भगवद गीता अध्याय 7.1 || विज्ञानसहित ज्ञान , इश्वर व्यापकता || Powerful Bhagavad Gita

अध्याय सात (Chapter -7)

भगवद गीता अध्याय 7.1  में शलोक 01 से  शलोक 07  तक विज्ञान सहित ज्ञान का विषय,इश्वर की व्यापकता का वर्णन !

भगवद्ज्ञान 

श्रीभगवानुवाच 

मय्यासक्तमनाः   पार्थ   योगं  युञ्जन्मदाश्रयः ।  

असंशयं  समग्रं  मां  यथा  ज्ञास्यसि  तच्छृणु ॥ १ ॥ 

श्रीभगवान् उवाच   –   भगवान् कृष्ण ने कहा   ;   मयि   –   मुझमें   ;   आसक्त-मना:   –  आसक्त मन वाला   ;   पार्थ  –  हे पृथापुत्र  ;   योगम्   –   आत्म-साक्षात्कार  ;   युञ्जन्   –    अभ्यास करते हुए   ;   मत्-आश्रयः   –   मेरी चेतना ( कृष्णचेतना ) में  ;   असंशयम्   –   निस्सन्देह   ;   समग्रम्  –  पूर्णतया  ;   माम्  –  मुझको  ;   यथा  –  जिस तरह  ;   ज्ञास्यसि  –  जान सकते हो  ;  शृणु  –  सुनो । 

श्रीभगवान् ने कहा- हे पृथापुत्र ! अब सुनो कि तुम किस तरह मेरी भावना से पूर्ण होकर और मन को मुझमें आसक्त करके योगाभ्यास करते हुए मुझे पूर्णतया संशयरहित जान सकते हो । 

तात्पर्य :- भगवद्गीता के इस सातवें अध्याय में कृष्णभावनामृत की प्रकृति का विशद वर्णन कृष्ण समस्त ऐश्वर्यों से पूर्ण हैं और वे इन्हें किस प्रकार प्रकट करते हैं , है । इसका वर्णन इसमें हुआ है । इसके अतिरिक्त इस अध्याय में इसका भी वर्णन है कि चार प्रकार के भाग्यशाली व्यक्ति कृष्ण के प्रति आसत होते हैं और चार प्रकार के भाग्यहीन व्यक्ति कृष्ण की शरण में कभी नहीं आते ।

प्रथम छः अध्यायों में जीवात्मा को अभौतिक आत्मा के रूप में वर्णित किया गया है जो विभिन्न प्रकार के योगों द्वारा आत्म – साक्षात्कार को प्राप्त हो सकता है । छठे अध्याय के अन्त में यह स्पष्ट कहा गया है कि मन को कृष्ण पर एकाग्र करना या दूसरे शब्दों में कृष्णभावनामृत ही सर्वोच्च योग है । मन को कृष्ण पर एकाग्र करने से ही मनुष्य परमसत्य को पूर्णतया जान सकता है , अन्यथा नहीं ।

निर्विशेष ब्रह्मज्योति या अन्तर्यामी परमात्मा की अनुभूति परमसत्य का पूर्णज्ञान नहीं है , क्योंकि यह आंशिक होती है । कृष्ण ही पूर्ण तथा वैज्ञानिक ज्ञान हैं और कृष्णभावनामृत में ही मनुष्य को सारी अनुभूति होती है । पूर्ण कृष्णभावनामृत में मनुष्य जान पाता है कि कृष्ण ही निस्सन्देह परम ज्ञान है । विभिन्न प्रकार के योग तो कृष्णभावनामृत के मार्ग के सोपान सदृश है ।

जो व्यक्ति कृष्णभावनामृत ग्रहण करता है , वह स्वतः ब्रह्मज्योति तथा परमात्मा के विषय में पूरी तरह जान लेता है । कृष्णभावनामृत योग का अभ्यास करके मनुष्य सभी वस्तुओं को यथा परमसत्य , जीवात्माएँ , प्रकृति तथा साज – सामग्री समेत उनके प्राकट्य को पूरी तरह जान सकता है । अतः मनुष्य को चाहिए कि छठे अध्याय के अन्तिम श्लोक के अनुसार योग का अभ्यास करे ।

परमेश्वर कृष्ण पर ध्यान की एकाग्रता को नवधा भक्ति के द्वारा सम्भव बनाया जाता है जिसमें श्रवणम् अग्रणी एवं सबसे महत्त्वपूर्ण है । अतः भगवान् अर्जुन से कहते हैं- तच्छृणु अर्थात् ” मुझसे सुनो ” । कृष्ण से बढ़कर कोई प्रमाण नहीं , अतः उनसे सुनने का जिसे सौभाग्य प्राप्त होता है वह पूर्णतया कृष्णभावनाभावित हो जाता है ।

अतः मनुष्य को या तो साक्षात् कृष्ण से या कृष्ण के शुद्धभक्त से सीखना चाहिए , न कि अपनी शिक्षा का अभिमान करने वाले अभक्त से परमसत्य श्रीभगवान् कृष्ण को जानने की विधि का वर्णन श्रीमद्भागवत  के प्रथम स्कंध के द्वितीय अध्याय में इस प्रकार हुआ है-

सृण्वतां   स्वकयाः   कृष्णः  पुण्यश्रवणकर्तिनः ।

हद्यन्तःस्थो  ह्यभद्राणि  विधुनोति   सुहत्सताम् ॥

नष्टप्रायेष्यमद्वेषु     नित्यं     भागवत    सेवाया ।

भगवत्युत्तमश्लोके      भक्तिर्भवति    नैष्ठिको ॥

तदा    रजस्तमोभावाः     कामलोभादयश्च   थे ।

चेत    एतैरनाविद्धं    स्थितं    सत्वे   प्रसीदति ॥

एवं         प्रसन्नमनसा       भगवद्भक्तियोगतः ।

भगवत्तत्त्वविज्ञानं       मुक्तसंगस्य       जायते ॥

भिद्यते      हृदयग्रंथिश्छिद्यन्ते      सर्वसंशयाः ।

क्षोयनो     चास्य   कर्माणि  दृष्ट   एवात्मनीश्वरे ॥

” वैदिक साहित्य से श्रीकृष्ण के विषय में सुनना या भगवद्गीता से साक्षात् उन्हीं से सुनना अपने आपमें पुण्यकर्म है और जो प्रत्येक हृदय में वास करने वाले भगवान् कृष्ण के विषय में सुनता है , उसके लिए वे शुभेच्छु मित्र की भाँति कार्य करते हैं और जो भक्त निरन्तर उनका श्रवण करता है , उसे वे शुद्ध कर देते हैं । इस प्रकार भक्त अपने सुप्त दिव्यज्ञान को फिर से पा लेता है ।

ज्यों – ज्यों वह भागवत तथा भक्तों से कृष्ण के विषय में अधिकाधिक सुनता है , त्यों – त्यों वह भगवद्भक्ति में स्थिर होता जाता है । भक्ति के विकसित होने पर वह रजो तथा तमो गुणों से मुक्त हो जाता है और इस प्रकार भौतिक काम तथा लोभ कम हो जाते हैं । जब ये कल्मष दूर हो जाते हैं तो भक्त सतोगुण में स्थिर हो जाता है , भक्ति के द्वारा स्फूर्ति प्राप्त करता है और भगवत् – तत्त्व को पूरी तरह जान लेता है ।

भक्तियोग भौतिक मोह की कठिन ग्रंथ को भेदता है और भक्त को असंशयं समग्रम् अर्थात् परम सत्य श्रीभगवान् को समझने की अवस्था को प्राप्त कराता है ( भागवत् १.२.१७-२१ ) । ”  अतः श्रीकृष्ण से या कृष्णभावनाभावित भक्तों के मुखों से सुनकर ही कृष्णतत्त्व को जाना जा सकता है । 

ज्ञानं    तेऽहं   सविज्ञानमिदं   वक्ष्याम्यशेषतः ।

       यज्ज्ञात्वा  नेह   भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते ॥ २ ॥

ज्ञानम्   –  प्रत्यक्ष ज्ञान  ;   ते  –  तुमसे  ;  अहम्  –  मै   ;  स  –  सहित  ;  विज्ञानम्  –  दिव्यज्ञान  ; इवम् –  यह  ;  वक्ष्यामि  –  कहूँगा  ;  अशेषतः  –  पूर्णरूप से  ;   यत्  –  जिसे  ;  जात्या  –  जानकर  ;   न   –  नहीं  ;  इहं –  इस संसार में  ;  भूयः  –  आगे   ;   अन्यत्  –  अन्य कुछ  ;   ज्ञातव्यम्  –  जानने योग्य  ;   अवशिष्यते  –  शेष रहता है । 

अब मैं तुमसे पूर्णरूप से व्यावहारिक तथा दिव्यज्ञान कहूँगा । इसे जान लेने पर तुम्हें जानने के लिए और कुछ भी शेष नहीं रहेगा । 

तात्पर्य :- पूर्णज्ञान में प्रत्यक्ष जगत् , इसके पीछे काम करने वाला आत्मा तथा इन दोनों के उद्गम सम्मिलित हैं । यह दिव्यज्ञान है । भगवान् उपर्युक्त ज्ञानपद्धति बताना चाहते हैं , क्योंकि अर्जुन उनका विश्वस्त भक्त तथा मित्र है ।

चतुर्थ अध्याय के प्रारम्भ में इसकी व्याख्या भगवान् कृष्ण ने की और उसी की पुष्टि यहाँ पर हो रही है । भगवद्भक्त द्वारा पूर्णज्ञान का लाभ भगवान से प्रारम्भ होने वाली गुरु – परम्परा से ही किया जा सकता है । अतः मनुष्य को इतना बुद्धिमान् तो होना ही चाहिए कि वह समस्त ज्ञान के उद्गम को जान सके , जो समस्त कारणों का कारण है और समस्त योगों में ध्यान का एकमात्र लक्ष्य है ।

जब समस्त कारणों के कारण का पता चल जाता है , तो सभी ज्ञेय वस्तुएँ ज्ञात हो जाती है और कुछ भी अज्ञेय नहीं रह जाता । वेदों का ( मुण्डक उपनिषद् १.३ ) कहना है- कस्मिन् भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवति । 

मनुष्याणां    सहस्रेषु    कश्चिद्यतति    सिद्धये । 

      यततामपि  सिद्धानां  कश्चिन्मां  वेत्ति  तत्त्वतः ॥ ३ ॥

मनुष्याणाम्   –  मनुष्यों में से  ;  सहस्त्रेषु  –  हजारों  ;   कचित्  –  कोई एक  ;  यतति  –  प्रयत्न करता है  ;  सिद्धये  –  सिद्धि के लिए  ;  यतताम  –  इस प्रकार प्रयत्न करने वाले  ;  अपि  – निस्सन्देह ;   सिद्धानाम्  –  सिद्ध  लोगों में से  ;   कश्चित  –  कोई एक  ;  माम्  –  मुझको  ;  बेत्ति  –  जानता है ;   तत्त्वतः  –  वास्तव मे । 

कई हजार मनुष्यों में से कोई एक सिद्धि के लिए प्रयत्नशील होता है और इस तरह सिद्धि प्राप्त करने वालों में से विरला ही कोई एक मुझे वास्तव में जान पाता है । 

तात्पर्य : मनुष्यों की विभिन्न कोटियाँ हैं और हजारों मनुष्यों में से शायद विरला मनुष्या ही यह जानने में रुचि रखता है कि आत्मा क्या है , शरीर क्या है , और परमसत्य क्या है । सामान्यतया मानव आहार , निद्रा , भय तथा मैथुन जैसी पशुवृत्तियों में लगा रहता है और मुश्किल से कोई एक दिव्यज्ञान में रुचि रखता है ।

गीता के प्रथम छह अध्याय उन लोगों के लिए हैं जिनकी रुचि दिव्यज्ञान में , आत्मा , परमात्मा तथा ज्ञानयोग , ध्यानयोग द्वारा अनुभूति की क्रिया में तथा पदार्थ से आत्मा के पार्थक्य को जानने में है । किन्तु कृष्ण तो केवल उन्हीं व्यक्तियों द्वारा ज्ञेय हैं जो कृष्णभावनाभावित हैं । अन्य योगी निर्विशेष ब्रह्म – अनुभूति प्राप्त कर सकते हैं , क्योंकि कृष्ण को जानने की अपेक्षा यह सुगम है ।

कृष्ण परमपुरुष हैं , किन्तु साथ ही वे ब्रह्म तथा परमात्मा ज्ञान से परे हैं । योगी तथा ज्ञानीजन कृष्ण को नहीं समझ पाते । यद्यपि महानतम निर्विशेषवादी ( मायावादी ) शंकराचार्य ने अपने गीता – भाष्य में स्वीकार किया है कि कृष्ण भगवान् हैं , किन्तु उनके अनुवायी इसे स्वीकार नहीं करते , क्योंकि भले ही किसी को निर्विशेष ब्रह्म की दिव्य अनुभूति क्यों न हो , कृष्ण को जान पाना अत्यन्त कठिन है ।

कृष्ण भगवान् समस्त कारणों के कारण , आदि पुरुष गोविन्द हैं । ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्द विग्रहः । अनादिरादिगोविन्दः सर्वकारणकारणम् । अभक्तों के लिए उन्हें जान पाना अत्यन्त कठिन है । यद्यपि अभक्तगण यह घोषित करते हैं कि भक्ति का मार्ग सुगम है , किन्तु वे इस पर चलते नहीं । यदि भक्तिमार्ग इतना सुगम है जितना अभक्तगण कहते हैं तो फिर वे कठिन मार्ग को क्यों ग्रहण करते हैं ? वास्तव में भक्तिमार्ग सुगम नहीं है ।

भक्ति के ज्ञान से हीन अनधिकारी लोगों द्वारा ग्रहण किया जाने वाला तथाकथित भक्तिमार्ग भले ही सुगम हो , किन्तु जब विधि – विधानों के अनुसार दृढ़तापूर्वक इसका अभ्यास किया जाता है तो मीमांसक तथा दार्शनिक इस मार्ग से च्युत हो जाते हैं । श्रील रूप गोस्वामी अपनी कृति भक्तिरसामृत सिन्धु में ( १.२.१०१ ) लिखते हैं –

श्रुति  स्मृतिपुराणादि   पञ्चरात्रविधिं  विना ।

ऐकान्तिकी  हरेभक्तिरुत्पातायैव  कल्पते ॥

 ” वह भगवद्भक्ति , जो उपनिषदों , पुराणों तथा नारद पंचरात्र जैसे प्रामाणिक वैदिक ग्रंथों की अवहेलना करती है , समाज में व्यर्थ ही अव्यवस्था फैलाने वाली है । ” 

ब्रह्मवेत्ता निर्विशेषवादी या परमात्मावेत्ता योगी भगवान् श्रीकृष्ण को यशोदा – नन्दन या पार्थसारथी के रूप में कभी नहीं समझ सकते । कभी – कभी बड़े – बड़े देवता भी कृष्ण के विषय में भ्रमित हो जाते हैं – मुह्यन्ति यत्सूरयः । तु वेद न कञ्चन भगवान् कहते हैं कि कोई भी मुझे उस रूप में तत्त्वतः नहीं जानता , जैसा में हूँ । और यदि कोई जानता है – स महात्मा सुदुर्लभः- तो ऐसा महात्मा विरला होता है ।

अतः भगवान् की भक्ति क्रिये बिना कोई भगवान् को तत्त्वतः नहीं जान पाता , भले ही वह महान विद्वान या दार्शनिक क्यों न हो । केवल शुद्ध भक्त ही कृष्ण के अचिन्त्य गुणों को सब कारणों के कारण रूप में उनकी सर्वशक्तिमत्ता तथा ऐश्वर्य , उनकी सम्पत्ति , यश , वल , सौन्दर्य , ज्ञान तथा वैराग्य के विषय में कुछ – कुछ जान सकता है , क्योंकि कृष्ण अपने भक्तों पर दयालु होते हैं । ब्रह्म – साक्षात्कार की वे पराकाष्ठा है और केवल भक्तगण ही उन्हें तत्त्वतः जान सकते है । अतएव भक्तिरसामृत सिन्धु में ( १.२.२३४ ) कहा गया है —

 अतः   श्रीकृष्णनामादि    न   भवेद्ग्राह्यमिन्द्रियैः ।

सेवोन्मुखे   हि   जिह्वादो  स्वयमेव   स्फुरत्यदः ॥

 ” कुंठित इन्द्रियों के द्वारा कृष्ण को तत्त्वतः नहीं समझा जा सकता । किन्तु भक्तों द्वारा की गई अपनी दिव्यसेवा से प्रसन्न होकर वे भक्तों को आत्मतत्त्व प्रकाशित करते हैं ।

भूमिरापोऽनलो  वायुः  खं  मनो  बुद्धिरेव  च । 

       अहंकार    इतीयं    मे    भिन्ना    प्रकृतिरष्टधा ॥ ४ ॥ 

भूमिः  –  पृथ्वी  ;   आपः  –  जल   ;   अनल:  – अग्नि  ;  वायुः  –  वायु  ;  खम्  – आकाश  ;  मनः  – मन  ;  बुद्धिः  –  बुद्धि   ;   एव  –  निश्चय ही  ;  च  –  तथा  ;  अहंकार:  –  अहंकार  ;  इति  –  इस प्रकार  ;  इयम्  –  ये सव  ;   मे  – मेरी  ;  भिना  – पृथक्  ;  प्रकृतिः  –  शक्तियाँ   ;  अष्टधा – आठ प्रकार की । 

पृथ्वी , जल , अग्नि , वायु , आकाश , मन , बुद्धि तथा अहंकार – ये आठ प्रकार से विभक्त मेरी भिन्ना ( अपरा ) प्रकृतियाँ हैं । 

तात्पर्य :-  ईश्वर – विज्ञान भगवान् की स्वाभाविक स्थिति तथा उनकी विविध शक्तियों का विश्लेषण करता है । भगवान् के विभिन्न पुरुष अवतारों ( विस्तारों ) की शक्ति को प्रकृति कहा जाता है , जैसा कि सात्वततन्त्र में उल्लेख मिलता है –

विष्णोस्तु  त्रीणि  रूपाणि  पुरुषाख्यान्यथो  विदुः ।

एक  तु   महतः   स्रष्ट्     द्वितीयं  त्वण्डसंस्थितम् ।

तृतीयं     सर्वभूतस्थं   तानि     ज्ञात्वा    विमुच्यते ॥

” सृष्टि के लिए भगवान् कृष्ण का स्वांश तीन विष्णुओं का रूप धारण करता है । पहले महाविष्णु हैं , जो सम्पूर्ण भौतिक शक्ति महत्तत्त्व को उत्पन्न करते हैं । द्वितीय गर्भोदकशायी विष्णु हैं , जो समस्त ब्रह्माण्डों में प्रविष्ट होकर उनमें विविधता उत्पन्न करते हैं । तृतीय क्षीरोदकशायी विष्णु हैं जो समस्त ब्रह्माण्डों में सर्वव्यापी परमात्मा के रूप में फैले हुए हैं और परमात्मा कहलाते हैं । वे प्रत्येक परमाणु तक के भीतर उपस्थित हैं ।

जो भी इन तीनों विष्णु रूपों को जानता है , वह भवबन्धन से मुक्त हो सकता है । ” यह भौतिक जगत् भगवान् की शक्तियों में से एक का क्षणिक प्राकट्य है । इस जगत् की सारी क्रियाएँ भगवान् कृष्ण के इन तीनों विष्णु अंशों द्वारा निर्देशित हैं । ये पुरुष अवतार कहलाते हैं ।

सामान्य रूप से जो व्यक्ति ईश्वर तत्त्व ( कृष्ण ) को नहीं जानता , वह यह मान लेता है कि यह संसार जीवों के भोग के लिए है और सारे जीव पुरुष हैं – भौतिक शक्ति के कारण , नियन्ता तथा भोक्ता है । भगवद्गीता के अनुसार यह नास्तिक निष्कर्ष झूठा है । प्रस्तुत श्लोक में कृष्ण को इस जगत् का आदि कारण माना गया है । श्रीमद्भागवत  से भी इसकी पुष्टि होती है ।

भगवान् की पृथक् – पृथक् शक्तियाँ इस भौतिक जगत् के घटक हैं । यहाँ तक कि निर्विशेषवादियों का चरमलक्ष्य ब्रह्मज्योति भी एक आध्यात्मिक शक्ति है , जो परव्योम में प्रकट होती है । ब्रह्मज्योति में वैसी भिन्नताएँ नहीं , जैसी कि वैकुण्ठलोकों में हैं , फिर भी निर्विशेषवादी इस ब्रह्मज्योति को चरम शाश्वत लक्ष्य स्वीकार करते हैं । परमात्मा की अभिव्यक्ति भी क्षीरोदकशायी विष्णु का एक क्षणिक सर्वव्यापी पक्ष है ।

आध्यात्मिक जगत् में परमात्मा की अभिव्यक्ति शाश्वत नहीं होती । अतः यथार्थ परमसत्य तो श्रीभगवान् कृष्ण हैं । वे पूर्ण शक्तिमान पुरुष हैं और उनकी नाना प्रकार की भिन्ना तथा अन्तरंगा शक्तियाँ होती हैं । जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है , भौतिक शक्ति आठ प्रधान रूपों में व्यक्त होती है । इनमें से प्रथम पाँच – पृथ्वी , जल , अग्नि , वायु तथा आकाश स्थूल अथवा विराट सृष्टियाँ कहलाती हैं , जिनमें पाँच इन्द्रियविषय , जिनके नाम हैं – शब्द , स्पर्श , रूप , रस , तथा गंध – सम्मिलित रहते हैं ।

भौतिक विज्ञान में ये ही दस तत्त्व है । किन्तु अन्य तीन तत्त्वों को , जिनके नाम मन , बुद्धि तथा अहंकार हैं , भौतिकतावादी उपेक्षित रखते हैं । दार्शनिक भी , जो मानसिक कार्यकलापों से संबंध रखते हैं , पूर्णज्ञानी नहीं है , क्योंकि वे परम उद्गम कृष्ण को नहीं जानते । मिथ्या अहंकार में हूं ‘ तथा ‘ यह मेरा है ‘ – जो कि संसार का मूल कारण है इसमें विषयभोग की दस इन्द्रियों का समावेश है ।

बुद्धि महत्तत्व नामक समग्र भौतिक सृष्टि की सूचक है । अतः भगवान् की आठ विभिन्न शक्तियों से जगत् के चौबीस तत्त्व प्रकट हैं , जो नास्तिक सांख्यदर्शन के विषय है । ये मूलतः कृष्ण की शक्तियों की उपशाखाएँ हैं और उनसे भिन्न हैं , किन्तु नास्तिक सांख्य दार्शनिक अल्पज्ञान के कारण यह नहीं जान पाते कि कृष्ण समस्त कारणों के कारण हैं । जैसा कि भगवद्गीता में कहा गया है , सांख्यदर्शन की विवेचना का विषय कृष्ण की बहिरंगा शक्ति का प्राकट्य है । 

अपरेयमितस्त्वन्यां  प्रकृतिं  विद्धि   मे  पराम् । 

       जीवभूतां   महाबाहो   यवेदं   धार्यते    जगत् ॥ ५ ॥

अपरा  –  निकृष्ट , जड़  ;  इयम्  –  यह  ;  इतः  –  इसके अतिरिक्त  ;   तु  –  लेकिन  ;  अन्याम्  –   अन्य   ;   प्रकृतिम्  –  प्रकृति को  ;  विद्धि  –  जानने का प्रयत्न करो  ;   मे  –  मेरी   ;  पराम्  –  उत्कृष्ट , चेतन  ;  जीव-भूताम्   –  जीवों वाली  ;  महा-बाहो   –  हे बलिष्ठ भुजाओं वाले  ;  यया – जिसके द्वारा  ;   इदम्  –  यह   ;  धार्यते   –  प्रयुक्त किया जाता है , दोहन होता है   ;   जगत्  –  संसार । 

हे महाबाहु अर्जुन ! इनके अतिरिक्त मेरी एक अन्य परा शक्ति है जो उन जीवों से युक्त है , जो इस भौतिक अपरा प्रकृति के साधनों का विदोहन कर रहे हैं । 

तात्पर्य :- इस श्लोक में स्पष्ट कहा गया है कि जींव परमेश्वर की परा प्रकृति ( शक्ति ) है । अपरा शक्ति तो पृथ्वी , जल , अग्नि , वायु , आकाश , मन , बुद्धि तथा अहंकार जैसे विभिन्न तत्त्वों के रूप में प्रकट होती है । भौतिक प्रकृति के ये दोनों रूप – स्थूल ( पृथ्वी आदि ) तथा सूक्ष्म ( मन आदि ) -अपरा शक्ति के ही प्रतिफल हैं ।

जीव जो अपने विभिन्न कार्यों के लिए अपरा शक्तियों का विदोहन करता रहता है , स्वयं परमेश्वर की परा शक्ति है और यह वही शक्ति है जिसके कारण सारा संसार कार्यशील है । इस दृश्यजगत् में कार्य करने की तब तक शक्ति नहीं आती , जब तक कि परा शक्ति अर्थात् जीव द्वारा यह गतिशील नहीं बनाया जाता शक्ति का नियन्त्रण सदैव शक्तिमात करता है , अतः जीव सदैव भगवान् द्वारा नियन्त्रित होते हैं । जीवों का अपना कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है ।

वे कभी भी सम शक्तिमान नहीं , जैसा कि बुद्धिहीन मनुष्य सोचते हैं । श्रीमद्भागवत में ( १०.८७.३० ) जीव तथा भगवान् के अन्तर को इस प्रकार बताया गया है 

अपरिमिता   ध्रुवास्तनुभृतो   यदि   सर्वगता

स्तर्हि  न  शास्यतेति  नियमो  ध्रुव    नेतरथा ।

अजनि  च  यन्मयं  तदविमुच्य नियन्तु भवेत्

सममनुजानतां      यदमतं        मतदुष्टतया ॥

 ” हे परम शाश्वत । यदि सारे देहधारी जीव आप ही की तरह शाश्वत एवं सर्वव्यापी होते तो वे आपके नियन्त्रण में न होते । किन्तु यदि जीवों को आपकी सूक्ष्म शक्ति के रूप में मान लिया जाय तब तो वे सभी आपके परम नियन्त्रण में आ जाते हैं । अतः वास्तविक मुक्ति तो आपकी शरण में जाना है और इस शरणागति से वे सुखी होंगे । उस स्वरूप में ही वे नियन्ता बन सकते हैं ।

अतः अल्पज्ञ पुरुष , जो अद्वैतवाद के पक्षधर हैं और इस सिद्धान्त का प्रचार करते हैं कि भगवान् और जीव सभी प्रकार से एक दूसरे के समान हैं , वास्तव में वे प्रदूषित मत द्वारा निर्देशित होते हैं । ”

परमेश्वर कृष्ण ही एकमात्र नियन्ता हैं और सारे जीव उन्हीं के द्वारा नियन्त्रित हैं । सारे जीव उनकी पराशक्ति हैं , क्योंकि उनके गुण परमेश्वर के समान हैं , किन्तु वे शक्ति की मात्रा के विषय में कभी भी समान नहीं हैं । स्थूल तथा सूक्ष्म अपराशक्ति का उपभोग करते हुए पराशक्ति ( जीव ) को अपने वास्तविक मन तथा बुद्धि की विस्मृति हो जाती है । इस विस्मृति का कारण जीव पर जड़ प्रकृति का प्रभाव है ।

किन्तु जब जीव माया के बन्धन से मुक्त हो जाता है , तो उसे मुक्ति पद प्राप्त होता है । माया के प्रभाव में आकर अहंकार सोचता है , ” मैं ही पदार्थ हूँ और सारी भौतिक उपलब्धि मेरी है । ” जब वह सारे भौतिक विचारों से , जिनमें भगवान् के साथ तादात्म्य भी सम्मिलित है , मुक्त हो जाता है , तो उसे वास्तविक स्थिति प्राप्त होती है ।

अतः यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि गीता जीव को कृष्ण की अनेक शक्तियों में से एक मानती है और जब यह शक्ति भौतिक कल्मष से मुक्त हो जाती है , तो यह पूर्णतया कृष्णभावनाभावित या बन्धन मुक्त हो जाती है । 

एतद्योनीनि    भूतानि    सर्वाणीत्युपधारय । 

       अहं  कृत्स्त्रस्य  जगतः   प्रभवः प्रलयस्तथा ॥ ६ ॥ 

एतत्  –  ये दोनों शक्तियाँ   ;   योनीनि  –  जिनके जन्म के स्रोत , योनियाँ  ;   भूतानि  –  प्रत्येक सृष्ट पदार्थ   ;    सर्वाणि   –  सारे   ;  इति  –  इस प्रकार   ;  उपधारय  –  जानो   ;   अहम्  –  मैं   ; कृत्स्त्रस्य   –   सम्पूर्ण   ;  जगतः  –   जगत का  ;   प्रभवः  –   उत्पत्ति का कारण  ;   प्रलयः  –  प्रलय , संहार  ;   तथा  – और । 

सारे प्राणियों का उद्गम इन दोनों शक्तियों में है । इस जगत् में जो कुछ भी भौतिक तथा आध्यात्मिक है , उसकी उत्पत्ति तथा प्रलय मुझे ही जानो । 

तात्पर्य :-  जितनी वस्तुएँ विद्यमान हैं , वे पदार्थ तथा आत्मा के प्रतिफल है । आत्मा सृष्टि का मूल क्षेत्र है और पदार्थ आत्मा द्वारा उत्पन्न किया जाता है । भौतिक विकास की किसी भी अवस्था में आत्मा की उत्पत्ति नहीं होती , अपितु यह भौतिक जगत् आध्यात्मिक शक्ति के आधार पर ही प्रकट होता है । इस भौतिक शरीर का इसलिए विकास हुआ क्योंकि इसके भीतर आत्मा उपस्थित है ।

एक बालक धीरे – धीरे बढ़कर कुमार तथा अन्त में युवा बन जाता है , क्योंकि उसके भीतर आत्मा उपस्थित है । इसी प्रकार इस विराट ब्रह्माण्ड की समग्र सृष्टि का विकास परमात्मा विष्णु की उपस्थिति के कारण होता है । अतः आत्मा तथा पदार्थ मूलतः भगवान् की दो शक्तियाँ हैं , जिनके संयोग से विराट ब्रह्माण्ड प्रकट होता है । अतः भगवान् ही सभी वस्तुओं के आदि कारण हैं ।

भगवान् का अंश रूप जीवात्मा भले ही किसी गगनचुम्बी प्रासाद या किसी महान कारखाने या किसी महानगर का निर्माता हो सकता है , किन्तु वह विराट ब्रह्माण्ड का कारण नहीं हो सकता । इस विराट ब्रह्माण्ड का खष्टा भी विराट आत्मा या परमात्मा है । और परमेश्वर कृष्ण विराट तथा लघु दोनों ही आत्माओं के कारण है । अतः वे समस्त कारणों के कारण हैं । इसकी पुष्टि कठोपनिषद् में ( २.२.१३ ) हुई है – नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानाम्

मत्तः  परतरं  नान्यत्किञ्चिदस्ति  धनञ्जय । 

        मयि  सर्वमिदं  प्रोतं सूत्रे  मणिगणा  इव ॥ ७ ॥  

मत्तः  –  मुझसे परे  ;   पर-तरम्  –  श्रेष्ठ   ;  न  –  नहीं  ;   अन्यत् किञ्चित्   –  अन्य कुछ भी  ;  अस्ति  –  है   ;   धनञ्जय  –  हे धन के विजेता  ;  मयि  –  मुझमें  ;  सर्वम्  –  सब कुछ  ;   इदम्  – यह जो हम देखते हैं  ;   प्रोतम्  –  गुंथा हुआ   ;  सूत्रे  –  धागे में  ;  मणि-गणा:   –   मोतियों के दाने  ;  इव  –  सदृश

 हे धनञ्जय ! मुझसे श्रेष्ठ कोई सत्य नहीं है । जिस प्रकार मोती धागे में गुँथे रहते है , उसी प्रकार सब कुछ मुझ पर ही आश्रित है । 

तात्पर्य :- परमसत्य साकार है या निराकार , इस पर सामान्य विवाद चलता है । जहाँ तक भगवद्गीता का प्रश्न है , परमसत्य तो श्रीभगवान् श्रीकृष्ण हैं और इसकी पुष्टि पद – पद पर होती है । इस श्लोक में विशेष रूप से वल है कि परमसत्य पुरुष रूप है । इस बात की कि भगवान् ही परमसत्य हैं , ब्रह्मसंहिता में भी पुष्टि हुई है – ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्द विग्रहः- परमसत्य श्रीभगवान् कृष्ण ही हैं , जो आदि पुरुष हैं ।

समस्त आनन्द के आगार गोविन्द हैं और वे सच्चिदानन्द स्वरूप हैं । ये सब प्रमाण निर्विवाद रूप से प्रमाणित करते हैं कि परम सत्य परम पुरुष हैं जो समस्त कारणों का कारण हैं । फिर भी निरीश्वरवादी श्वेताश्वतर उपनिषद् में ( ३.१० ) उपलब्ध वैदिक मन्त्र के आधार पर तर्क करते हैं-

ततो यदुत्तरतरं तदरूपमनामयं

य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्त्यथेतरे दुःखमेवापियन्ति

“ भौतिक जगत् में ब्रह्माण्ड के आदि जीव ब्रह्मा को देवताओं , मनुष्यों तथा निम्न प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है । किन्तु ब्रह्मा के परे एक इन्द्रियातीत ब्रह्म है जिसका कोई भौतिक स्वरूप नहीं होता और जो समस्त भौतिक कल्मष से रहित होता है । जो व्यक्ति उसे जान लेता है वह भी दिव्य बन जाता है , किन्तु जो उसे नहीं जान पाते , वे सांसारिक दुखों को भोगते रहते हैं । ”

निर्विशेषवादी अरूपम् शब्द पर विशेष बल देते हैं । किन्तु यह अरूपम् शब्द निराकार नहीं है । यह दिव्य सच्चिदानन्द स्वरूप का सूचक है , जैसा कि ब्रह्मसंहिता में वर्णित है और ऊपर उद्धृत है । श्वेताश्वतर उपनिषद् के अन्य श्लोकों ( ३.८ – ९ ) से भी इसकी पुष्टि होती है 

वेदाहमेतं         पुरुषं         महान्तमादित्यवर्णं       तमसः       परस्तात् ।

तमेव       विद्वानति       मृत्युमेति     नान्यः       पन्था      विद्यतेऽयनाय ॥

यस्मात्परं  नापरमस्ति  किञ्चिद्  यस्मान्नाणीयो  नो  ज्यायोऽस्ति  किञ्चित् ।

वृक्ष     इव    स्तब्धो     दिवि    तिष्ठत्येकस्तेनेदं   पूर्ण    पुरुषेण    सर्वम् ॥

” में उन भगवान् को जानता हूँ जो अंधकार की समस्त भौतिक अनुभूतियों से परे हैं । उनको जानने वाला ही जन्म तथा मृत्यु के बन्धन का उल्लंघन कर सकता है । उस परमपुरुष के इस ज्ञान के अतिरिक्त मोक्ष का कोई अन्य साधन नहीं है । ”

उन परमपुरुष से बढ़कर कोई सत्य नहीं क्योंकि वे श्रेष्ठतम हैं । वे सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर हैं और महान से भी महानतर हैं । वे मूक वृक्ष के समान स्थित हैं और दिव्य आकाश को प्रकाशित करते हैं । जिस प्रकार वृक्ष अपनी जड़ें फैलाता है , वे भी अपनी विस्तृत शक्तियों का प्रसार करते हैं ।

 ” इन श्लोकों से निष्कर्ष निकलता है कि परमसत्य ही श्रीभगवान् हैं , जो अपनी विविध  परा-अपरा  शक्तियों के द्वारा सर्वव्यापी हैं ।“

भगवद-गीता-अध्याय-7.1-_-विज्ञान-सहित-ज्ञान-का-विषयइश्वर-की-व्यापकता-का-वर्णन
भगवद गीता अध्याय 7.1

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