भगवद गीता – अध्याय 9.2 ~ जगत की उत्पत्ति का विषय का  वर्णन / Bhagwad Geeta Chapter -9

अध्याय नौ (Chapter -9)

भगवद गीता – अध्याय 9  में शलोक 07 से  शलोक 10  तक जगत की उत्पत्ति का विषय का वर्णन !

सर्वभूतानि  कौन्तेय  प्रकृतिं  यान्ति  मामिकाम् । 

      कल्पक्षय  पुनस्तानि  कल्पादौ    विसृजाम्यहम् ॥ ७ ॥

सर्वभूतानि   –   सारे प्राणी   ;   प्रकृतिम्  –   प्रकृति में   ;   यान्ति  –   प्रवेश करते हैं   ;   मामिकाम  –    मेरी  ;   कल्प-क्षये  –   कल्पान्त में   ;   पुनः  –  फिर से  ;   तानि  –  उन सर्वो को   ;   कल्प-आदी   –   कल्प के प्रारम्भ में  ;   विसृजामि   –  उत्पन्न करता हूँ   ;   अहम्   –  में । 

हे कुन्तीपुत्र ! कल्प का अन्त होने पर सारे प्राणी मेरी प्रकृति में प्रवेश करते हैं और अन्य कल्प के आरम्भ होने पर में उन्हें अपनी शक्ति से पुनः उत्पन्न करता हूँ । 

तात्पर्य :- इस विराट भोतिक अभिव्यक्ति का सृजन , पालन तथा संहार पूर्णतया भगवान की परम इच्छा पर निर्भर है । कल्पक्षये का अर्थ है , ब्रह्मा की मृत्यु होने पर ब्रह्मा एक सो वर्ष जीवित रहते हैं और उनका एक दिन हमारे ४,३०,००,००,००० वर्षों के तुल्य है ।

रात्रि भी इतने ही वर्षों की होती है । ब्रह्मा के एक महीने में ऐसे तीस दिन तथा तीस रातें होती हैं और उनके एक वर्ष में ऐसे वारह महीने होते हैं । ऐसे एक सो वर्षों के बाद जब ब्रह्मा की मृत्यु होती है , तो प्रलय हो जाता है , जिसका अर्थ है कि भगवान् द्वारा प्रकट शक्ति पुनः सिमट कर उन्हीं में चली जाती है । पुनः जब विराटजगत को प्रकट करने की आवश्यकता होती है तो उनकी इच्छा से सृष्टि उत्पन्न होती है ।

एकोऽहं बहु स्याम् यद्यपि में अकेला हूँ , किन्तु में अनेक हो जाऊँगा । यह वैदिक सूक्ति है । ( छान्दोग्य उपनिषद् ६.२.३ ) । वे इस भौतिक शक्ति में अपना विस्तार करते हैं और सारी विराट अभिव्यक्ति पुनः घटित हो जाती है । 

प्रकृतिं  स्वामवष्टभ्य  विसृजामि  पुनः  पुनः ।

        भूतग्राममिमं    कृत्स्नमवशं     प्रकृतेर्वशात् ॥ ८ ॥ 

प्रकृतिम्    –   प्रकृति में     ;     स्वाम्   –  मेरी निजी  ;   अवष्टभ्य  –   प्रवेश करके   ;   विसृजामि   – उत्पन्न करता हूँ  ;   पुनः पुन:   –   वारम्बार   ;   भूत-ग्रामम्   –   समस्त विराट अभिव्यक्ति को  ;   इमम्   –   इस  ;   कृत्स्त्रम्   –  पूर्णतः   ;   अवशम्   –  स्वतः   ;    प्रकृतेः   –   प्रकृति की शक्ति के   ;   वशात्   –  वश में । 

सम्पूर्ण विराट जगत मेरे अधीन है । यह मेरी इच्छा से बारम्बार स्वतः प्रकट होता रहता है और मेरी ही इच्छा से अन्त में विनष्ट होता है ।

  तात्पर्य :- यह भौतिक जगत् भगवान् की अपराशक्ति की अभिव्यक्ति है । इसकी व्याख्या कई बार की जा चुकी है । सृष्टि के समय यह शक्ति महत्तत्त्व के रूप में प्रकट होती है जिसमें भगवान् अपने प्रथम पुरुष अवतार , महाविष्णु के रूप में प्रवेश कर जाते हैं ।

वे कारणार्णव में शयन करते रहते हैं और अपने श्वास से असंख्य ब्रह्माण्ड निकालते हैं और इन ब्रह्माण्डों में से हर एक में वे गर्भादकशायी विष्णु के रूप में प्रवेश करते हैं । इस प्रकार प्रत्येक ब्रह्माण्ड की सृष्टि होती है । वे इससे भी आगे अपने आपको क्षीरोदकशायी विष्णु के रूप में प्रकट करते हैं और यह विष्णु प्रत्येक वस्तु में , यहाँ तक कि प्रत्येक अणु में प्रवेश कर जाते हैं ।

इसी तथ्य की व्याख्या यहाँ हुई है । भगवान् प्रत्येक वस्तु में प्रवेश करते हैं । जहाँ तक जीवात्माओं का सम्बन्ध है , वे इस भौतिक प्रकृति में गर्भस्थ किये जाते हैं और वे अपने – अपने पूर्वकमों के अनुसार विभिन्न योनियाँ ग्रहण करते हैं । इस प्रकार इस भौतिक जगत् के कार्यकलाप प्रारम्भ होते हैं । विभिन्न जीव – योनियों के कार्यकलाप सृष्टि के समय से ही प्रारम्भ हो जाते हैं ।

ऐसा नहीं है कि ये योनियाँ क्रमशः विकसित होती हैं । सारी की सारी योनियाँ ब्रह्माण्ड की सृष्टि के साथ ही उत्पन्न होती हैं । मनुष्य , पशु , पक्षी- ये सभी एकसाथ उत्पन्न होते हैं , क्योंकि पूर्व प्रलय के समय जीवों की जो जो इच्छाएँ थीं वे पुनः प्रकट होती हैं । इसका स्पष्ट संकेत अवशम् शब्द से मिलता है कि जीवों को इस प्रक्रिया से कोई सरोकार नहीं रहता ।

पूर्व सृष्टि में वे जिस – जिस अवस्था में थे , वे उस उस अवस्था में पुनः प्रकट हो जाते हैं और यह सब भगवान् की इच्छा से ही सम्पन्न होता है । यही भगवान् की अचिन्त्य शक्ति है । विभिन्न योनियों को उत्पन्न करने के बाद भगवान् का उनसे कोई नाता नहीं रह जाता । यह सृष्टि विभिन्न जीवों की रुचियों को पूरा करने के उद्देश्य से की जाती है । अतः भगवान् इसमें किसी तरह से बद्ध नहीं होते हैं । 

न  च  मां  तानि  कर्माणि  निबध्नन्ति  धनञ्जय ।

        उदासीनवदासीनमसक्तं      तेषु        कर्मसु ॥ ९ ॥

न   –   कभी नहीं    ;    च   –   भी  ;   माम्  –   मुझको    ;    तानि   –   वे   ;   कर्माणि   –  कर्म   ; निबध्नन्ति   –   बाँधते हैं   ;   धनञ्जय  –   हे धन के विजेता   ;    उदासीन-वत्    –   रपेक्ष या तटस्थ की तरह   ;  आसीनम्   –   स्थित हुआ   ;   असक्तम्   –   आसक्तिरहित  ;   तेषु   –  उन   ;    कर्मसु   –  कार्यों में  । 

हे धनञ्जय ! ये सारे कर्म मुझे नहीं बाँध पाते हैं । मैं उदासीन की भाँति इन सारे भौतिक कर्मों से सदैव विरक्त रहता हूँ । 

तात्पर्य :- इस प्रसंग में यह नहीं सोच लेना चाहिए कि भगवान के पास कोई काम नहीं है । वे अपने वैकुण्ठलोक में सदैव व्यस्त रहते हैं । ब्रह्मसंहिता में ( ५.६ ) कहा गया है- आत्मारामस्य तस्यास्ति प्रकृत्या न समागमः – वे सतत दिव्य आनन्दमय आध्यात्मिक कार्यों में रत रहते हैं , किन्तु इन भौतिक कार्यों से उनका कोई सरोकार नहीं रहता ।

सारे भौतिक कार्य उनकी विभिन्न शक्तियों द्वारा सम्पन्न होते रहते हैं । वे सदा ही इस सृष्टि के भौतिक कार्यों के प्रति उदासीन रहते हैं । इस उदासीनता को ही यहाँ पर उदासीनवत् कहा गया है । यद्यपि छोटे से छोटे भौतिक कार्य पर उनका नियन्त्रण रहता है , किन्तु वे उदासीनवत् स्थित रहते हैं । यहाँ पर उच्च न्यायालय के न्यायाधीश का उदाहरण दिया जा सकता है , जो अपने आसन पर बैठा रहता है ।

उसके आदेश से अनेक तरह की बातें घटती रहती हैं – किसी को फाँसी दी जाती है , किसी को कारावास की सजा मिलती है , तो किसी को प्रचुर धनराशि मिलती है , तो भी वह उदासीन रहता है । उसे इस हानि लाभ से कुछ भी लेना – देना नहीं रहता । इसी प्रकार भगवान् भी सदैव उदासीन रहते हैं , यद्यपि प्रत्येक कार्य में उनका हाथ रहता है ।

वेदान्तसूत्र में ( २.१.३४ ) यह कहा गया है- वैषम्यनेर्घृण्ये नवे इस जगत् के द्वन्द्वों में स्थित नहीं हैं । वे इन द्वन्द्वों से अतीत हैं । न ही इस जगत् की सृष्टि तथा प्रलय में ही उनकी आसक्ति रहती है । सारे जीव अपने पूर्वकर्मों के अनुसार विभिन्न योनियाँ ग्रहण करते रहते हैं और भगवान् इसमें कोई व्यवधान नहीं डालते ।

मयाध्यक्षेण  प्रकृतिः  सूयते  सचराचरम् । 

       हेतुनानेन     कौन्तेय     जगद्विपरिवर्तते ॥ १० ॥

मया   –   मेरे द्वारा   ;    अध्यक्षेण   –   अध्यक्षता के कारण   ;   प्रकृतिः   –   प्रकृति  ;   सूयते   –  प्रकट होती है   ;    स   –   सहित   ;    चर-अचरम्   –   जड़ तथा जंगम   ;    हेतुना   –   कारण से   ; अनेन   –   इस  ;   कौन्तेय   –  हे कुन्तीपुत्र   ;   जगत्   –   दृश्य जगत  ;   विपरिवर्तते   –   क्रियाशील है । 

हे कुन्तीपुत्र ! यह भौतिक प्रकृति मेरी शक्तियों में से एक है और मेरी अध्यक्षता में कार्य करती है , जिससे सारे चर तथा अचर प्राणी उत्पन्न होते हैं । इसके शासन में यह जगत् बारम्बार सृजित और विनष्ट होता रहता है । 

तात्पर्य :- यहाँ यह स्पष्ट कहा गया है कि यद्यपि परमेश्वर इस जगत् के समस्त कार्यों से पृथक् रहते हैं , किन्तु इसके परम अध्यक्ष ( निर्देशक ) वही बने रहते हैं । परमेश्वर परम इच्छामय हैं और इस भौतिक जगत् के आधारभूमिस्वरूप हैं , किन्तु इसकी सभी व्यवस्था प्रकृति द्वारा की जाती है । भगवद्गीता में भी कृष्ण यह कहते हैं- ” मैं विभिन्न योनियों और रूपों वाले जीवों का पिता हूँ । “

जिस तरह पिता बालक उत्पन्न करने के लिए माता के गर्भ में वीर्य स्थापित करता है , उसी प्रकार परमेश्वर अपनी चितवन मात्र से प्रकृति के गर्भ में जीवों को प्रविष्ट करते हैं और वे अपनी अन्तिम इच्छाओं तथा कर्मों के अनुसार विभिन्न रूपों तथा योनियों में प्रकट होते हैं । अतः भगवान् इस जगत् से प्रत्यक्ष रूप में आसक्त नहीं होते ।

वे प्रकृति पर दृष्टिपात करते हैं , इस तरह प्रकृति क्रियाशील हो उठती है और तुरन्त ही सारी वस्तुएँ उत्पन्न हो जाती हैं । चूँकि वे प्रकृति पर दृष्टिपात करते हैं , इसलिए परमेश्वर की ओर से तो निःसन्देह क्रिया होती है , किन्तु भौतिक जगत् के प्राकट्य से उन्हें कुछ लेना – देना नहीं रहता ।

स्मृति में एक उदाहरण मिला है जो इस प्रकार है – जब किसी व्यक्ति के समक्ष फूल होता है तो उसे उसकी सुगन्धि मिलती रहती है , किन्तु फूल तथा सुगन्धि एक दूसरे से विलग रहते हैं । ऐसा ही सम्बन्ध भौतिक जगत् तथा भगवान् के बीच भी है । वस्तुतः भगवान् को इस जगत् से कोई प्रयोजन नहीं रहता , किन्तु वे ही इसे अपने दृष्टिपात से उत्पन्न करते तथा व्यवस्थित करते हैं ।

सारांश के रूप में हम कह सकते हैं कि परमेश्वर की अध्यक्षता के बिना प्रकृति कुछ भी नहीं कर सकती । तो भी भगवान् समस्त कार्यों से पृथक् रहते हैं । 

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