भगवद गीता – अध्याय 6.2 ~ आत्म-उद्धार की प्रेरणा और भगवत्प्राप्त पुरुष के लक्षण एवं एकांतसाधना के महत्व आदि  का  वर्णन / Bhagwad Geeta Chapter -6 

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अध्याय छह  (Chapter -6)

भगवद गीता – अध्याय 6  में शलोक 05 से  शलोक 10  तक आत्म-उद्धार की प्रेरणा और भगवत्प्राप्त पुरुष के लक्षण एवं एकांतसाधना  के महत्व का वर्णन !

उद्धरेदात्मनात्मानं     नात्मानमवसादयेत् । 

       आत्मैव  ह्यात्मनो  बन्धुरात्मैव  रिपुरात्मनः ॥ ५ ॥ 

उद्धरेत्  –  उद्धार करे  ;  आत्मना  –  मन से  ;  आत्मानम्  –   बद्धजीव को   ;  न  –  कभी नहीं ;  आत्मानम्  –  बद्धजीव को   ;  अवसादयेत्  –  पतन होने दे  ;  आत्मा  –  मन  ;  एव  – निश्चय ही  ;  हि  –  निस्सन्देह   ;  आत्मनः – वद्धजीव का  ;  बन्धुः  –  मित्र  ;  आत्मा  –  मन  ;  एव  –  निश्चय हीं  ;   रिपुः  – शत्रु  ;  आत्मनः  –  बद्धजीव का 

मनुष्य को चाहिए कि अपने मन की सहायता से अपना उद्धार करे और अपने को नीचे न गिरने दे । यह मन बद्धजीव का मित्र भी है और शत्रु भी ।

तात्पर्य :-  प्रसंग के अनुसार आत्मा शब्द का अर्थ शरीर , मन तथा आत्मा होता है । योगपछति में मन तथा आत्मा का विशेष महत्त्व है । चूँकि मन ही योगपद्धति का केन्द्रविन्दु है , अतः इस प्रसंग में आत्मा का तात्पर्य मन होता है । योगपद्धति का उद्देश्य मन को रोकना तथा इन्द्रियविषयों के प्रति आसक्ति से उसे हटाना है ।

यहाँ पर इस बात पर बल दिया गया है कि मन को इस प्रकार प्रशिक्षित किया जाय कि वह बदजीव को अज्ञान के दलदल से निकाल सके । इस जगत् में मनुष्य मन तथा इन्द्रियों के द्वारा प्रभावित होता है । वास्तव में शुद्ध आत्मा इस संसार में इसीलिए फँसा हुआ है क्योंकि मन मिथ्या अहंकार में लगकर प्रकृति के ऊपर प्रभुत्व जताना चाहता है ।

अतः मन को इस प्रकार प्रशिक्षित करना चाहिए कि वह प्रकृति की तड़क – भड़क से आकृष्ट न हो और इस तरह बदजीव की रक्षा की जा सके । मनुष्य को इन्द्रियविषयों में आकृष्ट होकर अपने को पतित नहीं करना चाहिए । जो जितना ही इन्द्रियविषयों के प्रति आकृष्ट होता है वह उतना ही इस संसार में फंसता जाता है । अपने को विरत करने का सर्वोत्कृष्ट साधन यही है कि मन को सदैव कृष्णभावनामृत में निरत रखा जाय ।

हि  शब्द इस बात पर बल देने के लिए प्रयुक्त हुआ है अर्थात् इसे अवश्य करना चाहिए । अमृतबिन्दु उपनिषद् में ( २ ) कहा भी गया है — 

मन    एवं   मनुष्याणां   कारणं  बन्धमोक्षयोः ।

बन्धाय     विषयासंगो  मुक्त्यै   निर्विषयं  मनः ॥

” मन ही मनुष्य के बन्धन का और मोक्ष का भी कारण है । इन्द्रियविषयों में लीन मन बन्धन का कारण है और विषयों से विरक्त मन मोक्ष का कारण है । ” अतः जो मन निरन्तर कृष्णभावनामृत में लगा रहता है , वही परम मुक्ति का कारण है । 

बन्धुरात्मात्मनस्तस्य  येनात्मैवात्मना   जितः । 

       अनात्मनस्तु     शत्रुत्वे     वर्ततात्मैव  शत्रुवत् ॥ ६ ॥ 

बन्धुः  –  मित्र   ;  आत्मा  –  मन  ;  आत्मनः  –  जीव का  ;   तस्य  –  उसका  ;  येन  –  जिससे  ;  आत्मा  –  मन  ;   एव  –  निश्चय ही  ;  आत्मना  –  जीवात्मा के द्वारा  ;  जितः  –  विजित  ;  अनात्मनः   –  जो मन को वश में नहीं कर पाया उसका   ;   तु  –  लेकिन  ;  शत्रुत्वे  –   शत्रुता के कारण  ;  वर्तेत  –  बना रहता है  ;  आत्मा एव  –  वही मन  ;   शत्रु-वत्  –  शत्रु की भाँति 

जिसने मन को जीत लिया है उसके लिए मन सर्वश्रेष्ठ मित्र है , किन्तु जो ऐसा नहीं कर पाया उसके लिए मन सबसे बड़ा शत्रु बना रहेगा ।

  तात्पर्य :-  अष्टांगयोग के अभ्यास का प्रयोजन मन को वश में करना है , जिससे मानवीय लक्ष्य प्राप्त करने में वह मित्र बना रहे । मन को वश में किये बिना योगाभ्यास करना मात्र समय को नष्ट करना है । जो अपने मन को वश में नहीं कर सकता , वह सतत अपने परम शत्रु के साथ निवास करता है और इस तरह उसका जीवन तथा लक्ष्य दोनों ही नष्ट हो जाते हैं । जीव की स्वाभाविक स्थिति यह है कि वह अपने स्वामी की आज्ञा का पालन करे ।

अतः जब तक मन अविजित शत्रु बना रहता है , तब तक मनुष्य को काम , क्रोध , लोभ , मोह आदि की आज्ञाओं का पालन करना होता है । किन्तु जब मन पर विजय प्राप्त हो जाती है , तो मनुष्य इच्छानुसार उस भगवान् की आज्ञा का पालन करता है जो सवों के हृदय में परमात्मास्वरूप स्थित है । वास्तविक योगाभ्यास हृदय के भीतर परमात्मा से भेंट करना तथा उनकी आज्ञा का पालन करना है । जो व्यक्ति साक्षात् कृष्णभावनामृत स्वीकार करता है वह भगवान् की आज्ञा के प्रति स्वतः समर्पित हो जाता है । 

जितात्मनः  प्रशान्तस्य  परमात्मा  समाहितः ।

          शीतोष्णसुखदुःखेषु   तथा    मानापमानयोः ॥ ७ ॥ 

जित-आत्मनः  –   जिसने मन को जीत लिया है   ;   प्रशान्तस्य  –  मन को वश में करके शान्ति प्राप्त करने वाले का   ;  परम-आत्मा  –  परमात्मा  ;  समाहितः  –  पूर्णरूप से प्राप्त  ;   शीत  –  सर्दी   ;    उष्ण  –  गर्मी में  ;   सुख  – सुख  ;  दुःखेषु  –  तथा दुख में   ;  तथा  –  भी   ;  मान  – सम्मान   ;   अपमानयोः   –  तथा अपमान में  ।

जिसने मन को जीत लिया है , उसने पहले ही परमात्मा को प्राप्त कर लिया है , क्योंकि उसने शान्ति प्राप्त कर ली है । ऐसे पुरुष के लिए सुख – दुख , सर्दी – गर्मी एवं मान – अपमान एक से हैं । 

तात्पर्य :- वस्तुतः प्रत्येक जीव उस भगवान् की आज्ञा का पालन करने के निमित्त आया है , जो जन – जन के हृदयों में परमात्मा – रूप में स्थित है । जय मन बहिरंगा माया द्वारा विपथ कर दिया जाता है तव मनुष्य भौतिक कार्यकलापों में उलझ जाता है ।

अतः ज्योंही मन किसी योगपद्धति द्वारा वश में आ जाता है त्योंही मनुष्य को लक्ष्य पर पहुँचा हुआ मान लिया जाना चाहिए । मनुष्य को भगवद् – आज्ञा का पालन करना चाहिए । जब मनुष्य का मन परा प्रकृति में स्थिर हो जाता है तो जीवात्मा के समक्ष भगवद् – आज्ञा पालन करने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं रह जाता ।

मन को किसी न किसी उच्च आदेश को मानकर उसका पालन करना होता है । मन को वश में करने से स्वतः ही परमात्मा के आदेश का पालन होता है । चूँकि कृष्णभावनाभावित होते ही यह दिव्य स्थिति प्राप्त हो जाती है , अतः भगवद्भक्त संसार के द्वन्डों , यथा सुख – दुख , सर्दी – गर्मी आदि से अप्रभावित रहता है । यह अवस्था व्यावहारिक समाधि या परमात्मा में तल्लीनता है । 

ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा    कूटस्थो   विजितेन्द्रियः । 

       युक्त   इत्युच्यते    योगी   समलोष्ट्राश्मकाञ्चनः ॥ ८ ॥ 

ज्ञान  –  अर्जित ज्ञान  ;   विज्ञान  –  अनुभूत ज्ञान से  ;   तृप्त  –  सन्तुष्ट  ;  आत्मा  –  जीव  ; कूट-स्थ:   –  आध्यात्मिक रूप से स्थित  ;  विजित-इन्द्रियः  –  इन्द्रियों को वश में करके   ;  युक्तः  –  आत्म- साक्षात्कार के लिए सक्षम   ;  इति  –  इस प्रकार   ;  उच्यते  –  कहा जाता है  ;  योगी  –  योग का साधक  ;   सम  –  समदर्शी  ;  लोष्ट्र  –   कंकड़  ;  अश्म  –  पत्थर  ;  काञ्चनः  –  स्वर्ण । 

वह व्यक्ति आत्म – साक्षात्कार को प्राप्त तथा योगी कहलाता है जो अपने अर्जित ज्ञान तथा अनुभूति से पूर्णतया सन्तुष्ट रहता है । ऐसा व्यक्ति अध्यात्म को प्राप्त तथा जितेन्द्रिय कहलाता है । वह सभी वस्तुओं को चाहे वे कंकड़ हों , पत्थर हों या कि सोना – एकसमान देखता है । 

तात्पर्य :- परमसत्य की अनुभूति के बिना कोरा ज्ञान व्यर्थ होता है । भक्तिरसामृत सिन्धु में ( १.२.२३४ ) कहा गया है-

अतः  श्रीकृष्णनामादि  न  भवेद्   ग्राह्यमिन्द्रियैः ।

सेवोन्मुखे    हि   जिहादी   स्वयमेव  स्फुरत्यदः ॥

 ” कोई भी व्यक्ति अपनी दूषित इन्द्रियों के द्वारा श्रीकृष्ण के नाम , रूप , गुण तथा पूरित होने पर उनकी लीलाओं की दिव्य प्रकृति को नहीं समझ सकता । भगवान् की दिव्य सेवा से है । कोई उनके दिव्य नाम , रूप , गुण तथा लोलाओं को समझ सकता  है । ”

यह भगवद्गता कृष्णभावनामृत का विज्ञान है । मात्र संसारी विद्वत्ता से कोई कृष्णभावनाभावित नहीं हो सकता । उसे विशुद्ध चेतना वाले व्यक्ति का सान्निध्य प्राप्त होने का सौभाग्य मिलना चाहिए । कृष्णभावनाभावित व्यक्ति को भगवत्कृपा से ज्ञान की अनुभूति होती है , क्योंकि वह विशुद्ध भक्ति से तुष्ट रहता है । अनुभूत ज्ञान से वह पूर्ण बनता है ।

आध्यात्मिक ज्ञान से मनुष्य अपने संकल्पों में दृढ़ रह सकता है , किन्तु मात्र शैक्षिक ज्ञान से वह वाह्य विरोधाभासों द्वारा मोहित और भ्रमित होता रहता है । केवल अनुभवी आत्मा ही आत्मसंयमी होता है , क्योंकि वह कृष्ण की शरण में जा चुका होता है । वह दिव्य होता है क्योंकि उसे संसारी विद्वत्ता से कुछ लेना – देना नहीं रहता । उसके लिए संसारी विद्वत्ता तथा मनोधर्म , जो अन्यों के लिए स्वर्ण के समान उत्तम होते हैं , कंकड़ों या पत्थरों से अधिक नहीं होते ।

 सुहन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु          । 

        साधुष्वपि   च   पापेषु   समबुद्धिविंशिष्यते ॥ ९ ॥ 

सु-हृत्   –  स्वभाव से  ;  मित्र  –  स्नेहपूर्ण हितेच्छु  ;  अरि  –  शत्रु  ;  उदासीन  –  शत्रुओं में तटस्थ  ; मध्यस्थ   –  शत्रुओं में पंच  ;  द्वेष्य  – ईर्ष्यालु  ;   बन्धुषु  –  सम्बन्धियों या शुभेच्छुकों में   ;  साधुषु  – साधुओं में  ;   अपि  –  भी  ;   च  –  तथा  ;  पापेषु  –  पापियों में   ;  सम-बुद्धिः  –  समान बुद्धि वाला  ;   विशिष्यते  –  आगे बढ़ा हुआ होता है । 

जब मनुष्य निष्कपट हितैषियों , प्रिय मित्रों , तटस्थों , मध्यस्थों , ईर्ष्यालुओं , शत्रुओं तथा मित्रों , पुण्यात्माओं एवं पापियों को समान भाव से देखता है , तो वह और भी उन्नत माना जाता है । 

योगी   युञ्जीत  सततमात्मानं   रहसि  स्थितः । 

         एकाकी      यतचित्तात्मा    निराशीरपरिग्रहः ॥ १० ॥ 

योगी  –  योगी   ;   युञ्जीत  –  कृष्णचेतना में केन्द्रित करे  ;  सततम्  –  निरन्तर  ;  आत्मानम्  –  स्वयं को ( मन , शरीर तथा आत्मा से )  ;  रहसि  –  एकान्त स्थान में  ;  स्थितः  –  स्थित होकर  ;  एकाकी  –   अकेले  ;   यत-चित्त-आत्मा    –   मन में सदैव सचेत  ;  निराशी:  –  किसी अन्य वस्तु से आकृष्ट हुए बिना   ;  अपरिग्रहः  –  स्वामित्व की भावना से रहित , संग्रहभाव से मुक्त । 

योगी को चाहिए कि वह सदैव अपने शरीर , मन तथा आत्मा को परमेश्वर में लगाए , एकान्त स्थान में रहे और बड़ी सावधानी के साथ अपने मन को वश में करे । उसे समस्त आकांक्षाओं तथा संग्रहभाव की इच्छाओं से मुक्त होना चाहिए । 

तात्पर्य :-  कृष्ण की अनुभूति ब्रह्म , परमात्मा तथा श्रीभगवान् के विभिन्न रूपों में होती है । संक्षेप में , कृष्णभावनामृत का अर्थ है भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति में निरन्तर प्रवृत्त रहना । किन्तु जो लोग निराकार ब्रह्म अथवा अन्तर्यामी परमात्मा के प्रति आसक्त होते हैं , वे भी आंशिक रूप से कृष्णभावनाभावित हैं क्योंकि निराकार ब्रह्म कृष्ण की आध्यात्मिक किरण है और परमात्मा कृष्ण का सर्वव्यापी आंशिक विस्तार होता है ।

इस प्रकार निर्विशेषवादी तथा ध्यानयोगी भी अपरोक्ष रूप से कृष्णभावनाभावित होते हैं । प्रत्यक्ष कृष्णभावनाभावित व्यक्ति सर्वोच्च योगी होता है क्योंकि ऐसा भक्त जानता है कि ब्रह्म और परमात्मा क्या है । उसका परमसत्य विषयक ज्ञान पूर्ण होता है , जबकि निर्विशेषवादी तथा ध्यानयोगी अपूर्ण रूप में कृष्णभावनाभावित होते हैं ।

इतने पर भी इन सबों को अपने – अपने कार्यों में निरन्तर लगे रहने का आदेश दिया जाता है , जिससे वे देर – सवेर परम सिद्धि प्राप्त कर सकें । योगी का पहला कर्तव्य है कि वह कृष्ण पर अपना ध्यान सदेव एकाग्र रखे । उसे सदेव कृष्ण का चिन्तन करना चाहिए । और एक क्षण के लिए भी उन्हें नहीं भुलाना चाहिए । परमेश्वर में मन की एकाग्रता ही समाधि कहलाती है । म

न को एकाग्र करने के लिए सदेव एकान्तवास करना चाहिए और बाहरी उपद्रवों से बचना चाहिए । योगी को चाहिए कि वह अनुकूल परिस्थितियों को ग्रहण करे और प्रतिकूल परिस्थितियों को त्याग दे , जिससे उसकी अनुभूति पर कोई प्रभाव न पड़े । पूर्ण संकल्प कर लेने पर उसे उन व्यर्थ की वस्तुओं के पीछे नहीं पड़ना चाहिए जो परिग्रह भाव में उसे फँसा लें ।

ये सारी सिद्धियाँ तथा सावधानियाँ तभी पूर्णरूपेण कार्यान्वित हो सकती है जब मनुष्य प्रत्यक्षतः कृष्णभावनाभावित हो क्योंकि साक्षात् कृष्णभावनामृत का अर्थ है आत्मोत्सर्ग जिसमें संग्रहभाव ( परिग्रह ) के लिए लेशमात्र स्थान नहीं होता । श्रील रूपगोस्वामी कृष्णभावनामृत का लक्षण इस प्रकार देते हैं 

अनासक्तस्य     विषयान्     यथाहंमुपयुञ्जतः ।

निर्बन्धः   कृष्णसम्बन्धे    युक्तं  वैराग्यमुच्यते ॥

प्रापचिकतया     बुद्ध्या   हरिसम्बन्धिवस्तुनः ।

मुमुक्षुभिः  परित्यागो  वैराग्यं  फल्गु  कथ्यते ॥

” जब मनुष्य किसी वस्तु के प्रति आसक्त न रहते हुए कृष्ण से सम्बन्धित हर वस्तु को स्वीकार कर लेता है , तभी वह परिग्रहत्व से ऊपर स्थित रहता है । दूसरी ओर , जो व्यक्ति कृष्ण से सम्बन्धित प्रत्येक वस्तु को बिना जाने त्याग देता है उसका वैराग्य पूर्ण नहीं होता । ” ( भक्तिरसामृत सिन्धु २.२५५-२५६ ) ।

कृष्णभावनाभावित व्यक्ति भलीभाँति जानता रहता है कि प्रत्येक वस्तु श्रीकृष्ण की है , फलस्वरूप वह सभी प्रकार के परिग्रहभाव से मुक्त रहता है । इस प्रकार वह अपने लिए किसी वस्तु की लालसा नहीं करता ।

वह जानता है कि किस प्रकार कृष्णभावनामृत के अनुरूप वस्तुओं को स्वीकार किया जाता है और कृष्णभावनामृत के प्रतिकूल वस्तुओं का परित्याग कर दिया जाता है । वह सदेव भौतिक वस्तुओं से दूर रहता है , क्योंकि वह दिव्य होता है और कृष्णभावनामृत से रहित व्यक्तियों से किसी प्रकार का सरोकार न रखने के कारण सदा अकेला रहता है । अतः कृष्णभावनामृत में रहने वाला व्यक्ति पूर्णयोगी होता है । 

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