होते हैं – प्रथम वद्ध और द्वितीय स्वाभाविक जिस प्रकार शरीर की रक्षा करने या समाज तथा राज्य के नियमों का पालन करने के लिए तरह – तरह के कर्म करने होते हैं , उसी प्रकार से बद्ध जीवन के प्रसंग में भक्तों के लिए कर्म होते हैं , जो बद्ध कहलाते हैं ।

इनके अतिरिक्त , जो जीव अपने आध्यात्मिक स्वभाव से पूर्णतया भिज्ञ रहता है और कृष्णभावनामृत में या भगवद्भक्ति में लगा रहता है , उसके लिए भी कर्म होते हैं , जो दिव्य कहलाते हैं । ऐसे कार्य उसकी स्वाभाविक स्थिति में सम्पन्न होते हैं और शास्त्रीय दृष्टि से भक्ति कहलाते हैं । बद्र अवस्था में कभी – कभी भक्ति और शरीर की बद्ध सेवा एक दूसरे के समान्तर चलती हैं ।

किन्तु पुनः कभी – कभी वे एक दूसरे के विपरीत हो जाती हैं । जहाँ तक सम्भव होता है , भक्त सतर्क रहता है कि वह कोई ऐसा कार्य न करें , जिससे यह अनुकूल स्थिति भंग हो । वह जानता है कि उसकी कर्म – सिद्धि उसके कृष्णभावनामृत की अनुभूति की प्रगति पर निर्भर करती है । किन्तु कभी – कभी यह देखा जाता है कि कृष्णभावनामृत में रत व्यक्ति सामाजिक या राजनीतिक दृष्टि से निन्दनीय कार्य कर बैठता है ।

किन्तु इस प्रकार के क्षणिक पतन से वह अयोग्य नहीं हो जाता । श्रीमद्भागवत में कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति पतित हो जाय , किन्तु यदि भगवान् की दिव्य सेवा में लगा रहे तो हृदय में वास करने वाले भगवान् उसे शुद्ध कर देते हैं और उस निन्दनीय कार्य के लिए क्षमा कर देते हैं ।

भौतिक कल्मष इतना प्रवल है कि भगवान् की सेवा में लगा योगी भी कभी – कभी उसके जाल में आ फँसता है । लेकिन कृष्णभावनामृत इतना शक्तिशाली होता है कि इस प्रकार का आकस्मिक पतन तुरन्त रुक जाता है ।

इसलिए भक्तियोग सदैव सफल होता है । किसी भक्त के आदर्श पथ से अकस्मात् च्युत होने पर हँसना नहीं चाहिए , क्योंकि जैसा कि अगले श्लोक में बताया गया है ज्योंही भक्त कृष्णभावनामृत में पूर्णतया स्थित हो जाता है , ऐसे आकस्मिक पतन कुछ समय के पश्चात् रुक जाते हैं । अतः जो व्यक्ति कृष्णभावनामृत में स्थित है और अनन्य भाव से हरे कृष्ण मन्त्र का जप करता है , उसे दिव्य स्थिति में आसीन समझना चाहिए , भले ही दैववशात् उसका पतन क्यों न हो चुका हो ।

साधुरेव शब्द अत्यन्त प्रभावात्मक हैं । ये अभक्तों को सावधान करते हैं कि आकस्मिक पतन के कारण भक्त का उपहास नहीं किया जाना चाहिए , उसे तब भी साधु ही मानना चाहिए । मन्तव्यः शब्द तो इससे भी अधिक बलशाली है । यदि कोई इस नियम को नहीं मानता और भक्त पर उसके पतन के कारण हँसता है तो वह भगवान् के आदेश की अवज्ञा करता है । भक्त की एकमात्र योग्यता यह है कि वह अविचल तथा अनन्य भाव से भक्ति में तत्पर रहे । नृसिंह पुराण में निम्नलिखित कथन प्राप्त है 

कहने का अर्थ यह है कि यदि भगवद्भक्ति में तत्पर व्यक्ति कभी घृणित कार्य करता पाया जाये तो इन कार्यों को उन धब्बों की तरह मान लेना चाहिए , जिस प्रकार चाँद में खरगोश के धब्बे हैं । इन धव्यों से चाँदनी के विस्तार में बाधा नहीं आती । इसी प्रकार साधु – पथ से भक्त का आकस्मिक पतन उसे निन्दनीय नहीं बनाता ।

किन्तु इसी के साथ यह समझने की भूल नहीं करनी चाहिए कि दिव्य भक्ति करने वाला भक्त सभी प्रकार के निन्दनीय कर्म कर सकता है । इस श्लोक में केवल इसका उल्लेख है कि भौतिक सम्बन्धों की प्रबलता के कारण कभी कोई दुर्घटना हो सकती है । भक्ति तो एक प्रकार से माया के विरुद्ध युद्ध की घोषणा है । जब तक मनुष्य माया से लड़ने के लिए पर्याप्त बलशाली नहीं होता , तब तक आकस्मिक पतन हो सकते हैं ।

किन्तु बलवान होने पर ऐसे पतन नहीं होते , जैसा कि पहले कहा जा चुका है । मनुष्य को इस श्लोक का दुरुपयोग करते हुए अशोभनीय कर्म नहीं करना चाहिए और यह नहीं सोचना चाहिए कि इतने पर भी वह भक्त बना रह सकता है । यदि वह भक्ति के द्वारा अपना चरित्र नहीं सुधार लेता तो उसे उच्चकोटि का भक्त नहीं मानना चाहिए । 

क्षिप्रं  भवति  धर्मात्मा  शश्वच्छान्तिं  निगच्छति । 

       कौन्तेय  प्रतिजानीहि  न  मे  भक्तः  प्रणश्यति ॥ ३१ ॥ 

क्षिप्रम्   –   शीघ्र   ;    भवति   –   वन जाता है    ;   धर्म-आत्मा   –   धर्मपरायण   ;    शश्वत्-शान्तिम्    –   स्थायी शान्ति को    ;   निगच्छति   –    प्राप्त करता है   ;   कौन्तेय   –   हे कुन्तीपुत्रः ;   प्रतिजानीहि   –   घोषित कर दो    ;     न  –   कभी नहीं   ;   मे   –  मेरा  ;   भक्तः   –  भक्त  ; प्रणश्यति   –   नष्ट होता है । 

वह तुरन्त धर्मात्मा बन जाता है और स्थायी शान्ति को प्राप्त होता है । हे कुन्तीपुत्र ! निडर होकर घोषणा कर दो कि मेरे भक्त का कभी विनाश नहीं होता है । 

तात्पर्य :– इसका कोई दूसरा अर्थ नहीं लगाना चाहिए । सातवें अध्याय में भगवान् कहते हैं कि जो दुष्कृती है , वह भगवदभक्त नहीं हो सकता । जो भगवद्भक्त नहीं है , उसमें कोई भी योग्यता नहीं होती । तब प्रश्न यह उठता है कि संयोगवश या स्वेच्छा से निन्दनीय कमों में प्रवृत्त होने वाला व्यक्ति किस प्रकार भक्त हो सकता है ? यह प्रश्न ठीक ही है ।

जैसा कि सातवें अध्याय में कहा गया है , जो दुष्टात्मा कभी भक्ति के पास नहीं फटकता , उसमें कोई सद्गुण नहीं होते । श्रीमद्भागवत में भी इसका उल्लेख है । सामान्यतया नौ प्रकार के भक्ति – कार्यों में युक्त रहने वाला भक्त अपने हृदय को भौतिक कल्मष से शुद्ध करने में लगा होता है । वह भगवान् को अपने हृदय में वसाता है , फलतः उसके सारे पापपूर्ण कल्मष धुल जाते हैं ।

निरन्तर भगवान् का चिन्तन करने से वह स्वतः शुद्ध हो जाता है । वेदों के अनुसार ऐसा विधान है कि यदि कोई अपने उच्चपद से नीचे गिर जाता है तो अपनी शुद्धि के लिए उसे कुछ अनुष्ठान करने होते हैं । किन्तु यहाँ पर ऐसा कोई प्रतिबन्ध नहीं है , क्योंकि शुद्धि की क्रिया भगवान् का निरन्तर स्मरण करते रहने से पहले से ही भक्त के हृदय में चलती रहती है ।

अतः हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे । हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे- इस मन्त्र का अनवरत जप करना चाहिए । यह भक्त को आकस्मिक पतन से बचाएगा । इस प्रकार वह समस्त भौतिक कल्मषों से सदैव मुक्त रहेगा । 

मां   हि  पार्थ   व्यपाश्रित्य   येऽपि   स्युः   पापयोनयः । 

    स्त्रियो  वैश्यास्तथा  शूद्रास्तेऽपि  यान्ति  परां  गतिम् ॥ ३२ ॥ 

माम्   –   मेरी  ;    हि   –  निश्चय ही  ;   पार्थ   –   हे पृथापुत्र   ;   व्यपाश्रित्य   –   शरण ग्रहण करके   ;    ये   –   जो  ;  अपि  –  भी   ;   स्युः   –  हैं  ;   पाप-योनयः   –   निम्नकुल में उत्पन्न  ;   स्त्रियः  – स्त्रियाँ  ;   वैश्या:   –   वणिक लोग   ;   तथा   –  भी   ;   शूद्रा:   –  निम्न श्रेणी के व्यक्ति   ;   ते अपि   –   वे भी   ;   यान्ति   –   जाते हैं   ;  पराम्   –  परम   ;   गतिम्  –   गन्तव्य को । 

हे पार्थ ! जो लोग मेरी शरण ग्रहण करते हैं , वे भले ही निम्नजन्मा स्त्री , वैश्य ( व्यापारी ) तथा शूद्र ( श्रमिक ) क्यों न हों , वे परमधाम को प्राप्त करते हैं । 

तात्पर्य :– यहाँ पर भगवान् ने स्पष्ट कहा है कि भक्ति में उच्च तथा निम्न जाति के लोगों का भेद नहीं होता । भौतिक जीवन में ऐसा विभाजन होता है , किन्तु भगवान् की दिव्य भक्ति में लगे व्यक्ति पर यह लागू नहीं होता । सभी परमधाम के अधिकारी हैं । श्रीमद्भागवत में ( २.४.१८ ) कथन है कि अधम योनि चाण्डाल भी शुद्ध भक्त के संसर्ग से शुद्ध हो जाते हैं ।

अतः भक्ति तथा शुद्ध भक्त द्वारा पथप्रदर्शन इतने प्रबल हैं कि वहाँ ऊँचनीच का भेद नहीं रह जाता और कोई भी इसे ग्रहण कर सकता है । शुद्ध भक्त की शरण ग्रहण करके सामान्य से सामान्य व्यक्ति शुद्ध हो सकता है । प्रकृति के विभिन्न गुणों के अनुसार मनुष्यों को सात्त्विक ( ब्राह्मण ) , रजोगुणी ( क्षत्रिय ) तथा तामसी ( वैश्य तथा शूद्र ) कहा जाता है ।

इनसे भी निम्न पुरुष चाण्डाल कहलाते हैं और वे पापी कुलों में जन्म लेते हैं । सामान्य रूप से उच्चकुल वाले इन निम्नकुल में जन्म लेने वालों की संगति नहीं करते । किन्तु भक्तियोग इतना प्रवल होता है कि भगवद्भक्त समस्त निम्नकुल वाले व्यक्तियों को जीवन की परम सिद्धि प्राप्त करा सकते हैं ।

यह तभी सम्भव है जब कोई कृष्ण की शरण में जाये । जैसा कि व्यपाश्रित्य शब्द से सूचित है , मनुष्य को पूर्णतया कृष्ण की शरण ग्रहण करनी चाहिए । तब वह बड़े से बड़े ज्ञानी तथा योगी से भी महान बन सकता है । 

किं  पुनर्ब्राह्मणाः  पुण्या   भक्ता  राजर्षयस्तथा । 
       अनित्यमसुखं   लोकमिमं  प्राप्य  भजस्व  माम् ॥ ३३ ॥ 

किम्   –   क्या , कितना  ;   पुनः  –  फिर  ;   ब्राह्मणाः  –  ब्राह्मण   ;    पुण्या:   –  धर्मात्मा   ;   भक्ताः  –   भक्तगण  ;   राज-ऋषय:   –   साधु राजे   ;  तथा   –  भी  ;   अनित्यम्  –   नाशवान  ;   असुखम्   –  दुखमय  ;   लोकम्   –  लोक को   ;  इमम्  –  इस  ;  प्राप्य   –  प्राप्त करके  ;   भजस्व –   प्रेमाभक्ति में लगो   ;   माम्   –   मेरी । 

फिर धर्मात्मा ब्राह्मणों , भक्तों तथा राजर्षियों के लिए तो कहना ही क्या है ! अतः इस क्षणिक दुखमय संसार में आ जाने पर मेरी प्रेमाभक्ति में अपने आपको लगाओ ।

  तात्पर्य :- इस संसार में कई श्रेणियों के लोग हैं , किन्तु तो भी यह संसार किसी के लिए सुखमय स्थान नहीं है । यहाँ स्पष्ट कहा गया है- अनित्यम् असुखं लोकम् – यह जगत् अनित्य तथा दुखमय है और किसी भी भले मनुष्य के रहने लायक नहीं है । भगवान् इस संसार को क्षणिक तथा दुखमय घोषित कर रहे हैं ।

कुछ दार्शनिक , विशेष रूप से मायावादी , कहते हैं कि यह संसार मिथ्या है , किन्तु भगवद्गीता से हम यह जान सकते हैं कि यह संसार मिथ्या नहीं है , यह अनित्य है । अनित्य तथा मिथ्या में अन्तर है । यह संसार अनित्य है , किन्तु एक दूसरा भी संसार है जो नित्य है । यह संसार दुखमय है , किन्तु दूसरा संसार नित्य तथा आनन्दमय है ।

अर्जुन का जन्म ऋषितुल्य राजकुल में हुआ था । अतः भगवान् उससे भी कहते हैं , “ मेरी सेवा करो , और शीघ्र ही मेरे धाम को प्राप्त करो । ” किसी को भी इस अनित्य संसार में नहीं रहना चाहिए , क्योंकि यह दुखमय है । प्रत्येक व्यक्ति को भगवान् के हृदय से लगना चाहिए , जिससे वह सदैव सुखी रह सके ।

भगवद्भक्ति ही एकमात्र ऐसी विधि है जिसके द्वारा सभी वर्गों के लोगों की सारी समस्याएँ सुलझाई जा सकती हैं । अतः प्रत्येक व्यक्ति को कृष्णभावनामृत स्वीकार करके अपने जीवन को सफल बनाना चाहिए । 

मन्मना  भव  मद्भक्तो   मद्याजी  मां  नमस्कुरु ।
        मामेवैष्यसि      युक्त्वैवमात्मानं      मत्परायणः ॥ ३४ ॥ 

मत्-मनाः    –   सदैव मेरा चिन्तन करने वाला   ;   भव  –  होओ   ;   मत्  –  मेरा   ;   भक्तः  –  भक्त  ;    मत्   –   मेरा  ;   याजी  –   उपासक   ;   माम्   – मुझको   ;   नमस्कुरु   –   नमस्कार करो   ;  माम्  –   मुझकों   ;    एव  –  निश्चय ही  ;   एष्यसि   –  पाओगे   ;   युक्त्वा   –   लीन होकर   ;   एवम्   –   इस प्रकार  ;   आत्मानम्   –  अपनी आत्मा को  ;   मत्-परायणः   –   मेरी भक्ति में अनुरक्त । 

अपने मन को मेरे नित्य चिन्तन में लगाओ , मेरे भक्त बनो , मुझे नमस्कार करो और मेरी ही पूजा करो । इस प्रकार मुझमें पूर्णतया तल्लीन होने पर तुम निश्चित रूप से मुझको प्राप्त होगे ।

तात्पर्य :- इस श्लोक में स्पष्ट इंगित है कि इस कल्मषग्रस्त भौतिक जगत् से छुटकारा पाने का एकमात्र साधन कृष्णभावनामृत है । कभी – कभी कपटी भाष्यकार इस स्पष्ट कथन का तोडमरोड़ कर अर्थ करते हैं कि सारी भक्ति भगवान् कृष्ण को समर्पित की जानी चाहिए । दुर्भाग्यवश ऐसे भाष्यकार पाठकों का ध्यान ऐसी बात की ओर आकर्षित करते हैं जो सम्भव नहीं है ।

ऐसे भाष्यकार यह नहीं जानते कि कृष्ण के मन तथा कृष्ण में कोई अन्तर नहीं है । कृष्ण कोई सामान्य मनुष्य नहीं हैं , वे परमेश्वर हैं । उनका शरीर , उनका मन तथा स्वयं वे एक हैं और परम हैं । जैसा कि कूर्मपुराण में कहा गया है और भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ने चैतन्यचरितामृत ( पंचम अध्याय , आदि लीला ४१ ४८ ) के अनुभाष्य में उद्धृत किया है – देहदेहीविभेदोऽयं नेश्वरे विद्यते क्वचित् – अर्थात् परमेश्वर कृष्ण में तथा उनके शरीर में कोई अन्तर नहीं है ।

लेकिन इस कृष्णतत्त्व को न जानने के कारण भाष्यकार कृष्ण को छिपाते हैं और उनको उनके मन या शरीर से पृथक् बताते हैं । यद्यपि यह कृष्णतत्त्व के प्रति निरी अज्ञानता है , किन्तु कुछ लोग जनता को भ्रमित करके धन कमाते हैं । कुछ लोग आसुरी होते हैं , वे भी कृष्ण का चिन्तन करते हैं किन्तु ईर्ष्यावश , जिस तरह कि कृष्ण का मामा राजा कंस करता था ।

वह भी कृष्ण का निरन्तर चिन्तन करता रहता था , किन्तु वह उन्हें अपने शत्रु रूप में सोचता था । वह सदैव चिन्ताग्रस्त रहता था और सोचता रहता था कि न जाने कब कृष्ण उसका वध कर दें । इस प्रकार के चिन्तन से हमें कोई लाभ होने वाला नहीं है । मनुष्य को चाहिए कि भक्तिमय प्रेम में उनका चिन्तन करे । यही भक्ति है ।

उसे चाहिए कि वह निरन्तर कृष्णतत्त्व का अनुशीलन करे । तो वह उपयुक्त अनुशीलन क्या है ? यह प्रामाणिक गुरु से सीखना है । कृष्ण भगवान् हैं और हम कई बार कह चुके हैं कि उनका शरीर भौतिक नहीं है अपितु सच्चिदानन्द स्वरूप है । इस प्रकार की चर्चा से मनुष्य को भक्त बनने में सहायता मिलेगी । अन्यथा अप्रामाणिक साधन से कृष्ण का ज्ञान प्राप्त करना व्यर्थ होगा ।

अतः मनुष्य को कृष्ण के आदि रूप में मन को स्थिर करना चाहिए , उसे अपने मन में यह दृढ़ विश्वास करके पूजा करने में प्रवृत्त होना चाहिए कि कृष्ण ही परम हैं । कृष्ण के लिए भारत में हजारों मन्दिर हैं , जहाँ पर भक्ति का अभ्यास किया जाता है । जब ऐसा अभ्यास हो रहा हो तो मनुष्य को चाहिए कि कृष्ण को नमस्कार करे ।

उसे अर्चाविग्रह के समक्ष नतमस्तक होकर मनसा वाचा कर्मणा हर प्रकार से प्रवृत्त होना चाहिए । इससे वह कृष्णभाव में पूर्णतया तल्लीन हो सकेगा । इससे वह कृष्णलोक को में जा सकेगा ।

उसे चाहिए कि कपटी भाष्यकारों के बहकावे में न आए । उसे श्रवण , कीर्तन आदि नवधा भक्ति में प्रवृत्त होना चाहिए । शुद्ध भक्ति मानव समाज की चरम उपलब्धि भगवद्गीता के सातवें तथा आठवें अध्यायों में भगवान् की ऐसी शुद्ध भक्ति की व्याख्या की गई है , जो कल्पना , योग तथा सकाम कर्म से मुक्त है । जो पूर्णतया शुद्ध नहीं हो पाते वे भगवान् के विभिन्न स्वरूपों द्वारा यथा निर्विशेषवादी ब्रह्मज्योति तथा अन्तर्वामी परमात्मा द्वारा आकृष्ट होते हैं , किन्तु शुद्ध भक्त तो परमेश्वर की साक्षात् सेवा करता है ।

कृष्ण सम्बन्धी एक उत्तम पद्य में कहा गया है कि जो व्यक्ति देवताओं की पूजा में रत हैं , वे सर्वाधिक अज्ञानी हैं , उन्हें कभी भी कृष्ण का चरम वरदान प्राप्त नहीं हो सकता । हो सकता है कि प्रारम्भ में कोई भक्त अपने स्तर से नीचे गिर जाये , तो भी उसे अन्य सारे दार्शनिकों तथा योगियों से श्रेष्ठ मानना चाहिए । जो व्यक्ति निरन्तर कृष्ण भक्ति में लगा रहता है , उसे पूर्ण साधुपुरुष समझना चाहिए ।

क्रमशः उसके आकस्मिक भक्ति – विहीन कार्य कम होते जाएँगे और उसे शीघ्र ही पूर्ण सिद्धि प्राप्त होगी । वास्तव में शुद्ध भक्त के पतन का कभी कोई अवसर नहीं आता , क्योंकि भगवान् स्वयं ही अपने शुद्ध भक्तों की रक्षा करते हैं । अतः बुद्धिमान मनुष्य को चाहिए कि वह सीधे कृष्णभावनामृत पथ को ग्रहण करे और संसार में सुखपूर्वक जीवन विताए । अन्ततोगत्वा वह कृष्ण रूपी परम पुरस्कार प्राप्त करेगा । 

इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता के नवें अध्याय “ परम गुह्य ज्ञान ” का भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुआ ।

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