भगवद गीता – अध्याय 9.3 ~ भगवान का तिरस्कार करने वाले आसुरी प्रकृति वालों की निंदा और देवी प्रकृति वालों के भगवद् भजन का वर्णन / Bhagwad Geeta Chapter -9

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अध्याय नौ (Chapter -9)

भगवद गीता – अध्याय 9  में शलोक 11 से  शलोक 15  तक भगवान का तिरस्कार करने वाले आसुरी प्रकृति वालों की निंदा और देवी प्रकृति वालों के भगवद् भजन का वर्णन !

अवजानन्ति  मां  मूढा  मानुषीं  तनुमाश्रितम् । 

         परं    भावमजानन्तो     मम     भूतमहेश्वरम् ॥ ११ ॥   

अवजानन्ति   –  उपहास करते हैं    ;   माम्   –   मुझको   ;    मूढाः   –   मूर्ख व्यक्ति   ;   मानुषीम्   –   मनुष्य रूप में   ;   अजानन्तः   –    न जानते हुए  ;   तनुम्   –  शरीर  ;   आश्रितम्   –  मानते हुए  ;   परम्   –   दिव्य  ;   भावम्   –    स्वभाव को   ;   मम  –   मेरा   ;   भूत  –   प्रत्येक वस्तु का  ;   महा-ईश्वरम्   –   परम स्वामी । 

जब मैं मनुष्य रूप में अवतरित होता हूँ , तो मूर्ख मेरा उपहास करते हैं । वे मुझ परमेश्वर के दिव्य स्वभाव को नहीं जानते ।

तात्पर्य :- इस अध्याय के पूर्ववर्ती श्लोकों से यह स्पष्ट है कि यद्यपि भगवान् मनुष्य रूप में प्रकट होते हैं , किन्तु वे सामान्य व्यक्ति नहीं होते । जो भगवान् सारे विराट जगत का सुजन , पालन तथा संहार करता हो वह मनुष्य नहीं हो सकता । तो भी ऐसे अनेक मूर्ख हैं , जो कृष्ण को एक शक्तिशाली पुरुष के अतिरिक्त और कुछ नहीं मानते ।

वस्तुतः वे आदि परमपुरुष हैं , जैसा कि ब्रह्मसंहिता में प्रमाण स्वरूप कहा गया है- ईश्वरः परमः कृष्ण : -वे परम ईश्वर हैं । ईश्वर या नियन्ता अनेक हैं और वे एक दूसरे से बढ़कर प्रतीत होते हैं । भौतिक जगत् में सामान्य प्रबन्धकार्यों का कोई न कोई निर्देशक होता है , जिसके ऊपर एक सचिव होता है , फिर उसके ऊपर मन्त्री तथा उससे भी ऊपर राष्ट्रपति होता है । इनमें से हर एक नियन्त्रक होता है , किन्तु एक दूसरे के द्वारा नियन्त्रित होता है ।

ब्रह्मसंहिता में कहा गया है कि कृष्ण परम नियन्ता हैं । निस्सन्देह भौतिक जगत् तथा वैकुण्ठलोक दोनों में ही कई – कई निर्देशक होते हैं , किन्तु कृष्ण परम नियन्ता हैं ( ईश्वरः परमः कृष्णः ) तथा उनका शरीर सच्चिदानन्द रूप अर्थात अभौतिक होता है । पिछले श्लोकों में जिन अद्भुत कार्यकलापों का वर्णन हुआ है , वे भौतिक शरीर द्वारा सम्पन्न नहीं हो सकते ।

कृष्ण का शरीर सच्चिदानन्द रूप है । यद्यपि वे सामान्य व्यक्ति नहीं हैं , किन्तु मूर्ख लोग उनका उपहास करते हैं और उन्हें मनुष्य मानते हैं । उनका शरीर यहाँ मानुषीम् कहा गया है , क्योंकि वे कुरुक्षेत्र युद्ध में एक राजनीतिज्ञ और अर्जुन के मित्र की भाँति सामान्य व्यक्ति वनकर कर्म करते हैं । वे अनेक प्रकार से सामान्य पुरुष की भाँति कर्म करते हैं , किन्तु उनका शरीर सच्चिदानन्द विग्रह रूप है ।

इसकी पुष्टि वैदिक साहित्य में भी हुई है । सच्चिदानन्द रूपाय कृष्णाय- में भगवान् कृष्ण को नमस्कार करता हूँ जो सच्चिदानन्द रूप हैं ( गोपाल तापनी उपनिषद १.१ ) । वेदों में ऐसे अन्य वर्णन भी हैं । तमेकं गोविन्दम्- आप इन्द्रियों तथा गायों के आनन्दस्वरूप गोविन्द हैं । सच्चिदानन्दविग्रहम् – तथा आपका रूप सच्चिदानन्द स्वरूप है ( गोपाल – तापनी उपनिषद् १.३५ ) ।

भगवान् कृष्ण के सच्चिदानन्दस्वरूप होने पर भी ऐसे अनेक तथाकथित विद्वान् तथा भगवद्गीता के टीकाकार हैं जो कृष्ण को सामान्य पुरुष कहकर उनका उपहास करते हैं । भले ही अपने पूर्व पुण्यों के कारण विद्वान् असाधारण व्यक्ति के रूप में पैदा हुआ हो , किन्तु श्रीकृष्ण के बारे में ऐसी धारणा उसकी अल्पज्ञता के कारण होती है ।

इसीलिए वह मूढ कहलाता है , क्योंकि मूर्ख पुरुष ही कृष्ण को सामान्य पुरुष मानते हैं । ऐसे मूर्ख कृष्ण को सामान्य व्यक्ति इसीलिए मानते हैं , क्योंकि वे कृष्ण के गुह्य कर्मों तथा उनकी विभिन्न शक्तियों से अपरिचित होते हैं । वे यह नहीं जानते कि कृष्ण का शरीर पूर्णज्ञान तथा आनन्द का प्रतीक है , वे प्रत्येक वस्तु के स्वामी हैं और किसी को भी मुक्ति प्रदान करने वाले हैं । चूँकि वे कृष्ण के इतने सारे दिव्य गुणों को नहीं जानते , इसीलिए उनका उपहास करते हैं ।

ये मूढ यह भी नहीं जानते कि इस जगत में भगवान् का अवतरण उनकी अन्तरंगा शक्ति का प्राकट्य है । वे भौतिक शक्ति ( माया ) के स्वामी हैं । जैसा कि अनेक स्थलों पर कहा जा चुका है ( मम माया दुरत्यया ) , भगवान् का दावा है कि यद्यपि भौतिक शक्ति अत्यन्त प्रवल है , किन्तु वह उनके वश में रहती है और जो भी उनकी शरण ग्रहण कर लेता है , वह इस माया के वश से बाहर निकल आता है ।

यदि कृष्ण का शरणागत जीव माया के प्रभाव से बाहर निकल सकता है , तो भला परमेश्वर जो सम्पूर्ण विराट जगत का सृजन , पालन तथा संहारकर्ता है , हम लोगों जैसा शरीर कैसे धारण कर सकता है ? अतः कृष्ण विषयक ऐसी धारणा मूर्खतापूर्ण है । फिर भी मूर्ख व्यक्ति यह नहीं समझ सकते कि सामान्य व्यक्ति के रूप में प्रकट होने वाले भगवान् कृष्ण समस्त परमाणुओं तथा इस विराट ब्रह्माण्ड के नियन्ता किस तरह हो सकते हैं ।

वृहत्तम तथा सूक्ष्मतम तो उनकी विचार शक्ति से परे होते हैं , अतः वे यह सोच भी नहीं सकते कि मनुष्य जैसा रूप कैसे एक साथ विशाल को तथा अणु को वश में कर सकता है । यद्यपि कृष्ण असीम तथा ससीम को नियन्त्रित करते हैं , किन्तु वे इस जगत् से विलग रहते हैं । उनके योगमैश्वरम् या अचिन्त्य दिव्य शक्ति के विषय में कहा गया है कि वे एकसाथ ससीम तथा असीम को वश में रख सकते हैं , तो भी वे उनसे पृथक् रहते हैं ।

यद्यपि मूर्ख लोग यह सोच भी नहीं पाते कि मनुष्य रूप में उत्पन्न होकर कृष्ण किस तरह असीम तथा ससीम को वश में कर सकते हैं , किन्तु जो शुद्धभक्त हैं वे इसे स्वीकार करते हैं , क्योंकि उन्हें पता है कि कृष्ण भगवान् हैं । अतः वे पूर्णतया उनकी शरण में जाते हैं और कृष्णभावनामृत में रहकर कृष्ण की भक्ति में अपने को रत रखते हैं ।

सगुणवादियों तथा निर्गुणवादियों में भगवान् के मनुष्य रूप में प्रकट होने को लेकर फी मत है । किन्तु यदि हम भगवद्गीता तथा श्रीमद्भागवत जैसे णिक ग्रंथों का अनुशीलन कृष्णतत्त्व समझने के लिए करें तो हम समझ सकते हैं कि कृष्ण श्रीभगवान् हैं । यद्यपि वे इस धराधाम में सामान्य व्यक्ति की भाँति प्रकट हुए थे , किन्तु वे सामान्य व्यक्ति हैं नहीं । श्रीमद्भागवत में ( १.१.२० ) जब शौनक आदि मुनियों ने सूत गोस्वामी से कृष्ण के कार्यकलापों के विषय में पूछा तो उन्होंने कहा 

कृतवान्  किल  कर्माणि  सह  रामेण  केशवः ।

अतिमर्त्यानि   भगवान्    गूढः    कपटमानुषः ।।

“ भगवान् श्रीकृष्ण ने बलराम के साथ – साथ मनुष्य की भाँति क्रीड़ा की और इस तरह प्रच्छन्न रूप में उन्होंने अनेक अतिमानवीय कार्य किये । ” मनुष्य के रूप में भगवान् का प्राकट्य मूर्ख को मोहित बना देता है । कोई भी मनुष्य उन अलौकिक कार्यों को सम्पन्न नहीं कर सकता जिन्हें उन्होंने इस धरा पर करके दिखा दिया था । जब कृष्ण अपने पिता तथा माता ( वसुदेव तथा देवकी ) के समक्ष प्रकट हुए तो वे चार भुजाओं से युक्त थे ।

किन्तु माता – पिता की प्रार्थना पर उन्होंने एक सामान्य शिशु का रूप धारण कर लिया- बभूव प्राकृतः शिशुः ( भागवत १०.३.४६ ) । वे एक सामान्य शिशु , एक सामान्य मानव बन गये । यहाँ पर भी यह इंगित होता है कि सामान्य व्यक्ति के रूप में प्रकट होना उनके दिव्य शरीर का एक गुण है । भगवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय में भी कहा गया है कि अर्जुन ने कृष्ण से अपना चतुर्भुज रूप दिखलाने के लिए प्रार्थना की ( तेनेव रूपेण चतुर्भुजेन ) ।

इस रूप को प्रकट करने के बाद अर्जुन के प्रार्थना करने पर उन्होंने पूर्व मनुष्य रूप धारण कर लिया ( मानुषं रूपम् ) । भगवान् के ये विभिन्न गुण निश्चय ही सामान्य मनुष्य जैसे नहीं हैं । कतिपय लोग , जो कृष्ण का उपहास करते हैं और मायावादी दर्शन से प्रभावित होते हैं , श्रीमद्भागवत के निम्नलिखित श्लोक ( ३.२ ९ .२१ ) को यह सिद्ध करने के लिए उद्धृत करते हैं कि कृष्ण एक सामान्य व्यक्ति थे ।

अहं सर्वेषु भूतेषु भूतात्मावस्थितः सदा – परमेश्वर समस्त जीवों में विद्यमान है । अच्छा हो कि इस श्लोक को हम जीव गोस्वामी तथा विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर जैसे वैष्णव आचार्यों से ग्रहण करें , न कि कृष्ण का उपहास करने वाले अनधिकारी व्यक्तियों की व्याख्याओं से जीव गोस्वामी इस श्लोक की टीका करते हुए कहते हैं कि कृष्ण समस्त चराचरों में अपने अंश विस्तार परमात्मा के रूप में स्थित हैं ।

अतः कोई भी नवदीक्षित भक्त जो मन्दिर में भगवान् की अर्चामूर्ति पर ही ध्यान देता है और अन्य जीवों का सम्मान नहीं करता वह वृथा ही मन्दिर में भगवान् की पूजा में लगा रहता है । भगवद्भक्तों के तीन प्रकार हैं , जिनमें से नवदीक्षित सबसे निम्न श्रेणी के हैं । नवदीक्षित भक्त अन्य भक्तों की अपेक्षा मन्दिर के अर्चाविग्रह पर अधिक ध्यान देते हैं , अतः विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर चेतावनी देते हैं कि इस प्रकार की मानसिकता को सुधारना चाहिए ।

भक्त को समझना चाहिए कि चूँकि कृष्ण परमात्मा रूप में प्रत्येक जीव के हृदय में विद्यमान हैं , अतः प्रत्येक व्यक्ति परमेश्वर का निवास या मन्दिर है , इसलिए जिस तरह कोई भक्त भगवान् के मन्दिर का सम्मान करता है , वैसे ही उसे प्रत्येक जीव का सम्मान करना चाहिए , जिसमें परमात्मा निवास करता है । अतः प्रत्येक व्यक्ति का समुचित सम्मान करना चाहिए , कभी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए ।

ऐसे अनेक निर्विशेषवादी हैं जो मन्दिरपूजा का उपहास करते हैं । वे कहते हैं कि चूँकि भगवान् सर्वत्र हैं तो फिर अपने को हम मन्दिरपूजा तक ही सीमित क्यों रखें ? यदि ईश्वर सर्वत्र हैं तो क्या वे मन्दिर या अर्चाविग्रह में नहीं होंगे ? यद्यपि सगुणवादी तथा निर्विशेषवादी निरन्तर लड़ते रहेंगे , किन्तु कृष्णभावनामृत में पूर्ण भक्त यह जानता है कि यद्यपि कृष्ण भगवान् हैं , किन्तु इसके साथ वे सर्वव्यापी भी हैं , जिसकी पुष्टि ब्रह्मसंहिता में हुई है ।

यद्यपि उनका निजी धाम गोलोक वृन्दावन है और वे वहीं निरन्तर वास करते हैं , किन्तु वे अपनी शक्ति की विभिन्न अभिव्यक्तियों द्वारा तथा अपने स्वांश द्वारा भौतिक तथा आध्यात्मिक जगत् में सर्वत्र विद्यमान रहते हैं । 

मोघाशा  मोघकर्माणो  मोघज्ञाना  विचेतसः । 

       राक्षसीमासुरीं  चैव  प्रकृतिं  मोहिनीं  श्रिताः ॥ १२ ॥

मोघ-आशा:   –   निष्फल आशा   ;    मोघ-कर्माणः   –    निष्फल सकाम कर्म   ;   मोघ-ज्ञाना:   – विफल ज्ञान   ;   विचेतसः   –   मोहग्रस्त   ;   राक्षसीम्   –  राक्षसी  ;   आसुरीम्   –   आसुरी  ;   च –    तथा  ;    एव   –   निश्चय ही   ;     प्रकृतिम्   –   स्वभाव को   ;    मोहिनीम्   –   मोहने वाली    ;   श्रिताः   –   शरण ग्रहण किये हुए । 

जो लोग इस प्रकार मोहग्रस्त होते हैं , वे आसुरी तथा नास्तिक विचारों के प्रति आकृष्ट रहते हैं । इस मोहग्रस्त अवस्था में उनकी मुक्ति – आशा , उनके सकाम कर्म तथा ज्ञान का अनुशीलन सभी निष्फल हो जाते हैं । 

तात्पर्य :- ऐसे अनेक भक्त हैं जो अपने को कृष्णभावनामृत तथा भक्ति में रत दिखलाते हैं , किन्तु अन्तःकरण से वे भगवान् कृष्ण को परब्रह्म नहीं मानते । ऐसे लोगों को कभी भी भक्ति – फल- भगवद्धाम गमन प्राप्त नहीं होता । इसी प्रकार जो पुण्यकमों में लगे रहकर अन्ततोगत्वा इस भववन्धन से मुक्त होना चाहते हैं , वे भी सफल नहीं हो पाते , क्योंकि वे कृष्ण का उपहास करते हैं ।

दूसरे शब्दों में , जो लोग कृष्ण पर हँसते हैं , उन्हें आसुरी या नास्तिक समझना चाहिए । जैसा कि सातवें अध्याय में बताया जा चुका है , ऐसे आसुरी दुष्ट कभी भी कृष्ण की शरण में नहीं जाते । अतः परमसत्य तक पहुँचने के उनके मानसिक चिन्तन उन्हें इस मिथ्या परिणाम को प्राप्त कराते हैं कि सामान्य जीव तथा कृष्ण एक समान हैं ।

ऐसी मिथ्या धारणा के कारण वे सोचते हैं कि अभी तो यह शरीर प्रकृति द्वारा केवल आच्छादित है और ज्योंही व्यक्ति मुक्त होगा , तो उसमें तथा ईश्वर में कोई अन्तर नहीं रह जाएगा । कृष्ण से समता का यह प्रयास भ्रम के कारण निष्फल हो जाता है । इस प्रकार का आसुरी तथा नास्तिक ज्ञान – अनुशीलन सदैव व्यर्थ रहता है , यही इस श्लोक का संकेत है ।

ऐसे व्यक्तियों के लिए वेदान्त सूत्र तथा उपनिषदों जैसे वैदिक वाङ्मय के ज्ञान का अनुशीलन सदा निष्फल होता है । अतः भगवान् कृष्ण को सामान्य व्यक्ति मानना घोर अपराध है । जो ऐसा करते हैं वे निश्चित रूप से मोहग्रस्त रहते हैं , क्योंकि वे कृष्ण के शाश्वत रूप को नहीं समझ पाते । बृहविष्णु स्मृति का कथन है 

यो   वेत्ति   भौतिक   देहं   कृष्णस्य    परमात्मनः ।

स   सर्वस्माद्    बहिष्कार्यः    श्रौतस्मार्तविधानतः ।

मुखं     तस्यावलोक्यापि    सचेलं    स्नानमाचरेत् ॥

“ जो कृष्ण के शरीर को भौतिक मानता है उसे श्रुति तथा स्मृति के समस्त अनुष्ठानों से वंचित कर देना चाहिए । यदि कोई भूल से उसका मुँह देख ले तो उसे तुरन्त गंगा स्नान करना चाहिए , जिससे छूत दूर हो सके । ” लोग कृष्ण की हँसी उड़ाते हैं क्योंकि वे भगवान् से ईर्ष्या करते हैं । उनके भाग्य में जन्म – जन्मान्तर नास्तिक तथा असुर योनियों में रहे आना लिखा है । उनका वास्तविक ज्ञान सदैव के लिए भ्रम में रहेगा और धीरे धीरे वे सृष्टि के गहनतम अन्धकार में गिरते जायेंगे । ” 

महात्मानस्तु   मां  पार्थ  दैवीं  प्रकृतिमाश्रिताः ।  

       भजन्त्यनन्यमनसो   ज्ञात्वा    भूतादिमव्ययम् ॥ १३ ॥

महा-आत्मनः   –   महापुरुष  ;    तु   –   लेकिन   ;   माम्   –  मुझको   ;    पार्थ   –   हे पृथापुत्र    ; देवीम्   –  देवी    ;   प्रकृतिम्  –   प्रकृति के   ;   आश्रिताः   –   शरणागत   ;    भजन्ति   –   सेवा करते हैं   ;   अनन्य-मनसः   –   अविचलित मन से   ;    ज्ञात्वा   –   जानकर   ;   भूत   –  सृष्टि का   ; आदिम्   –   उद्गम  ;   अव्ययम्   –   अविनाशी । 

  हे पार्थ ! मोहमुक्त महात्माजन दैवी प्रकृति के संरक्षण में रहते हैं । वे पूर्णतः भक्ति में निमग्न रहते हैं क्योंकि वे मुझे आदि तथा अविनाशी भगवान् के रूप में जानते हैं । 

तात्पर्य :- इस श्लोक में महात्मा का वर्णन हुआ है । महात्मा का सबसे पहला लक्षण यह है कि वह देवी प्रकृति में स्थित रहता है । वह भौतिक प्रकृति के अधीन नहीं होता और यह होता कैसे है ? इसकी व्याख्या सातवें अध्याय में की गई है जो भगवान् श्रीकृष्ण की शरण ग्रहण करता है वह तुरन्त ही भौतिक प्रकृति के वश से मुक्त हो जाता है ।

यही वह पात्रता है । ज्योंही कोई भगवान् का शरणागत हो जाता है वह भौतिक प्रकृति के वश से मुक्त हो जाता है । यही मूलभूत सूत्र है । तटस्था शक्ति होने के कारण जीव ज्याही भौतिक प्रकृति के वश से मुक्त होता है त्योंही वह आध्यात्मिक प्रकृति के निर्देशन में चला जाता है । आध्यात्मिक प्रकृति का निर्देशन ही देवी प्रकृति कहलाती है ।

इस प्रकार से जब कोई भगवान् के शरणागत होता है तो उसे महात्मा पद की प्राप्ति होती है । महात्मा अपने ध्यान को कृष्ण के अतिरिक्त अन्य किसी ओर नहीं ले जाता , क्योंकि वह भलीभांति जानता है कि कृष्ण ही आदि परम पुरुष , समस्त कारणों के कारण हैं । इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है । ऐसा महात्मा अन्य महात्माओं या शुद्धभक्तों की संगति से प्रगति करता है ।

शुद्धभक्त तो कृष्ण के अन्य स्वरूपों , यथा चतुर्भुज महाविष्णु रूप से भी आकृष्ट नहीं होते । वे न तो कृष्ण के अन्य किसी रूप से आकृष्ट होते हैं , न ही वे देवताओं या मनुष्यों के किसी रूप की परवाह करते हैं । वे कृष्णभावनामृत में केवल कृष्ण का ध्यान करते हैं । वे कृष्णभावनामृत में निरन्तर भगवान् की अविचल सेवा में लगे रहते हैं । 

सततं    कीर्तयन्तो     मां    यतन्तश्च    दृढव्रताः । 

        नमस्यन्तश्च   मां  भक्त्या  नित्ययुक्ता  उपासते ॥ १४ ॥ 

सततम्   –   निरन्तर   ;   कीर्तयन्तः   –   कीर्तन करते हुए   ;    माम्   –  मेरे विषय में   ;   यतन्तः  –  प्रयास करते हुए   ;    च   –   भी   ;   दृढ-व्रताः   –  संकल्पपूर्वक  ;   नमस्यन्तः   –   नमस्कार करते हुए   ;   च   –   तथा   ;   माम्   –   मुझको  ;   भक्त्या   –   भक्ति में    ;    नित्य-युक्ताः   –  सदैव रत रहकर   ;   उपासते  –   पूजा करते हैं । 

ये महात्मा मेरी महिमा का नित्य कीर्तन करते हुए दृढसंकल्प के साथ प्रयास करते हुए , मुझे नमस्कार करते हुए , भक्तिभाव से निरन्तर मेरी पूजा करते हैं । 

तात्पर्य :- सामान्य पुरुष को रबर की मुहर लगाकर महात्मा नहीं बनाया जाता । यहाँ पर उसके लक्षणों का वर्णन किया गया है – महात्मा सदैव भगवान् कृष्ण के गुणों का कीर्तन करता रहता है , उसके पास कोई दूसरा कार्य नहीं रहता । वह सदैव कृष्ण के गुण – गान में व्यस्त रहता है । दूसरे शब्दों में , वह निर्विशेषवादी नहीं होता ।

जब गुण – गान का प्रश्न उठे तो मनुष्य को चाहिए कि वह भगवान् के पवित्र नाम , उनके नित्य रूप , उनके दिव्य गुणों तथा उनकी असामान्य लीलाओं की प्रशंसा करते हुए परमेश्वर को महिमान्वित करे । उसे इन सारी वस्तुओं को महिमान्वित करना होता है , अतः महात्मा भगवान् के प्रति आसक्त रहता है । जो व्यक्ति परमेश्वर के निराकार रूप , ब्रह्मज्योति के प्रति आसक्त होता है उसे भगवद्गीता में महात्मा नहीं कहा गया ।

उसे अगले श्लोक में अन्य प्रकार से वर्णित किया गया है । महात्मा सदैव भक्ति के विविध कार्यों में , यथा विष्णु के श्रवण – कीर्तन में , व्यस्त रहता है , जैसा कि श्रीमद्भागवत में उल्लेख है । यही भक्ति श्रवणं कीर्तनं विष्णोः तथा स्मरणं है । ऐसा महात्मा अन्ततः भगवान् के पाँच दिव्य रसों में से किसी एक रस में उनका सान्निध्य प्राप्त करने के लिए दृढव्रत होता है ।

इसे प्राप्त करने के लिए वह मनसा वाचा कर्मणा अपने सारे कार्यकलाप भगवान् कृष्ण की सेवा में लगाता है । यही पूर्ण कृष्णभावनामृत कहलाता है । भक्ति में कुछ कार्य हैं जिन्हें दृढव्रत कहा जाता है , यथा प्रत्येक एकादशी को तथा भगवान् के आविर्भाव दिवस ( जन्माष्टमी ) पर उपवास करना ।

ये सारे विधि – विधान महान आचार्यों द्वारा उन लोगों के लिए बनाये गये हैं जो दिव्यलोक में भगवान् का सान्निध्य प्राप्त करने के इच्छुक हैं । महात्माजन इन विधि – विधानों का दृढ़ता से पालन करते हैं । फलतः उनके लिए वाञ्छित फल की प्राप्ति निश्चित रहती है । जैसा कि इसी अध्याय के द्वितीय श्लोक में कहा गया है , यह भक्ति न केवल सरल है अपितु , इसे सुखपूर्वक किया जा सकता है ।

इसके लिए कठिन तपस्या करने की आवश्यकता नहीं पड़ती । मनुष्य सक्षम गुरु के निर्देशन में इस जीवन को गृहस्थ , संन्यासी या ब्रह्मचारी रहते हुए भक्ति में बिता सकता है । वह संसार में किसी भी अवस्था में कहीं भी भगवान् की भक्ति करके वास्तव में महात्मा बन सकता है । 

ज्ञानयज्ञेन    चाप्यन्ये   यजन्तो   मामुपासते । 

       एकत्वेन    पृथक्त्वेन   बहुधा  विश्वतोमुखम् ॥ १५ ॥ 

ज्ञान-यज्ञेन   –   ज्ञान के अनुशीलन द्वारा   ;   च   –   भी   ;   अपि   –   निश्चय ही   ;   अन्ये  –  अन्य लोग  ;    यजन्तः   –   यज्ञ करते हुए  ;   माम्   –   मुझको  ;   उपासते   –   पूजते हैं   ;   एकत्वेन  –   एकान्त भाव से   ;   पृथक्त्वेन   –   द्वैतभाव से   ;    बहुधा   –   अनेक प्रकार से   ;   विश्वतः  मुखम्   –   विश्व रूप में । 

अन्य लोग जो ज्ञान के अनुशीलन द्वारा यज्ञ में लगे रहते हैं , वे भगवान् की पूजा उनके अद्वय रूप में , विविध रूपों में तथा विश्व रूप में करते हैं । 

तात्पर्य :- यह श्लोक पिछले श्लोकों का सारांश है । भगवान् अर्जुन को बताते हैं कि जो विशुद्ध कृष्णभावनामृत में लगे रहते हैं और कृष्ण के अतिरिक्त अन्य किसी को नहीं जानते , वे महात्मा कहलाते हैं । तो भी कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो वास्तव में महात्मा पद को प्राप्त नहीं होते , किन्तु वे भी विभिन्न प्रकारों से कृष्ण की पूजा करते हैं ।

इनमें से कुछ का वर्णन आर्त , अर्थार्थी , ज्ञानी तथा जिज्ञासु के रूप में किया जा चुका है । किन्तु फिर भी कुछ ऐसे भी लोग होते हैं जो इनसे भी निम्न होते हैं । इन्हें तीन कोटियों में रखा जाता है -१ ) परमेश्वर तथा अपने को एक मानकर पूजा करने वाले , २ ) परमेश्वर के किसी मनोकल्पित रूप की पूजा करने वाले तथा ३ ) भगवान् के विश्व रूप की पूजा करने वाले ।

इनमें से सबसे अधम वे हैं जो अपने आपको अद्वैतवादी मानकर अपनी पूजा परमेश्वर के रूप में करते हैं और इन्हीं का प्राधान्य भी है । ऐसे लोग अपने को परमेश्वर मानते हैं और इस मानसिकता के कारण वे अपनी पूजा आप करते हैं । यह भी एक प्रकार की ईशपूजा है , क्योंकि वे समझते हैं कि वे भौतिक पदार्थ न होकर आत्मा हैं । कम से कम , ऐसा भाव तो प्रधान रहता है ।

सामान्यतया निर्विशेषवादी इसी प्रकार से परमेश्वर को पूजते हैं । दूसरी कोटि के लोग वे हैं जो देवताओं के उपासक हैं , जो अपनी कल्पना से किसी भी स्वरूप को परमेश्वर का स्वरूप मान लेते हैं । तृतीय कोटि में वे लोग आते हैं जो इस ब्रह्माण्ड से परे कुछ भी नहीं सोच पाते । वे ब्रह्माण्ड को ही परम जीव या सत्ता मानकर उसकी उपासना करते हैं । यह ब्रह्माण्ड भी भगवान का एक स्वरूप है ।

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