भगवद गीता अध्याय 7.3 ~ आसुरी स्वभाव वालों की निंदा और भगवद्भक्तों की प्रशंसा का  वर्णन / Powerful Bhagavad Gita asuri or bhagavad bhakt Ch7.3

Social Sharing

अध्याय सात (Chapter -7)

भगवद गीता अध्याय 7.3  में शलोक 12 से  शलोक 19  तक आसुरी स्वभाव वालों की निंदा और भगवद्भक्तों की प्रशंसा का वर्णन !

त्रिभिर्गुणमयैर्भावेरेभिः     सर्वमिदं      जगत् । 

        मोहितं  नाभिजानाति  मामेभ्यः  परमव्ययम् ॥ १३ ॥

त्रिभिः  –  तीन   ;   गुण-मयैः  –  गुणों से युक्त   ;  भाव:  –  भावों के द्वारा  ;   एभिः  –  इन  ;  सर्वम्  –   सम्पूर्ण  ;   इवम्  –  यह   ;   जगत्  –  ब्रह्माण्ड   ;   मोहितम्   –  मोहग्रस्त  ;   न अभिजानाति  –  नहीं जानता   ;   माम्  –  मुझको    ;   एभ्य:  –  इनसे  ;  परम्  –  परम   ;  अव्ययम्   –  अव्यय , सनातन । 

तीन गुणों ( सतो , रजो तथा तमो ) के द्वारा मोहग्रस्त यह सारा संसार मुझ गुणातीत तथा अविनाशी को नहीं जानता । 

भगवद गीता अध्याय 7.3, भगवद गीता अध्याय 7.3, भगवद गीता अध्याय 7.3, भगवद गीता अध्याय 7.3

तात्पर्य :-  सारा संसार प्रकृति के तीन गुणों से मोहित है । जो लोग इस प्रकार से तीन गुणों के द्वारा मोहित हैं , वे नहीं जान सकते कि परमेश्वर कृष्ण इस प्रकृति से परे हैं । प्रत्येक जीव को प्रकृति के वशीभूत होकर एक विशेष प्रकार का शरीर मिलता है और तदनुसार उसे एक विशेष मनोवैज्ञानिक ( मानसिक ) तथा शारीरिक कार्य करना होता है ।

प्रकृति के तीन गुणों के अन्तर्गत कार्य करने वाले मनुष्यों की चार श्रेणियाँ हैं । जो नितान्त सतोगुणी हैं वे ब्राह्मण , जो रजोगुणी हैं वे क्षत्रिय और जो रजोगुणी एवं तमोगुणी दोनों हैं , वे वैश्य कहलाते तथा जो नितान्त तमोगुणी हैं वे शूद्र कहलाते हैं । जो इनसे भी नीचे हैं वे पशु हैं । फिर ये उपाधियाँ स्थायी नहीं हैं । मैं ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य या कुछ भी हो सकता हूँ ।

जो भी हो यह जीवन नश्वर है । यद्यपि यह जीवन नश्वर है और हम नहीं जान पाते कि अगले जीवन में हम क्या होंगे , किन्तु माया के वश में रहकर हम अपने आपको देहात्मबुद्धि के द्वारा अमरीकी , भारतीय , रूसी या ब्राह्मण , हिन्दू , मुसलमान आदि कहकर सोचते हैं । और यदि हम प्रकृति के गुणों में बँध जाते हैं तो हम उस भगवान् को भूल जाते हैं जो इन गुणों के मूल में है ।

अतः भगवान् का कहना है कि सारे जीव प्रकृति के इन गुणों द्वारा मोहित होकर यह नहीं समझ पाते कि इस संसार की पृष्ठभूमि में भगवान् हैं । जीव कई प्रकार के हैं — यथा मनुष्य , देवता , पशु आदि ; और इनमें से हर एक प्रकृति के वश में है और ये सभी दिव्यपुरुष भगवान् को भूल चुके हैं । जो रजोगुणी तथा तमोगुणी हैं , यहाँ तक कि जो सतोगुणी भी हैं वे भी परमसत्य के निर्विशेष ब्रह्म स्वरूप से आगे नहीं बढ़ पाते ।

वे सब भगवान् के साक्षात् स्वरूप के समक्ष संभ्रमित हो जाते हैं , जिसमें सारा सौंदर्य , ऐश्वर्य , ज्ञान , बल , यश तथा त्याग भरा है । जब सतोगुणी तक इस स्वरूप को नहीं समझ पाते तो उनसे क्या आशा की जाये जो रजोगुणी या तमोगुणी हैं ? कृष्णभावनामृत प्रकृति के इन तीनों गुणों से परे है और जो लोग निस्सन्देह कृष्णभावनामृत में स्थित हैं , वे ही वास्तव में मुक्त हैं । 

दैवी  ह्येषा  गुणमयी  मम  माया  दुरत्यया । 

      मामेव  ये  प्रपद्यन्ते  मायामेतां   तरन्ति  ते ॥ १४ ॥ 

देवी   –  दिव्य  ;   हि  –  निश्चय ही  ;   एषा  –  यह  ;   गुण-मयी  –  तीनों गुणों से युक्त  ;   मम  –  मेरी  ;   माया  –  शक्ति  ;   दुरत्यया   –   पार कर पाना कठिन , दुस्तर  ;   माम्  –  मुझे  ;   एव  – निश्चय ही  ;   ये  –  जो   ;  प्रपद्यन्ते  –  शरण ग्रहण करते हैं  ;   मायाम् एताम्   –   इस माया के  ;  तरन्ति  –  पार कर जाते हैं   ;   ते –  वे  । 

प्रकृति के तीन गुणों वाली इस मेरी दैवी शक्ति को पार कर पाना कठिन है । किन्तु जो मेरे शरणागत हो जाते हैं , वे सरलता से इसे पार कर जाते हैं । 

भगवद गीता अध्याय 7.3, भगवद गीता अध्याय 7.3, भगवद गीता अध्याय 7.3, भगवद गीता अध्याय 7.3

तात्पर्य : भगवान् की शक्तियाँ अनन्त हैं और ये सारी शक्तियाँ देवी हैं । यद्यपि जीवात्माएँ उनकी शक्तियों के अंश हैं , अतः देवी हैं , किन्तु भौतिक शक्ति के सम्पर्क में रहने से उनकी परा शक्ति आच्छादित रहती है । इस प्रकार भौतिक शक्ति से आच्छादित होने के कारण मनुष्य उसके प्रभाव का अतिक्रमण नहीं कर पाता । जैसा कि पहले कहा जा चुका है परा तथा अपरा शक्तियाँ भगवान् से उद्भूत होने के कारण नित्य हैं ।

जीव भगवान् की परा शक्ति से सम्बन्धित होते हैं , किन्तु अपरा शक्ति अर्थात् पदार्थ के द्वारा दूषित होने से उनका मोह भी नित्य होता है । अतः बद्धजीव नित्यबद्ध है । कोई भी उसके बद्ध होने की तिथि को नहीं बता सकता । फलस्वरूप प्रकृति के चंगुल से उसका छूट पाना अत्यन्त कठिन भले ही प्रकृति अपराशक्ति क्यों न हो क्योंकि भौतिक शक्ति परमेच्छा द्वारा संचालित होती है , जिसे लाँघ पाना जीव के लिए कठिन है ।

यहाँ पर अपरा भौतिक प्रकृति को देवीप्रकृति कहा गया है क्योंकि इसका सम्बन्ध देवी है तथा इसका चालन देवी इच्छा से होता है । देवी इच्छा से संचालित होने के कारण भौतिक प्रकृति अपरा होते हुए भी दृश्यजगत् के निर्माण तथा विनाश में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है ।

वेदों में इसकी पुष्टि इस प्रकार हुई है – मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् यद्यपि माया मिथ्या या नश्वर है , किन्तु माया की पृष्ठभूमि में परम जादूगर भगवान् हैं , जो परम नियन्ता महेश्वर हैं ( श्वेताश्वतर उपनिषद् ४.१० ) । गुण का दूसरा अर्थ रस्सी ( रज्जु ) है । इससे यह समझना चाहिए कि बद्धजीव मोह रूपी रस्सी से जकड़ा हुआ है ।

यदि मनुष्य के हाथ – पैर बाँध दिये जायें तो वह अपने को छुड़ा नहीं सकता – उसकी सहायता के लिए कोई ऐसा व्यक्ति चाहिए जो बँधा न हो । चूँकि एक बँधा हुआ व्यक्ति दूसरे बँधे व्यक्ति की सहायता नहीं कर सकता , अतः रक्षक को मुक्त होना चाहिए । अतः केवल कृष्ण या उनके प्रामाणिक प्रतिनिधि गुरु ही बद्धजीव को छुड़ा सकते हैं ।

बिना ऐसी उत्कृष्ट सहायता के भवबन्धन से छुटकारा नहीं मिल सकता । भक्ति या कृष्णभावनामृत इस प्रकार के छुटकारे में सहायक हो सकता है । कृष्ण माया के अधीश्चर होने के नाते इस दुर्लघ्य शक्ति को आदेश दे सकते हैं कि वद्धजीव को छोड़ दे । वे शरणागत जीव पर अहेतुकी कृपा तथा वात्सल्यवश ही जीव को मुक्त किये जाने का आदेश देते हैं , क्योंकि जीव मूलतः भगवान् का प्रिय पुत्र है ।

अतः निष्ठुर माया के बंधन से मुक्त होने का एकमात्र साधन है , भगवान् के चरणकमलों की शरण ग्रहण करना । मामेव पद भी अत्यन्त सार्थक है । माम का अर्थ है एकमात्र कृष्ण ( विष्णु ) को , ब्रह्मा या शिव को नहीं । यद्यपि ब्रह्मा तथा शिव भी अत्यन्त महान हैं और प्रायः विष्णु के ही समान हैं , किन्तु ऐसे रजोगुण तथा तमोगुण के अवतारों के लिए सम्भव नहीं कि वे वद्धजीव को माया के चंगुल से छुड़ा सकें ।

दूसरे शब्दों में , ब्रह्मा तथा शिव दोनों ही माया के वश में रहते हैं । केवल विष्णु माया के स्वामी हैं , अतः वे ही वद्धजीव को मुक्त कर सकते हैं । वेदों में ( श्वेताश्वतर उपनिषद् ३.८ ) इसकी पुष्टि तमेव विदित्वा के द्वारा हुई है जिसका अर्थ है , कृष्ण को जान लेने पर ही मुक्ति सम्भव है । शिवजी भी पुष्टि करते हैं कि केवल विष्णु कृपा से मुक्ति प्राप्त की जा सकती है- मुक्तिप्रदाता सर्वेषां विष्णुरेव न संशयः अर्थात् इसमें सन्देह नहीं कि विष्णु ही सर्वो के मुक्तिदाता  हैं ।

न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः ।

माययापहृतज्ञाना   आसुरं  भावमाश्रिताः ॥ १५ ॥

न  –  नहीं   ;   माम्  –  मेरी  ;   दुष्कृतिनः  –  दुष्ट   ;   मूढाः  –  मूर्ख  ;   प्रपद्यन्ते  –  शरण ग्रहण करते हैं   ;   नर-अथमाः  –   मनुष्यों में अथम  ;   मायया  –  माया के द्वारा  ;  अपहृत  –  चुराये गये  ;   ज्ञाना:   –   ज्ञान वाले  ;  आसुरम्  –  आसुरी  ;   भावम्  –  प्रकृति या स्वभाव को  ;  आश्रिताः  – स्वीकार किये हुए । 

जो निपट मूर्ख हैं , जो मनुष्यों में अधम हैं , जिनका ज्ञान माया द्वारा हर लिया गया है तथा जो असुरों की नास्तिक प्रकृति को धारण करने वाले हैं , ऐसे दुष्ट मेरी शरण ग्रहण नहीं करते । 

भगवद गीता अध्याय 7.3, भगवद गीता अध्याय 7.3, भगवद गीता अध्याय 7.3, भगवद गीता अध्याय 7.3

तात्पर्य : भगवद्गीता में यह कहा गया है कि श्रीभगवान् के चरणकमलों की शरण ग्रहण करने से मनुष्य प्रकृति के कठोर नियमों को लाँघ सकता है । यहाँ पर यह प्रश्न उठता है कि तो फिर विद्वान् दार्शनिक , वैज्ञानिक , व्यापारी , शासक तथा जनता के नेता सर्वशक्तिमान भगवान श्रीकृष्ण के चरणकमलों की शरण क्यों नहीं ग्रहण करते ?

बड़े – बड़े जननेता विभिन्न विधियों से विभिन्न योजनाएँ बनाकर अत्यन्त धैर्यपूर्वक जन्म – जन्मान्तर तक प्रकृति के नियमों से मुक्ति की खोज करते हैं । किन्तु यदि वही मुक्ति भगवान् के चरणकमलों की शरण ग्रहण करने मात्र से सम्भव हो तो ये बुद्धिमान तथा श्रमशील मनुष्य इस सरल विधि को क्यों नहीं अपनाते ? गीता इसका उत्तर अत्यन्त स्पष्ट शब्दों में देती है ।

समाज के वास्तविक विद्वान् नेता यथा ब्रह्मा , शिव , कपिल , कुमारगण , मनु , व्यास , देवल , असित , जनक , प्रहलाद , वलि तथा उनके पश्चात् मध्वाचार्य , रामानुजाचार्य , श्रीचैतन्य तथा बहुत से अन्य श्रद्धावान दार्शनिक , राजनीतिज्ञ , शिक्षक , विज्ञानी आदि हैं जो सर्वशक्तिमान परमपुरुष के चरणों में शरण लेते हैं ।

किन्तु जो लोग वास्तविक दार्शनिक , विज्ञानी , शिक्षक , प्रशासक आदि नहीं हैं , किन्तु भौतिक लाभ के लिए ऐसा बनते हैं , वे परमेश्वर की योजना या पथ को स्वीकार नहीं करते । उन्हें ईश्वर का कोई ज्ञान नहीं होता ; वे अपनी सांसारिक योजनाएँ बनाते हैं और संसार की समस्याओं को हल करने के अपने व्यर्थ प्रयासों के द्वारा स्थिति को और जटिल बना लेते हैं ।

चूँकि भौतिक शक्ति इतनी बलवती है , इसलिए वह नास्तिकों की अवैध योजनाओं का प्रतिरोध करती है और योजना आयोगों के ज्ञान को ध्वस्त कर देती है । नास्तिक योजना निर्माताओं को यहाँ पर दुष्कृतिनः कहा गया है जिसका अर्थ है , दुष्टजन । कृती का अर्थ पुण्यात्मा होता है । नास्तिक योजना निर्माता कभी – कभी अत्यन्त बुद्धिमान और प्रतिभाशाली भी होता है , क्योंकि किसी भी विराट योजना के लिए , चाहे वह अच्छी हो या बुरी , बुद्धि की आवश्यकता होती है ।

लेकिन नास्तिक की बुद्धि का प्रयोग परमेश्वर की योजना का विरोध करने में होता है , इसीलिए नास्तिक योजना निर्माता दुष्कृती कहलाता है , जिससे सूचित होता है कि उसकी बुद्धि तथा प्रयास उल्टी दिशा की ओर होते हैं । गीता में यह स्पष्ट कहा गया है कि भौतिक शक्ति परमेश्वर के पूर्ण निर्देशन में कार्य करती है । उसका कोई स्वतन्त्र प्रभुत्व नहीं है ।

जिस प्रकार छाया पदार्थ का अनुसरण करती है , उसी प्रकार यह शक्ति भी कार्य करती है । तो भी यह भौतिक शक्ति अत्यन्त प्रबल है और नास्तिक अपने अनीश्वरवादी स्वभाव के कारण यह नहीं जान सकता कि वह किस तरह कार्य करती है , न ही वह परमेश्वर की योजना को जान सकता है । मोह तथा रजो एवं तमों गुणों में रहकर उसकी सारी योजनाएँ उसी प्रकार ध्वस्त हो जाती हैं , जिस प्रकार भौतिक दृष्टि से विद्वान् , वैज्ञानिक , दार्शनिक , शासक तथा शिक्षक होते . हुए भी हिरण्यकशिपु तथा रावण की सारी योजनाएँ ध्वस्त हो गई थीं ।

ये दुष्कृती या दुष्ट चार प्रकार के होते हैं जिनका वर्णन नीचे दिया जाता है ( १ ) मूढ़ – चे जो कठिन श्रम करने वाले भारवाही पशुओं की भाँति निपट मुर्ख होते हैं । वे अपने श्रम का लाभ स्वयं उठाना चाहते हैं , अतः वे भगवान् को उसे अर्पित करना नहीं चाहते । भारवाही पशु का उपयुक्त उदाहरण गधा है । इस पशु से उसका स्वामी अत्यधिक कार्य लेता है ।

गधा यह नहीं जानता कि वह अहर्निश किसके लिए काम करता है । वह घास से पेट भर कर संतुष्ट रहता है . अपने स्वामी से मार खाने के भय से केवल कुछ घंटे सोता है और गधी से बार – बार लात खाने के भय के बावजूद भी अपनी कामतृप्ति पूरी करता है । कभी – कभी गधा कविता करता है और दर्शन वधारता है , किन्तु उसके रेंकने से लोगों की शान्ति भंग होती है ।

ऐसी ही दशा उन- कर्मियों की है जो यह नहीं जानते कि वे किसके लिए कर्म करते हैं । वे यह नहीं जानते कि कर्म यज्ञ के लिए है । ऐसे लोग जो अपने द्वारा उत्पन्न कर्मों के भार दवे रहते हैं प्रायः यह कहते सुने जाते हैं कि उनके पास अवकाश कहाँ कि वे जीव की अमरता के विषय में सुनें । ऐसे मूढों के लिए नश्वर भौतिक लाभ ही जीवन का सब कुछ होता है भले ही वे अपने श्रम फल के एक अंश का ही उपभोग कर सकें ।

कभी – कभी ये लाभ के लिए रातदिन नहीं सोते , भले ही उनके आमाशय में व्रण हो जाय या अपच हो जाय , वे बिना खाये ही संतुष्ट रहते हैं , वे मायामय स्वामियों के लाभ हेतु अहर्निश काम में व्यस्त रहते हैं । अपने असली स्वामी से अनभिज्ञ रहकर ये मूर्ख कर्मी माया की सेवा में व्यर्थ ही अपना समय गवाते हैं । दुर्भाग्य तो यह है कि वे कभी भी स्वामियों के परम स्वामी की शरण में नहीं जाते , न ही वे सही व्यक्ति से उसके विषय में सुनने में कोई समय लगाते हैं ।

जो सुकर विष्ठा खाता है वह चीनी तथा घी से बनी मिठाइयों की परवाह नहीं करता । उसी प्रकार मूर्ख कर्मी इस नश्वर जगत् की इन्द्रियों को सुख देने वाले समाचारों को निरन्तर सुनता रहता है , किन्तु संसार को गतिशील बनाने वाली शाश्वत जीवित शक्ति ( प्राण ) के विषय में सुनने में तनिक भी समय नहीं लगाता । ( २ ) दूसरे प्रकार का दुष्कृती नराधम अर्थात् अधम व्यक्ति कहलाता है ।

नर का अर्थ है , मनुष्य और अधम का अर्थ है , सब से नीच । चौरासी लाख जीव योनियों में से चार लाख मानव योनियाँ हैं । इनमें से अनेक निम्न मानव योनियाँ हैं , जिनमें से अधिकांश असंस्कृत हैं । सभ्य मानव योनियाँ वे हैं जिनके पास सामाजिक , राजनीतिक तथा धार्मिक नियम हैं । जो मनुष्य सामाजिक तथा राजनीतिक दृष्टि से उन्नत हैं , किन्तु जिनका कोई धर्म नहीं होता वे नराधम माने जाते हैं ।

धर्म ईश्वरविहीन नहीं होता क्योंकि धर्म का प्रयोजन परमसत्य को तथा उसके साथ मनुष्य के सम्बन्ध को जानना है । गीता में भगवान् स्पष्टतः कहते हैं कि उनसे परे कोई भी नहीं और वे ही परमसत्य हैं । मनुष्य जीवन का सुसंस्कृत रूप सर्वशक्तिमान परमसत्य श्रीभगवान् कृष्ण के साथ मनुष्य की विस्मृतभावना को जागृत करने के लिए मिला है ।

जो इस सुअवसर को हाथ से जाने देता है वही नराधम है । शास्त्रों से पता चलता है कि जब वालक माँ के गर्भ में अत्यन्त असहाय रहता है , तो वह अपने उद्धार के लिए प्रार्थना करता है और वचन देता है कि गर्भ से वाहर आते ही यह केवल भगवान् की पूजा करेगा । संकट के समय ईश्वर का स्मरण प्रत्येक जीव का स्वभाव है , क्योंकि वह ईश्वर के साथ सदा से सम्बन्धित रहता है ।

किन्तु उद्धार के बाद चालक जन्म – पीड़ा को और उसी के साथ अपने उद्धारक को भी भूल जाता है , क्योंकि वह माया के वशीभूत हो जाता है । यह तो बालकों के अभिभावकों का कर्तव्य है कि वे उनमें सुप्त दिव्य भावनामृत को जागृत करें । वर्णाश्रम पद्धति में मनुस्मृति के अनुसार ईशभावनामृत को जागृत करने के उद्देश्य से दस शुद्धि – संस्कारों का विधान है , जो धर्म का पथ – प्रदर्शन करते हैं ।

किन्तु अब विश्व के किसी भाग में किसी भी विधि का दृढ़तापूर्वक पालन नहीं होता और फलस्वरूप ९९.९ % जनसंख्या नराधम हे । जब सारी जनसंख्या नराधम हो जाती है तो स्वाभाविक है कि उनकी सारी तथाकथित शिक्षा भौतिक प्रकृति की सर्वसमर्थ शक्ति द्वारा व्यर्थ कर दी जाती है । गीता के अनुसार विद्वान् पुरुष वही है जो एक ब्राह्मण , कुत्ता , गाय , हाथी तथा चांडाल को समान दृष्टि से देखता है ।

असली भक्त की भी ऐसी ही दृष्टि होती है । गुरु रूप ईश्वर के अवतार श्री नित्यानन्द प्रभु ने दो भाइयों जगाई तथा माधाई नामक विशिष्ट नराधमों का उद्धार किया और यह दिखला दिया कि किस प्रकार शुद्ध भक्त नराधमों पर दया करता है । अतः जो नराधम भगवान् द्वारा चहिष्कृत किया जाता है , वह केवल भक्त की अनुकम्पा से पुनः अपना आध्यात्मिक भावनामृत प्राप्त कर सकता है ।

श्रीचैतन्य महाप्रभु ने भागवत धर्म का प्रवर्तन करते हुए संस्तुति की है कि लोग विनीत भाव से भगवान् के सन्देश को सुनें । इस सन्देश का सार भगवद्गीता है । विनीत भाव से श्रवण करने मात्र से अधम से अधम मनुष्यों का उद्धार हो सकता है , किन्तु दुर्भाग्यवश वे इस सन्देश को सुनना तक नहीं चाहते – परमेश्वर की इच्छा के प्रति समर्पण करना तो दूर रहा ये नराधम मनुष्य के प्रधान कर्तव्य की डटकर उपेक्षा करते हैं ।

1 ( ३ ) दुष्कृतियों की तीसरी श्रेणी माययापहृतज्ञानाः की है अर्थात् ऐसे व्यक्तियों की जिनका प्रकाण्ड ज्ञान माया के प्रभाव से शून्य हो चुका है । ये अधिकांशतः बुद्धिमान व्यक्ति होते हैं – यथा महान दार्शनिक , कवि , साहित्यकार , वैज्ञानिक आदि , किन्तु माया इन्हें भ्रान्त कर देती है , जिसके कारण ये परमेश्वर की अवज्ञा करते हैं ।

इस समय माययापहृतज्ञानाः की बहुत बड़ी संख्या है , यहाँ तक कि वे भगवद्गीता के विद्वानों के मध्य भी हैं । गीता में अत्यन्त सीधी सरल भाषा में कहा गया है कि श्रीकृष्ण ही भगवान् हैं । न तो कोई उनके तुल्य है , न ही उनसे बड़ा । वे समस्त मनुष्यों के आदि पिता ब्रह्मा के भी पिता बताये गये हैं । वास्तव में वे ब्रह्मा के ही नहीं , अपितु समस्त जीवयोनियों के भी पिता हैं ।

वे निराकार ब्रह्म तथा परमात्मा के मूल हैं और जीवात्मा में स्थित परमात्मा उनका अंश है । वे सबके उत्स हैं और सबों को सलाह दी जाती है कि उनके चरणकमलों के शरणागत बनें । इन सब कथनों के बावजूद ये माययापहतज्ञानाः भगवान् का उपहास करते हैं और उन्हें एक सामान्य मनुष्य मानते हैं । वे यह नहीं जानते कि भाग्यशाली मानव जीवन श्रीभगवान् के दिव्य शाश्वत स्वरूप के अनुरूप ही रचा गया है ।

गीता की ऐसी सारी अवैध व्याख्याएँ जो माययापहृतज्ञानाः वर्ग के लोगों द्वारा की गई हैं और परम्परा पद्धति से हटकर हैं , आध्यात्मिक जानकारी के पथ में रोड़े का कार्य करती हैं । मायाग्रस्त व्याख्याकार न तो स्वयं भगवान् कृष्ण के चरणों की शरण में जाते हैं और न अन्यों को इस सिद्धान्त का पालन करने के लिए शिक्षा देते हैं ।

( ४ ) दुष्कृतियों की चौथी श्रेणी आसुरं भावमाश्रिताः अर्थात् आसुरी सिद्धान्त वालों की है । यह श्रेणी खुले रूप से नास्तिक होती है । इनमें से कुछ तर्क करते हैं कि परमेश्वर कभी भी इस संसार में अवतरित नहीं हो सकता , किन्तु वे इसका कोई ठोस प्रमाण नहीं बता पाते कि ऐसा क्यों नहीं हो सकता । कुछ ऐसे हैं जो परमेश्वर को निर्विशेष रूप के अधीन मानते हैं , यद्यपि गीता में इसका उल्टा बताया गया है ।

नास्तिक श्रीभगवान् के द्वेषवश अपनी बुद्धि से कल्पित अनेक अवैध अवतारों को प्रस्तुत करते हैं । ऐसे लोग जिनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य भगवान् को नकारना है , श्रीकृष्ण के चरणकमलों के कभी शरणागत नहीं हो सकते ।

 दक्षिण भारत के श्रीयामुनाचार्य अल्वन्दरु ने कहा है ” हे प्रभु ! आप उन लोगों द्वारा नहीं जाने जाते जो नास्तिक सिद्धान्तों में लगे हैं , भले ही आप विलक्षण गुण , रूप तथा लीला से युक्त हैं , सभी शास्त्रों ने आपका विशुद्ध सत्त्वमय विग्रह प्रमाणित किया है तथा देवी गुणसम्पन्न दिव्यज्ञान के आचार्य भी आपको मानते हैं ।

” अतएव ( १ ) मूढ ( २ ) नराधम ( ३ ) माययापहतज्ञानी अर्थात् भ्रमित मनोधर्मी , तथा ( ४ ) नास्तिक – ये चार प्रकार के दुष्कृती कभी भी भगवान् के चरणकमलों की शरण में नहीं जाते , भले ही सारे शास्त्र तथा आचार्य ऐसा उपदेश क्यों न देते रहें । “

चतुर्विधा  भजन्ते  मां   जनाः सुकृतिनोऽर्जुन । 

आतो    जिज्ञासुरर्थार्थी     ज्ञानी     भरतर्षभ ॥ १६ ॥ 

चतुः  विधा:  –  चार प्रकार के  ;   भजन्ते   –  सेवा करते हैं   ;   माम्  –  मेरी   ;   जनाः  –  व्यक्ति   ;   सु-कृतिन:   –   पुण्यात्मा  ;   अर्जुन  –  हे अर्जुन  ;  आर्तः  –  विपदाग्रस्त , पीड़ित  ;   जिज्ञासुः  –  ज्ञान के जिज्ञासु  ;  अर्थ-अर्थी   –   लाभ की इच्छा रखने वाले  ;   ज्ञानी   –  वस्तुओं को सही रूप में जानने वाले तत्त्वज्ञ   ;   च  –  भी   ;   भरत-ऋषभ   –   हे भरतश्रेष्ठ

 हे भरतश्रेष्ठ ! चार प्रकार के पुण्यात्मा मेरी सेवा करते हैं – आर्त , जिज्ञासु , अर्थार्थी तथा ज्ञानी । 

भगवद गीता अध्याय 7.3, भगवद गीता अध्याय 7.3, भगवद गीता अध्याय 7.3, भगवद गीता अध्याय 7.3

तात्पर्य : दुष्कृती के सर्वथा विपरीत ऐसे लोग हैं जो शास्त्रीय विधि – विधानों का दृढ़ता से पालन करते हैं और ये सुकृतिनः कहलाते हैं अर्थात् ये वे लोग हैं जो शास्त्रीय विधि विधानों , नैतिक तथा सामाजिक नियमों को मानते हैं और परमेश्वर के प्रति न्यूनाधिक भक्ति करते हैं । इन लोगों की चार श्रेणियाँ हैं- वे जो पीड़ित हैं , वे जिन्हें धन की आवश्यकता है , वे जिन्हें जिज्ञासा है और वे जिन्हें परमसत्य का ज्ञान है ।

ये सारे लोग विभिन्न परिस्थितियों में परमेश्वर की भक्ति करते रहते हैं । ये शुद्ध भक्त नहीं हैं , क्योंकि ये भक्ति के बदले कुछ महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति करना चाहते हैं । शुद्ध भक्ति निष्काम होती है और उसमें किसी लाभ की आकांक्षा नहीं रहती । भक्तिरसामृत सिन्धु में ( १.१.११ ) शुद्ध भक्ति की परिभाषा इस प्रकार की गई है 

अन्याभिलाषिताशून्यं ज्ञानकर्माद्यनावृतम् ।

आनुकूल्येन कृष्णानुशीलनं भक्तिरुत्तमा ।

” मनुष्य को चाहिए कि परमेश्वर कृष्ण की दिव्य प्रेमाभक्ति किसी सकामकर्म अथवा मनोधर्म द्वारा भौतिक लाभ की इच्छा से रहित होकर करे । यही शुद्धभक्ति कहलाती जब ये चार प्रकार के लोग परमेश्वर के पास भक्ति के लिए आते हैं और शुद्ध भक्त की संगति से पूर्णतया शुद्ध हो जाते हैं , तो ये भी शुद्ध भक्त हो जाते हैं । जहाँ तक दुष्टों ( दुष्कृतियों का प्रश्न है उनके लिए भक्ति दुर्गम है क्योंकि उनका जीवन स्वार्थपूर्ण , अनियमित तथा निरुद्देश्य होता है । किन्तु इनमें से भी कुछ लोग शुद्ध भक्त के सम्पर्क में आने पर शुद्ध भक्त बन जाते हैं । है । ”

जो लोग सदैव सकाम कर्मों में व्यस्त रहते हैं , वे संकट के समय भगवान् के पास आते हैं और तब वे शुद्धभक्तों की संगति करते हैं तथा विपत्ति में भगवान् के भक्त बन जाते हैं । जो बिल्कुल हताश हैं वे भी कभी – कभी शुद्ध भक्तों की संगति करने आते हैं और ईश्वर के विषय में जानने की जिज्ञासा करते हैं । इसी प्रकार शुष्क चिन्तक जब ज्ञान के प्रत्येक क्षेत्र से हताश हो जाते हैं तो वे भी कभी – कभी ईश्वर को जानना चाहते हैं और वे भगवान् की भक्ति करने आते हैं ।

इस प्रकार ये निराकार ब्रह्म तथा अन्तर्यामी परमात्मा के ज्ञान को पार कर जाते हैं और भगवत्कृपा से या उनके शुद्ध भक्त की कृपा से उन्हें साकार भगवान् का बोध हो जाता है । कुल मिलाकर जब आर्त , जिज्ञासु , ज्ञानी तथा धन की इच्छा रखने वाले समस्त भौतिक इच्छाओं से मुक्त हो जाते हैं और जब वे यह भलीभांति समझ जाते हैं कि भौतिक आसक्ति से आध्यात्मिक उन्नति का कोई सरोकार नहीं है , तो वे शुद्धभक्त बन जाते हैं ।

जब तक ऐसी शुद्ध अवस्था प्राप्त नहीं हो लेती , तब तक भगवान् की दिव्यसेवा में लगे भक्त सकाम कर्मों में या संसारी ज्ञान की खोज में अनुरक्त रहते हैं । अतः शुद्ध भक्ति की अवस्था तक पहुँचने के लिए मनुष्य को इन सर्वो को लाँघना होता है । 

तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते । 

प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ॥ १७ ॥ 

तेषाम्  –  उनमें से  ;   ज्ञानी  –  ज्ञानवान   ;   नित्य-युक्तः   –   सदैव तत्पर  ;   एक  –  एकमात्र   ; भक्तिः   –   भक्ति में  ;   विशिष्यते   –   विशिष्ट है  ;   प्रियः  –  अतिशय प्रिय  ;  हि  –  निश्चय ही  ;   ज्ञानिनः  –  ज्ञानवान का   ;  अत्यर्थम्  –  अत्यधिक  ;  अहम्  –  मै हूँ   ;  सः  –  वह  ;   च  –  भी  ; मम  –  मेरा   ;  प्रियः  –  प्रिय । 

इनमें से जो परमज्ञानी है और शुद्धभक्ति में लगा रहता है वह सर्वश्रेष्ठ है , क्योंकि में उसे अत्यन्त प्रिय हूँ और वह मुझे प्रिय है । 

भगवद गीता अध्याय 7.3, भगवद गीता अध्याय 7.3, भगवद गीता अध्याय 7.3, भगवद गीता अध्याय 7.3

तात्पर्य : भौतिक इच्छाओं के समस्त कल्मष से मुक्त आर्त , जिज्ञासु , धनहीन तथा ज्ञानी ये सव शुद्धभक्त बन सकते हैं । किन्तु इनमें से जो परमसत्य का ज्ञानी है और भौतिक इच्छाओं से मुक्त होता है वही भगवान् का शुद्धभक्त हो पाता है । इन चार वर्गों में से जो भक्त ज्ञानी है और साथ ही भक्ति में लगा रहता है , वह भगवान् के कथनानुसार सर्वश्रेष्ठ है ।

ज्ञान की खोज करते रहने से मनुष्य को अनुभूति होती है कि उसका आत्मा उसके भौतिक शरीर से भिन्न है । अधिक उन्नति करने पर उसे निर्विशेष ब्रह्म तथा परमात्मा का ज्ञान होता है । जब वह पूर्णतया शुद्ध हो जाता है तो उसे ईश्वर के नित्य दास के रूप में अपनी स्वाभाविक स्थिति की अनुभूति होती है । इस प्रकार शुद्ध भक्त की संगति से आर्त , जिज्ञासु , धन का इच्छुक तथा ज्ञानी स्वयं शुद्ध हो जाते हैं ।

किन्तु प्रारम्भिक अवस्था में जिस व्यक्ति को परमेश्वर का पूर्णज्ञान होता है और साथ ही जो उनकी भक्ति करता रहता है , वह व्यक्ति भगवान् को अत्यन्त प्रिय होता है । जिसे भगवान् की दिव्यता का शुद्ध ज्ञान प्राप्त होता है , वह भक्ति द्वारा इस तरह सुरक्षित रहता है कि भौतिक कल्मष उसे छू भी नहीं पाते ।

उदारा:    सर्व     एवैते   ज्ञानी   त्वात्मैव   मे   मतम् । 

आस्थितः  स  हि   युक्तात्मा  मामेवानुत्तमां   गतिम् ॥ १८ ॥ 

उदारा:   –  विशाल हृदय वाले   ;   सर्वे  –  सभी  ;  एव  –  निश्चय ही   ;  एते  –  ये  ;   ज्ञानी  – ज्ञानवाला  ;   तु  –  लेकिन  ;   आत्मा एव  –  मेरे समान ही   ;   मे  –  मेरे   ;  मतम्  –  मत में  ;  आस्थितः  –  स्थित  ;   सः  –  वह  ;   हि  –  निश्चय ही  ;   युक्त-आत्मा  –  भक्ति में तत्पर  ;   माम्  – मुझ  ;   एव  –  निश्चय ही  ;  अनुत्तमाम्  –  परम , सर्वोच्च   ;   गतिम्  –  लक्ष्य को । 

निस्सन्देह ये सब उदारचेता व्यक्ति हैं , किन्तु जो मेरे ज्ञान को प्राप्त है , उसे मैं अपने ही समान मानता हूँ । वह मेरी दिव्यसेवा में तत्पर रहकर मुझ सर्वोच्च उद्देश्य को निश्चित रूप से प्राप्त करता है । 

भगवद गीता अध्याय 7.3, भगवद गीता अध्याय 7.3, भगवद गीता अध्याय 7.3, भगवद गीता अध्याय 7.3

तात्पर्य : ऐसा नहीं है कि जो कम ज्ञानी भक्त हैं वे भगवान् को प्रिय नहीं हैं । भगवान् कहते हैं कि सभी उदारचेता हैं क्योंकि चाहे जो भी भगवान् के पास किसी भी उद्देश्य से आये वह महात्मा कहलाता है । जो भक्त भक्ति के बदले कुछ लाभ चाहते हैं उन्हें भगवान् स्वीकार करते हैं क्योंकि इससे स्नेह का विनिमय होता है ।

वे स्नेहवश भगवान् से लाभ की याचना करते हैं और जब उन्हें वह प्राप्त हो जाता है तो वे इतने प्रसन्न होते हैं कि वे भी भगवद्भक्ति करने लगते हैं । किन्तु ज्ञानी भक्त भगवान् को इसलिए प्रिय है कि उसका उद्देश्य प्रेम तथा भक्ति से परमेश्वर की सेवा करना होता है । ऐसा भक्त भगवान् की सेवा किये बिना क्षण भर भी नहीं रह सकता । इसी प्रकार परमेश्वर अपने भक्त को बहुत चाहते हैं और वे उससे विलग नहीं हो पाते । श्रीमद्भागवत में ( ९ .४.६८ ) भगवान् कहते हैं 

साधवो  हृदयं   मह्यं  साधूनां  हृदयं   त्वहम् ।

मदन्यत्ते  न  जानन्ति  नाहं  तेभ्यो  मनागपि ॥

 ‘ भक्तगण सदैव मेरे हृदय में वास करते हैं और में भक्तों के हृदयों में वास करता हूँ । भक्त मेरे अतिरिक्त और कुछ नहीं जानता और मैं भी भक्त को कभी नहीं भूलता । मेरे तथा शुद्ध भक्तों के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध रहता है । ज्ञानी शुद्धभक्त कभी भी आध्यात्मिक सम्पर्क से दूर नहीं होते , अतः वे मुझे अत्यन्त प्रिय हैं । ” 

बहूनां   जन्मनामन्ते   ज्ञानवान्मां   प्रपद्यते । 

वासुदेवः  सर्वमिति  स  महात्मा  सुदुर्लभः ॥ १९ ॥ 

बहूनाम्   –  अनेक  ;   जन्मनाम्  –  जन्म तथा मृत्यु के चक्र के  ;   अन्ते  –  अन्त में  ;   ज्ञान-वान्   –  ज्ञानी    ;   माम्  –  मेरी  ;   प्रपद्यते   –   शरण ग्रहण करता है  ;    वासुदेव:  –  भगवान् कृष्ण  ;   सर्वम्  –  सव कुछ  ;   इति   –  इस प्रकार  ;   सः  –  ऐसा  ;   महा-आत्मा   –   महात्मा  ;  सु-दुर्लभः   –   अत्यन्त दुर्लभ है  । 

अनेक जन्म – जन्मान्तर के बाद जिसे सचमुच ज्ञान होता है , वह मुझको समस्त कारणों का कारण जानकर मेरी शरण में आता है । ऐसा महात्मा अत्यन्त दुर्लभ होता है । 

भगवद गीता अध्याय 7.3, भगवद गीता अध्याय 7.3, भगवद गीता अध्याय 7.3, भगवद गीता अध्याय 7.3

तात्पर्य : भक्ति या दिव्य अनुष्ठानों को करता हुआ जीव अनेक जन्मों के पश्चात् इस दिव्यज्ञान को प्राप्त कर सकता है कि आत्म – साक्षात्कार का चरम लक्ष्य श्रीभगवान् है । आत्म – साक्षात्कार के प्रारम्भ में जब मनुष्य भौतिकता का परित्याग करने का प्रयत्न करता है तब निर्विशेषवाद की ओर उसका झुकाव हो सकता है , किन्तु आगे बढ़ने पर वह यह समझ पाता है कि आध्यात्मिक जीवन में भी कार्य हैं और इन्हीं से भक्ति का विधान होता है ।

इसकी अनुभूति होने पर वह भगवान् के प्रति आसक्त हो जाता है और उनकी शरण ग्रहण कर लेता है । इस अवसर पर वह समझ सकता है कि श्रीकृष्ण की कृपा ही सर्वस्व है , वे ही सब कारणों के कारण हैं और यह जगत् उनसे स्वतन्त्र नहीं है । वह इस भौतिक जगत् को आध्यात्मिक विविधताओं का विकृत प्रतिविम्व मानता है और अनुभव करता है कि प्रत्येक वस्तु का परमेश्वर कृष्ण से सम्बन्ध है । इस प्रकार वह प्रत्येक वस्तु को वासुदेव श्रीकृष्ण से सम्बन्धित समझता है ।

इस प्रकार की वासुदेवमयी व्यापक दृष्टि होने पर भगवान् कृष्ण को परमलक्ष्य मानकर शरणागति प्राप्त होती है । ऐसे शरणागत महात्मा दुर्लभ हैं । इस श्लोक की सुन्दर व्याख्या श्वेताश्वतर उपनिषद् में ( ३.१४-१५ ) मिलती है –

सहस्रशीर्षा    पुरुषः   सहस्राक्षः    सहस्रपात् ।

स  भूमिं  विश्वतो  वृत्वात्यातिष्ठद्   दशांगुलम् ॥

पुरुष   एवेदं   सर्व   यद्भूतं   यच्च    भव्यम् ।

उतामृतत्वस्येशानो            यदत्रेनातिरोहति ॥

छान्दोग्य उपनिषद् ( ५.१.१५ ) में कहा गया है – न व वाचो न चक्षूंषि न श्रोत्राणि न मनांसीत्याचक्षते प्राण इति एवाचक्षते प्राणो ह्येवैतानि सर्वाणि भवन्ति – जीव के शरीर की बोलने की शक्ति , देखने की शक्ति , सुनने की शक्ति , सोचने की शक्ति ही प्रधान नहीं है । समस्त कार्यों का केन्द्रविन्दु तो यह जीवन ( प्राण ) है ।

भगवद गीता अध्याय 7.3, भगवद गीता अध्याय 7.3, भगवद गीता अध्याय 7.3, भगवद गीता अध्याय 7.3

इसी प्रकार भगवान् वासुदेव या भगवान् श्रीकृष्ण ही समस्त पदार्थों में मूल सत्ता हैं । इस देह में बोलने , देखने , सुनने तथा सोचने आदि की शक्तियाँ हैं , किन्तु यदि वे भगवान् से सम्बन्धित न हो तो सभी व्यर्थ हैं । वासुदेव सर्वव्यापी है और प्रत्येक वस्तु वासुदेव है । अतः भक्त पूर्ण ज्ञान में रहकर शरण ग्रहण करता है ।

भगवद गीता अध्याय 7.3, भगवद गीता अध्याय 7.3, भगवद गीता अध्याय 7.3, भगवद गीता अध्याय 7.3

भगवद गीता अध्याय 7.3 ~ आसुरी स्वभाव वालों की निंदा और भगवद्भक्तों की प्रशंसा का  वर्णन / Powerful Bhagavad Gita asuri or bhagavad bhakt Ch7.3
भगवद गीता अध्याय 7.3 ~ आसुरी स्वभाव वालों की निंदा और भगवद्भक्तों की प्रशंसा का  वर्णन

Social Sharing

Leave a Comment