भगवद गीता – अध्याय 9.4 ~ सर्वात्म रूप से प्रभाव सहित भगवान के स्वरूप का वर्णन  / Bhagwad Geeta Chapter -9

अध्याय नौ (Chapter -9)

भगवद गीता – अध्याय 9  में शलोक 16 से  शलोक 19  तक सर्वात्म रूप से प्रभाव सहित भगवान के स्वरूप का वर्णन !

अहं   क्रतुरहं   यज्ञः   स्वधाहमहमौषधम् ।

        मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्रिरहं       हुतम् ॥ १६ ॥ 

अहम्  –   मै  ;   क्रतु:   –   वैदिक अनुष्ठान कर्मकाण्ड   ;   अहम्  –  मै  ;   यज्ञः  –  स्मार्त यज्ञ  ;  स्वधा   –  तर्पण  ;  मन्त्र:  –  दिव्यानि   ;  अहम्  –  मैं   ;  एव  –  निश्चय ही  ;  अहम् –  मैं   ;  अग्नि  –   अग्नि  |

किन्तु में ही कर्मकाण्ड में ही यज्ञ , पितरों को दिया जाने वाला तर्पण , औषधि , दिव्य ध्वनि ( मन्त्र ) , घी , अग्नि तथा आहुति हूँ । 

तात्पर्य :- ज्योतिष्टोम नामक वैदिक यज्ञ भी कृष्ण है । स्मृति में वर्णित महायज्ञ भी वही है । पितृलोक को अर्पित तर्पण या पितृलोक को प्रसन्न करने के लिए किया गया यज्ञ , जिसे छूत रूप में एक प्रकार की औषधि माना जाता है , वह भी कृष्ण ही है । इस सम्बन्ध में जिन मन्त्री का उच्चारण किया जाता है , वे भी कृष्ण हैं ।

यज्ञों में आहुति के लिए प्रयुक्त होने वाली दुग्ध से बनी अनेक वस्तुएँ भी कृष्ण है । अग्नि भी कृष्ण है , क्योंकि यह अग्नि पाँच तत्वों में से एक है , अतः वह कृष्ण की भिन्ना शक्ति कही जाती है । दूसरे शब्दों में , वेदों के कर्मकाण्ड भाग में प्रतिपादित वैदिक यज्ञ भी पूर्णरूप से कृष्ण है । अथवा यह कह सकते हैं कि जो लोग कृष्ण की भक्ति में लगे हुए हैं उनके लिए यह समझना चाहिए कि उन्होंने सारे वेदविहित यज्ञ सम्पन्न कर लिए हैं । 

पिताहमस्य   जगतो  माता  धाता  पितामहः । 

       वेद्यं    पवित्रमोंकार   ऋक्साम  यजुरेव    च ॥ १७ ॥ 

पिता  –  पिता  ;   अहम्   –  मै   ;   अस्य  –   इस  ;   जगतः  –  ब्रह्माण्ड का   ;   माता  –  माता  ;   धाता  –   आश्रयदाता   ;   पितामहः   –   वावा   ;   वेश्चम्   –  जानने योग्य  ;   पवित्रम्  –   शुद्ध करने वाला   ;   ॐकार:  –   ॐ अक्षर  ;   साम   –   सामवेद   ;   यजुः   –  यजुर्वेद  ;   एव   –  निश्चय ही   ; च   –  तथा । 

मैं इस ब्रह्माण्ड का पिता , माता , आश्रय तथा पितामह हूँ । में ज्ञेय ( जानने योग्य ) , शुद्धिकर्ता तथा ओंकार हूँ । मैं ऋग्वेद , सामवेद तथा यजुर्वेद भी हूँ । 

तात्पर्य :- चराचर विराट जगत की अभिव्यक्ति कृष्ण की शक्ति के विभिन्न कार्यकलापों से होती है । इस भौतिक जगत् में हम विभिन्न जीवों के साथ तरह – तरह के सम्बन्ध स्थापित करते हैं , जो कृष्ण की शक्ति के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं है । प्रकृति की सृष्टि में उनमें से कुछ हमारे माता पिता के रूप में उत्पन्न होते हैं किन्तु वे कृष्ण के अंश ही है ।

इस दृष्टि से ये जीव जो हमारे माता , पिता आदि प्रतीत होते हैं वे कृष्ण के अतिरिक्त कुछ नहीं हैं । इस श्लोक में आए धाता शब्द का अर्थ भ्रष्टा है । न केवल हमारे माता पिता कृष्ण के अंश रूप है , अपितु इनके खष्टा दादी तथा दादा कृष्ण । वस्तुतः कोई भी जीव कृष्ण का अंश होने के कारण कृष्ण है । अतः सारे वेदों के लक्ष्य कृष्ण ही हैं ।

हम वेदों से जो भी जानना चाहते हैं वह कृष्ण को जानने की दिशा में होता है । जिस विषय से हमारी स्वाभाविक स्थिति शुद्ध होती है , वह कृष्ण है । इसी प्रकार जो जीव वैदिक नियमों को जानने के लिए जिज्ञासु रहता है , वह भी कृष्ण का अंश , अतः कृष्ण भी है । समस्त वैदिक मन्त्रों में ॐ शब्द , जिसे प्रणव कहा जाता है , एक दिव्य ध्वनि कम्पन है और यह कृष्ण भी है । चूँकि चारों वेदों – ऋग्वेद , यजुर्वेद , सामवेद तथा अथर्ववेद में प्रणव या ओंकार प्रधान है , अतः इसे कृष्ण समझना चाहिए । 

गतिर्भर्ता   प्रभुः  साक्षी  निवासः  शरणं  सुहृत् । 

       प्रभवः  प्रलयः   स्थानं   निधानं   बीजमव्ययम् ॥ १८ ॥

गतिः  –   लक्ष्य   ;   भर्ता  –  पालक  ;   प्रभुः  –  भगवान्  ;   साक्षी   –  गवाह  ;   निवासः  –   धाम  ; शरणम्   –   शरण  ;   सुहृत्   –   घनिष्ठ मित्र  ;   प्रभवः  –   सृष्टि  ;   प्रलयः  –   संहार   ;   स्थानम्   –   भूमि , स्थिति   ;     निधानम्   –   आश्रय , विश्राम स्थल   ;   बीजम्   –   वीज , कारण   ;  अव्ययम्   –   अविनाशी  

मैं ही लक्ष्य , पालनकर्ता , स्वामी , साक्षी , धाम , शरणस्थली तथा अत्यन्त प्रिय मित्र हूँ । में सृष्टि तथा प्रलय , सबका आधार , आश्रय तथा अविनाशी बीज भी हूँ । 

तात्पर्य :- गति का अर्थ है गन्तव्य या लक्ष्य , जहाँ हम जाना चाहते हैं । लेकिन चरमलक्ष्य तो कृष्ण हैं , यद्यपि लोग इसे जानते नहीं । जो कृष्ण को नहीं जानता वह पथभ्रष्ट हो जाता है और उसकी तथाकथित प्रगति या तो आंशिक होती है या फिर भ्रमपूर्ण । ऐसे अनेक लोग हैं जो देवताओं को ही अपना लक्ष्य बनाते हैं और तदनुसार कठोर नियमों का पालन करते हुए चन्द्रलोक , सूर्यलोक , इन्द्रलोक , महर्लोक जैसे विभिन्न लोकों को प्राप्त होते हैं ।

किन्तु ये सारे लोक कृष्ण की ही सृष्टि होने के कारण कृष्ण हैं और नहीं भी हैं । ऐसे लोक भी कृष्ण की शक्ति की अभिव्यक्तियाँ होने के कारण कृष्ण हैं , किन्तु वस्तुतः वे कृष्ण की अनुभूति की दिशा में सोपान का कार्य करते हैं । कृष्ण की विभिन्न शक्तियों तक पहुँचने का अर्थ है अप्रत्यक्षतः कृष्ण तक पहुँचना । अतः मनुष्य को चाहिए कि कृष्ण तक सीधे पहुँचे , क्योंकि इससे समय तथा शक्ति की बचत होगी ।

उदाहरणार्थ , यदि किसी ऊँची इमारत की चोटी तक एलीवेटर ( लिफ्ट ) के द्वारा पहुँचने की सुविधा हो तो फिर एक – एक सीढ़ी करके ऊपर क्यों चढ़ा जाये ? सब कुछ कृष्ण की शक्ति पर आश्रित है , अतः कृष्ण की शरण लिये बिना किसी वस्तु का अस्तित्व नहीं हो सकता । कृष्ण परम शासक हैं , क्योंकि सब कुछ उन्हीं का है और उन्हीं की शक्ति पर आश्रित है ।

प्रत्येक जीव के हृदय में स्थित होने के कारण कृष्ण परम साक्षी हैं । हमारा घर , देश या लोक जहाँ पर हम रह रहें हैं , सब कुछ कृष्ण का है । शरण के लिए कृष्ण परम गन्तव्य हैं , अतः मनुष्य को चाहिए कि अपनी रक्षा या अपने कष्टों के विनाश के लिए कृष्ण की शरण ग्रहण करे । हम चाहे जहाँ भी शरण लें हमें जानना चाहिए कि हमारा आश्रय कोई जीवित शक्ति होनी चाहिए । कृष्ण परम जीव हैं ।

चूँकि कृष्ण हमारी उत्पत्ति के कारण या हमारे परमपिता हैं , अतः उनसे बढ़कर न तो कोई मित्र हो सकता है , न शुभचिन्तक । कृष्ण सृष्टि के आदि उद्गम और प्रलय के पश्चात् परम विश्रामस्थल हैं । अतः कृष्ण सभी कारणों के शाश्वत कारण हैं । 

तपाम्यहमहं   वर्षं   निगृह्णाम्युत्सृजामि  च । 

       अमृतं   चैव     मृत्युश्च    सदसच्चाहमर्जुन ॥ १९ ॥

तपामि   –    ताप देता हूँ , गर्मी पहुँचाता हूँ   ;    अहम्   –   मैं   ;   अहम्  –   मैं  ;   वर्षम्  –   वर्षा   ; निगृह्णामि    –    रोके रहता हूँ   ;   उत्सृजामि   –   भेजता हूँ  ;    च   –   तथा   ;   अमृतम्   – अमरत्व   ;   च   –   तथा   ;   एव   –   निश्चय ही   ;   मृत्युः  –   मृत्यु  ;   च   –   तथा   ;    सत्   – आत्मा   ;   असत्   –   पदार्थ   ;    च   –  तथा  ;   अहम्   –  मैं   ;   अर्जुन  –  हे अर्जुन । 

हे अर्जुन ! मैं ही ताप प्रदान करता हूँ और वर्षा को रोकता तथा लाता हूँ । मैं अमरत्व हूँ और साक्षात् मृत्यु भी हूँ । आत्मा तथा पदार्थ ( सत् तथा असत् ) दोनों मुझ ही में हैं । 

तात्पर्य :- कृष्ण अपनी विभिन्न शक्तियों से विद्युत तथा सूर्य के द्वारा ताप तथा प्रकाश विखेरते हैं । ग्रीष्म ऋतु में कृष्ण ही आकाश से वर्षा नहीं होने देते और वर्षा ऋतु में वे ही अनवरत वर्षा की झड़ी लगाते हैं । जो शक्ति हमें जीवन प्रदान करती है वह कृष्ण है और अंत में मृत्यु रूप में हमें कृष्ण मिलते हैं । कृष्ण की इन विभिन्न शक्तियों का विश्लेषण करने पर यह निश्चित हो जाता है कि कृष्ण के लिए पदार्थ तथा आत्मा में कोई अन्तर नहीं है , अथवा दूसरे शब्दों में , वे पदार्थ तथा आत्मा दोनों हैं ।

अतः कृष्णभावनामृत की उच्च अवस्था में ऐसा भेद नहीं माना जाता । मनुष्य हर वस्तु में कृष्ण के ही दर्शन करता है । चूँकि कृष्ण पदार्थ तथा आत्मा दोनों हैं , अतः समस्त भौतिक प्राकट्टयों से युक्त यह विराट विश्व रूप भी कृष्ण है एवं वृन्दावन में दो भुजावाले वंशी वादन करते श्यामसुन्दर रूप में उनकी लीलाएँ उनके भगवान् रूप की होती हैं ।

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