भगवद गीता अध्याय 4.4 ~ फलसहित विभिन्न यज्ञों का वर्णन / Powerful Bhagavad Gita yagyon ka barnan Ch4.4

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अध्याय चार (Chapter -4)

 
भगवद गीता अध्याय 4.4 ~ में शलोक 24 से  शलोक 33  तक  फलसहित  विभिन्न  यज्ञों  का  वर्णन !

ब्रह्मार्पणं   ब्रह्म  हविर्ब्रह्माग्नो  ब्रह्मणा  हुतम् ।

         तेन     ब्रह्मव    गन्तव्य   ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥ २४ ॥

ब्रह्म    –  आध्यात्मिक  ;   अर्पणम्   –   अर्पण   ;   ब्रह्म   –   ब्रह्म  ;   हविः  –  घृत  ;    ब्रह्म   – आध्यात्मिक  ;   अग्नौ   –   हवन रूपी अग्नि में   ;   ब्रह्मणा   –   आत्मा द्वारा  ;   हुतम्   –   अर्पित   ; ब्रह्म   –  परमधाम  ;    एव  –   निश्चय ही   ;   तेन   –   उसके द्वारा  ;   गन्तव्यम्   –  पहुँचने योग्य  ;   ब्रह्म  –  आध्यात्मिक  ;   कर्म  –  कर्म में   ;   समाधिना  –   पूर्ण एकाग्रता के द्वारा 

जो व्यक्ति कृष्णभावनामृत में पूर्णतया लीन रहता है , उसे अपने आध्यात्मिक कर्मों के योगदान के कारण अवश्य ही भगवद्धाम की प्राप्ति होती है , क्योंकि उसमें हवन आध्यात्मिक होता है और हवि भी आध्यात्मिक होती है । 

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   तात्पर्य : यहाँ इसका वर्णन किया गया है कि किस प्रकार कृष्णभावनाभावित कर्म करते हुए अन्ततोगत्वा आध्यात्मिक लक्ष्य प्राप्त होता है । कृष्णभावनामृत विषयक विविध कर्म होते हैं , जिनका वर्णन अगले श्लोकों में किया गया है , किन्तु इस श्लोक में तो केवल कृष्णभावनामृत का सिद्धान्त वर्णित है । 

भौतिक कल्मष से ग्रस्त वद्धजीव को भौतिक वातावरण में ही कार्य करना पड़ता है , किन्तु फिर भी उसे ऐसे वातावरण से निकलना ही होगा । जिस विधि से वह ऐसे वातावरण से बाहर निकल सकता है , वह कृष्णभावनामृत है । 

उदाहरण के लिए , यदि कोई रोगी दूध की बनी वस्तुओं के अधिक खाने से पेट की गड़वड़ी से ग्रस्त हो जाता है तो उसे दही दिया जाता है , जो दूध ही से बनी अन्य वस्तु है । भोतिकता में प्रस्त बदजीव का उपचार  कृष्णभावनामृत के द्वारा किया जा सकता है जो यहाँ गीता में दिया हुआ है । 

यह विधि यज्ञ या विष्णु या कृष्ण को प्रसन्न करने के लिए किये गये कार्य कहलाती है । भौतिक जगत् के जितने ही अधिक कार्य कृष्णभावनामृत में या केवल विष्णु के लिए किये जाते हैं पूर्ण तल्लीनता से वातावरण उतना ही अधिक आध्यात्मिक बनता रहता है । ब्रह्म शब्द का अर्थ है ‘ आध्यात्मिक ‘ ।

भगवान् आध्यात्मिक हैं और उनके दिव्य शरीर की किरणं ब्रह्मज्योति कहलाती है – यही उनका आध्यात्मिक तेज है । प्रत्येक वस्तु इसी ब्रह्मज्योति में स्थित रहती है , किन्तु जब यह ज्योति माया या इन्द्रियतृप्ति द्वारा आच्छादित हो जाती है तो यह भौतिक ज्योति कहलाती है । यह भौतिक आवरण कृष्णभावनामृत द्वारा तुरन्त हटाया जा सकता है ।

अतएव कृष्णभावनामृत के लिए अर्पित हवि , ग्रहणकर्ता , हवन , होता तथा फल- ये सब मिलकर ब्रह्म या परम सत्य हैं । माया द्वारा आच्छादित परमसत्य पदार्थ कहलाता है । जब यही पदार्थ परमसत्य के निमित्त प्रयुक्त होता है , तो इसमें फिर से आध्यात्मिक गुण आ जाता है ।

कृष्णभावनामृत मोहजनित चेतना को ब्रह्म या परमेश्वरोन्मुख करने की विधि है ।  जब मन कृष्णभावनामृत में पूरी तरह निमग्न रहता है तो उसे समाधि कहते हैं । ऐसी दिव्यचेतना में सम्पन्न कोई भी कार्य यज्ञ कहलाता है । आध्यात्मिक चेतना की ऐसी स्थिति में होता , हवन , अग्नि , यज्ञकर्ता तथा अन्तिम फल यह सब परब्रह्म में एकाकार हो जाता है । यही कृष्णभावनामृत की विधि है ।

दैवमेवापरे   यज्ञं   योगिनः पर्युपासते ।

          ब्रह्मानावपरे    यज्ञं   यज्ञेनैवोपजुह्वति ॥ २५ ॥

 देवम्   –   देवताओं की पूजा करने में    ;    एव   –    इस प्रकार   ;   अपरे   –  अन्य  ;   यज्ञम्  –  यज्ञ को  ;    योगिनः  –   योगीजन   ;   पर्युपासते  –   भलीभाँति पूजा करते हैं    ;    ब्रह्म   –   परमसत्य का   ;    अग्नो   –   अग्नि में   ;   अपरे  –  अन्य  ;   यज्ञम्  –   यज्ञ को    ;   यज्ञेन   –  यज्ञ से   ;    एव   –   इस प्रकार   ;   उपजुद्धति   –   अर्पित करते हैं

कुछ योगी विभिन्न प्रकार यज्ञों द्वारा देवताओं की भलीभाँति पूजा करते हैं और कुछ परब्रह्म रूपी अग्नि में आहुति डालते हैं । 

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     तात्पर्य :-  जैसा कि पहले कहा जा चुका है , जो व्यक्ति कृष्णभावनाभावित होकर अपना कर्म करने में लीन रहता वह पूर्ण योगी है , किन्तु ऐसे भी मनुष्य हैं जो देवताओं की पूजा करने के लिए यज्ञ करते हैं और कुछ परम ब्रह्म या परमेश्वर के निराकार स्वरूप के लिए यज्ञ करते हैं । 

इस तरह यज्ञ की अनेक कोटियाँ हैं । विभिन्न यज्ञकर्ताओं द्वारा सम्पन्न यज्ञ की ये कोटियाँ केवल बाह्य वर्गीकरण हैं । वस्तुतः यज्ञ का अर्थ है भगवान् विष्णु को प्रसन्न करना और विष्णु को यज्ञ भी कहते हैं । विभिन्न प्रकार के यज्ञों को दो श्रेणियों में रखा जा सकता है । सांसारिक द्रव्यों के लिए यज्ञ ( द्रव्ययज्ञ ) तथा दिव्यज्ञान के लिए किये गये यज्ञ ( ज्ञानयज्ञ ) । 

जो कृष्णभावनाभावित हैं उनकी सारी भौतिक सम्पदा परमेश्वर को प्रसन्न करने के लिए होती है , किन्तु जो किसी क्षणिक भौतिक सुख की कामना करते हैं वे इन्द्र , सूर्य आदि देवताओं को प्रसन्न करने के लिए अपनी भौतिक सम्पदा की आहुति देते हैं ।

 किन्तु अन्य लोग , जो निर्विशेषवादी हैं , वे निराकार ब्रह्म में अपने स्वरूप को स्याहा कर देते हैं । देवतागण ऐसी शक्तिमान् जीवात्माएँ हैं जिन्हें ब्रह्माण्ड को ऊष्मा प्रदान करने , जल देने तथा प्रकाशित करने जैसे भौतिक कार्यों की देखरेख के लिए परमेश्वर ने नियुक्त किया है । 

जो लोग भौतिक लाभ चाहते हैं वे वैदिक अनुष्ठानों के अनुसार विविध देवताओं की पूजा करते हैं । ऐसे लोग बहवीश्वरवादी कहलाते हैं । किन्तु जो लोग परम सत्य के निर्गुण स्वरूप की पूजा करते हैं और देवताओं के स्वरूपों को अनित्य मानते हैं , वे ब्रह्म की अग्नि में अपने आप की ही आहुति दे देते हैं , और इस प्रकार ब्रह्म के अस्तित्व में अपने अस्तित्व को समाप्त कर देते हैं । 

ऐसे निर्विशेषवादी परमेश्वर की दिव्यप्रकृति को समझने के लिए दार्शनिक चिन्तन में अपना सारा समय लगाते हैं । दूसरे शब्दों में , सकामकर्मी भौतिकसुख के लिए अपनी भौतिक सम्पत्ति का यजन करते हैं , किन्तु निर्विशेषवादी परब्रह्म में लीन होने के लिए अपनी भौतिक उपाधियों का यजन करते हैं । निर्विशेषवादी के लिए यज्ञाग्नि ही परब्रह्म है , जिसमें आत्मस्वरूप का विलय ही आहुति है ।

 किन्तु अर्जुन जैसा कृष्णभावनाभावित व्यक्ति कृष्ण को प्रसन्न करने के लिए सर्वस्व अर्पित कर देता है । इस तरह उसकी सारी भौतिक सम्पत्ति के साथ – साथ आत्मस्वरूप भी कृष्ण के लिए अर्पित हो जाता है । वह परम योगी है , किन्तु उसका पृथक् स्वरूप नष्ट नहीं होता । 

श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये   संयमाग्निषु   जुह्वति ।

         शब्दादीन्विषयानन्य    इन्द्रियानिष्  जुह्वति ॥ २६॥

श्रोत्र-आदीनि   –   श्रोत्र  आदि   ;    इन्द्रियाणि   –   इन्द्रियाँ    ;   अन्ये   –  अन्य    ;   संयम  –  संयम की     ;    अग्निषु   –   अग्नि में   ;    जुद्धति   –   अर्पित करते हैं    ;    शब्द-आदीन्    –   शब्द आदि    ;    विषयान्  –    इन्द्रियतृप्ति के विषयों को    ;     अन्ये  –   दूसरे   ;   इन्द्रिय   –   इन्द्रियों की   ;     अग्निषु   –   अग्नि में   ;    जुह्वति   –   यजन करते हैं

इनमें से कुछ ( विशुद्ध ब्रह्मचारी ) श्रवणादि क्रियाओं तथा इन्द्रियों को मन की नियन्त्रण रूपी अग्नि में स्वाहा कर देते हैं तो दूसरे लोग ( नियमित गृहस्थ ) इन्द्रियविषयों को इन्द्रियों की अग्नि में स्वाहा कर देते हैं ।

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        तात्पर्य :-   मानव जीवन के चारों आश्रमों के सदस्य – ब्रह्मचारी , गृहस्थ , वानप्रस्थ तथा संन्यासी – पूर्णयोगी बनने के निमित्त हैं । मानव जीवन पशुओं की भाँति इन्द्रियतृप्ति के लिए नहीं बना है , अतएव मानव जीवन के चारों आश्रम इस प्रकार व्यवस्थित हैं कि मनुष्य आध्यात्मिक जीवन में पूर्णता प्राप्त कर सके ।

 ब्रह्मचारी या शिष्यगण प्रामाणिक गुरु की देखरेख में इन्द्रियतृप्ति से दूर रहकर मन को वश में करते हैं । वे कृष्णभावनामृ से सम्बन्धित शब्दों को ही सुनते हैं । श्रवण ज्ञान का मूलाधार है , अतः शुद्ध ब्रह्मचारी सदैव हरेर्नामानुकीर्तनम्अर्थात् भगवान् के यश के कीर्तन तथा श्रवण में ही लगा रहता है ।  वह सांसारिक शब्द – ध्वनियों से दूर रहता है और उसकी श्रवणेन्द्रिय हरे कृष्ण कृष्ण की आध्यात्मिक ध्वनि को सुनने में ही लगी रहती है ।

इसी प्रकार से गृहस्थ भी , जिन्हें इन्द्रियतृप्ति की सीमित छूट है , बड़े ही संयम से इन कार्यों को पूरा करते हैं ।  यौन जीवन , मादकद्रव्य सेवन और मांसाहार मानव समाज की सामान्य प्रवृत्तियाँ हैं , किन्तु संयमित गृहस्थ कभी भी यौन जीवन तथा अन्य इन्द्रियतृप्ति के कार्यों में अनियन्त्रित रूप से प्रवृत्त नहीं होता । इसी उद्देश्य से प्रत्येक सभ्य मानव समाज में धर्म – विवाह का प्रचलन है । 

यह संयमित अनासक्त यौन जीवन भी एक प्रकार का यज्ञ है , क्योंकि संयमित गृहस्थ उच्चतर दिव्य जीवन के लिए अपनी इन्द्रियतृप्ति की प्रवृत्ति की आहुति कर देता है ।

सर्वाणीन्द्रियकर्माणि  प्राणकर्माणि  चापरे ।

         आत्मसंयमयोगानो   जुह्वति     ज्ञानदीपिते ॥ २७ ॥

सर्वाणि   –   सारी   ;    इन्द्रिय    –   इन्द्रियों के   ;    कर्माणि   –   कर्म   ;   प्राण-कर्माणि   –  प्राणवायु के कार्यों को   ;     च   –   भी    ;    अपरे   –   अन्य  ;   आत्म-संयम    –     मनोनिग्रह को ;    योग   –    संयोजन विधि    ;   अग्नो   –   अग्नि में   ;   जुह्वति    –    अर्पित करते हैं    ;    ज्ञान-दीपिते       –      आत्म-साक्षात्कार की लालसा के कारण

दूसरे , जो मन तथा इन्द्रियों को वश में करके आत्म – साक्षात्कार करना चाहते हैं , सम्पूर्ण इन्द्रियों तथा प्राणवायु के कार्यों को संयमित मन रूपी अग्नि में आहुति कर देते हैं ।

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   तात्पर्य :- यहाँ पर पतञ्जलि द्वारा सूत्रबद्ध योगपद्धति का निर्देश है । पतंजलि कृत योगसूत्र में आत्मा को प्रत्यगात्मा तथा परागात्मा कहा गया है । जब तक जीवात्मा इन्द्रियभोग में आसक्त रहता है तब तक वह परागात्मा कहलाता है और ज्योंही वह इन्द्रियभोग से विरत हो जाता है तो प्रत्यगात्माकहलाने लगता है । 

जीवात्मा के शरीर में दस प्रकार के वायु कार्यशील रहते हैं और इसे श्वासप्रक्रिया ( प्राणायाम ) द्वारा जाना जाता है । पतंजलि की योगपद्धति बताती है कि किस तरह शरीर के वायु के कार्यों को तकनीकी उपाय से नियन्त्रित किया जाए जिससे अन्ततः वायु के सभी आन्तरिक कार्य आत्मा को भौतिक आसक्ति से शुद्ध करने में सहायक वन जाएँ । 

इस योगपद्धति के अनुसार प्रत्यगात्मा ही चरम उद्देश्य है । यह प्रत्यगात्मापदार्थ की क्रियाओं से प्राप्त की जाती है । इन्द्रियाँ इन्द्रियविषयों से प्रतिक्रिया करती हैं , यथा कान सुनने के लिए , आँख देखने के लिए , नाक सूँघने के लिए , जीभ स्वाद के लिए तथा हाथ स्पर्श के लिए हैं , ओर ये सब इन्द्रियाँ मिलकर आत्मा से बाहर के कार्यों में लगी रहती हैं । 

ये ही कार्य प्राणवायु के व्यापार ( क्रियाएँ ) हैं । अपान वायु नीचे की ओर जाती है , व्यान वायु से संकोच तथा प्रसार होता है , समान वायु से संतुलन बना रहता है और उदान वायु ऊपर की ओर जाती है और जब मनुष्य प्रबुद्ध हो जाता है तो वह इन सभी वायुओं को आत्म साक्षात्कार की खोज में लगाता है ।

द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा          योगयज्ञास्तथापरे ।

         स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च    यतयः    संशितव्रताः ॥ २८ ॥

द्रव्य-यज्ञाः    –   अपनी सम्पत्ति का यज्ञ   ;   तपः-यज्ञाः   –   तपों का यज्ञ     ;   योग-यज्ञाः  –   अष्टांग योग में यज्ञ    ;    तथा    –  इस प्रकार   ;   अपरे   –   अन्य    ;   स्वाध्याय    –   वेदाध्ययन रूपी यज्ञ  ;      ज्ञान-यज्ञाः     –     दिव्य ज्ञान की प्रगति हेतु यज्ञ    ;   च  –  भी   ;     यतयः    –    प्रयुद्ध पुरुष   ;    संशित-व्रताः   –    दृढ व्रतधारी

कठोर व्रत अंगीकार करके कुछ लोग अपनी सम्पत्ति का त्याग करके , कुछ कठिन तपस्या द्वारा , कुछ अष्टांग योगपद्धति के अभ्यास द्वारा अथवा दिव्यज्ञान में उन्नति  करने के लिए वेदों के अध्ययन द्वारा प्रबुद्ध बनते हैं ।

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   तात्पर्य : – इन यज्ञों के कई वर्ग किये जा सकते हैं । बहुत से लोग विविध प्रकार के दान पुण्य द्वारा अपनी सम्पत्ति का यजन करते हैं । भारत में धनाढ्य व्यापारी या राजवंशी अनेक प्रकार की धर्मार्थ संस्थाएं खोल देते हैं – यथा धर्मशाला , अन्न क्षेत्र , अतिथिशाला , अनाथालय तथा विद्यापीठ  अन्य देशों में भी अनेक अस्पताल , बूढ़ों के लिए आश्रम तथा गरीबों को भोजन , शिक्षा तथा चिकित्सा की सुविधाएँ प्रदान करने के दातव्य संस्थान है । 

ये सब दानकर्म द्रव्यमय यज्ञ हैं । अन्य लोग जीवन में उन्नति करने अथवा उच्चलोकों में जाने के लिए चान्द्रायण तथा चातुर्मास्य जैसे विविध तप करते हैं । इन विधियों के अन्तर्गत कतिपय कठोर नियमों के अधीन कठिन व्रत करने होते हैं ।

उदाहरणार्थ , चातुमास्य व्रत रखने वाला वर्ष के चार मासों में ( जुलाई से अक्टूबर तक ) बाल नहीं कटाता , न ही कतिपय खाद्य वस्तुएँ खाता है और न दिन में दो बार खाता है , न निवास स्थान छोड़कर कहीं जाता है । जीवन के सुखों का ऐसा परित्याग तपोमय यज्ञ कहलाता है ।

कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अनेक योगपद्धतियों का अनुसरण करते हैं यथा पतंजलि पद्धति ( ब्रहा में तदाकार होने के लिए ) अथवा हठयोग या अष्टांगयोग ( विशेष सिद्धियों के लिए ) । कुछ लोग समस्त तीर्थस्थानों की यात्रा करते हैं । 

ये सारे अनुष्ठान योग यज्ञ कहलाते हैं , जो भौतिक जगत् में किसी सिद्धि विशेष के लिए किये जाते हैं । कुछ लोग ऐसे हैं जो विभिन्न वैदिक साहित्य यथा उपनिषद् तथा वेदान्तसूत्र या सांख्यदर्शन के अध्ययन में अपना ध्यान लगाते हैं । इसे स्वाध्याय यज्ञ कहा जाता है । 

ये सारे योगी विभिन्न प्रकार के यज्ञों में लगे रहते हैं और उच्चजीवन की तलाश में रहते हैं । किन्तु कृष्णभावनामृत इनसे पृथक है क्योंकि यह परमेश्वर की प्रत्यक्ष सेवा है । इसे उपर्युक्त किसी भी यज्ञ से प्राप्त नहीं किया जा सकता , अपितु भगवान् तथा उनके प्रामाणिक भक्तों की कृपा से ही प्राप्त किया जा सकता है । फलतः कृष्णभावनामृत दिव्य है ।

 अपाने   जुह्वति   प्राणं    प्राणेऽपान  तथापरे ।

 प्राणापानगती   रुद्धवा  प्राणायामपरायणाः ।

          अपरे   नियताहाराः   प्राणान्प्राणेषु    जुह्वति ॥ २ ९ ॥

 अपाने    –    निम्नगामी वायु में    ;    जुह्वति    –    अर्पित करते हैं    ;    प्राणम्   –    प्राण को   ;   प्राणे    –    प्राण में    ;   अपानम्   –   निम्नगामी वायु को     ;      तथा   –   ऐसे ही    ;   अपरे  –   अन्य    ;    प्राण   –    प्राण का   ;    अपान    –    निम्नगामी वायु   ;    गती   –   गति को  ;   रुद्धवा   –    रोककर   ;    प्राण-आयाम    –   श्वास रोक करसमाधि में      ;    परायणाः    –   प्रवृत्त    ;   अपरे   –   अन्य   ;   नियत   –   संयमित , अल्प  ;   आहारा:   –   खाकर   ;    प्राणान्   –   प्राणों को  ;     प्राणेषु    –    प्राणों में   ;    जुह्वति    –    हवन करते हैं , अर्पित करते हैं

अन्य लोग भी हैं जो समाधि में रहने के लिए श्वास को रोके रहते हैं ( प्राणायाम ) | वे अपान में प्राण को और प्राण में अपान को रोकने का अभ्यास करते हैं और अन्त में प्राण- अपान को रोककर समाधि में रहते हैं । अन्य योगी कम भोजन करके प्राण की प्राण में ही आहुति देते हैं ।

भगवद गीता अध्याय 4.4, भगवद गीता अध्याय 4.4, भगवद गीता अध्याय 4.4

    तात्पर्य :- श्वास को रोकने की योगविधि प्राणायाम कहलाती है । प्रारम्भ में हठयोग के विविध आसनों की सहायता से इसका अभ्यास किया जाता है । ये सारी विधियाँ इन्द्रियों को वश में करने तथा आत्म – साक्षात्कार की प्रगति के लिए संस्तुत की जाती है । 

इस विधि में शरीर के भीतर वायु को रोका जाता है जिससे वायु की गति की दिशा उत्तर सके । अपान वायु निम्नगामी ( अधोमुखी ) हैं और प्राणवायु ऊर्ध्वगामी है । प्राणायाम में योगी विपरीत दिशा में वास लेने का तब तक अभ्यास करता है जब तक दोनों वायु उदासीन होकर पूरक अर्थात् सम नहीं हो जातीं । 

जब अपान वायु को प्राणवायु में अर्पित कर दिया जाता है तो इसे रेचक कहते हैं । जब प्राण तथा अपान वायुओं को पूर्णतया रोक दिया जाता है तो इसे कुम्भक योग कहते हैं । कुम्भक योगाभ्यास द्वारा मनुष्य आत्म सिद्धि के लिए जीवन अवधि बढ़ा सकता है । 

बुद्धिमान योगी एक ही जीवनकाल में सिद्धि प्राप्त करने का इच्छुक रहता है , वह दूसरे जीवन की प्रतीक्षा नहीं करता । कुम्भक योग के अभ्यास से योगी जीवन अवधि को अनेक वर्षों के लिए बढ़ा सकता है । 

किन्तु भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति में स्थित रहने के कारण कृष्णभावनाभावित मनुष्य स्वतः इन्द्रियों का नियंता ( जितेन्द्रिय ) बन जाता है । उसकी इन्द्रियाँ कृष्ण की सेवा में तत्पर रहने के कारण अन्य किसी कार्य में प्रवृत्त होने का अवसर ही नहीं पातीं । 

फलतः जीवन के अन्त में उसे स्वतः भगवान् कृष्ण के दिव्य पद पर स्थानान्तरित कर दिया जाता है , अतः वह दीर्घजीवी बनने का प्रयत्न नहीं करता । वह तुरन्त मोक्ष पद को प्राप्त कर लेता है , जैसा कि भगवद्गीता में ( १४.२६ ) कहा गया है  

मां  च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते ।

स गुणान्समतीत्यैतान् ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥

 “ जो व्यक्ति भगवान् की निश्छल भक्ति में प्रवृत्त होता है वह प्रकृति के गुणों को लाँघ जाता है और तुरन्त आध्यात्मिक पद को प्राप्त होता है । ” कृष्णभावनाभावित व्यक्ति दिव्य अवस्था से प्रारम्भ करता है और निरन्तर उसी चेतना में रहता है । अतः उसका पतन नहीं होता और अन्ततः वह भगवद्धाम को जाता है । 

कृष्ण प्रसादम् को ही खाते रहने से स्वतः कम खाने की आदत पड़ जाती है । इन्द्रियनिग्रह के मामले में कम भोजन करना ( अल्पाहार ) अत्यन्त लाभप्रद होता है और इन्द्रियनिग्रह के बिना भव – बन्धन से निकल पाना सम्भव नहीं है । 

सर्वेऽप्येते    यज्ञविदो   यज्ञक्षपितकल्मषाः ।

         यज्ञशिष्टामृतभुजो  यान्ति  ब्रह्म  सनातनम् ॥ ३० ॥

 सर्वे    –    सभी    ;   अपि   –   ऊपर से भिन्न होकर भी    ;    एते  –  ये    ;    यज्ञ-विदः   –   यज्ञ करने के प्रयोजन से परिचित   ;    यज्ञ-क्षपित   –   यज्ञ करने के कारण शुद्ध हुआ    ;    कल्मषाः  – पापकमों से    ;   यज्ञ-शिष्ट     –     ऐसे यज्ञ करने के फल का   ;    अमृत-भुज:    –   ऐसा अमृत चखने वाले   ;   यान्ति   –    जाते हैं    ;     ब्रह्म   –   परम ब्रह्म  ;   सनातनम्   –   नित्य आकाश को ।

ये सभी यज्ञ करने वाले यज्ञों का अर्थ जानने के कारण पापकर्मों से मुक्त हो जाते हैं और यज्ञों के फल रूपी अमृत को चखकर परम दिव्य आकाश की ओर बढ़ते जाते हैं ।

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     तात्पर्य :-  विभिन्न प्रकार के यज्ञों ( यथा द्रव्ययज्ञ , स्वाध्याय यज्ञ तथा योगयज्ञ ) की उपर्युक्त व्याख्या से यह देखा जाता है कि इन सबका एक ही उद्देश्य है और वह है इन्द्रियों का निग्रह । इन्द्रियतृप्ति ही भौतिक अस्तित्व का मूल कारण है , अतः जब तक इन्द्रियतृप्ति से भिन्न धरातल पर स्थित न हुआ जाय तब तक सच्चिदानन्द के नित्य धरातल तक उठ पाना सम्भव नहीं है ।

 यह धरातल नित्य आकाश या ब्रह्म आकाश में है । उपर्युक्त सारे यज्ञों से संसार के पापकमों से विमल हुआ जा सकता है । जीवन में इस प्रगति से मनुष्य न केवल सुखी और ऐश्वर्यवान वनता है , अपितु अन्त में वह निराकार ब्रह्म के साथ तादात्म्य के द्वारा या श्रीभगवान् कृष्ण की संगति प्राप्त करके भगवान् के शाश्वत धाम को प्राप्त करता है । 

नाय   लोकोऽस्त्ययज्ञस्य  कुतोऽन्यः कुरुसत्तम ॥ ३१ ॥

न  –  कभी नहीं  ;   अयम्  – यह ; लोकः  – लोक  ;  अस्ति  –  है  ; अयज्ञस्य – यज्ञ न करने वाले  ;   काः कुतः  –  कहाँ है  ;  अन्य: – अन्य  ;  कुरु सत्-तम  – हे कुरुश्रेष्ठ । 

हे कुरुश्रेष्ठ  ! जब यज्ञ के बिना मनुष्य इस लोक में या इस जीवन में ही सुखपूर्वक नहीं रह सकता , तो फिर अगले जन्म में कैसे रह सकेगा ?

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   तात्पर्य : –  मनुष्य इस लोक में चाहे जिस रूप में रहे वह अपने स्वरूप से अनभिज्ञ रहता है । दूसरे शब्दों में , भौतिक जगत् में हमारा अस्तित्व हमारे पापपूर्ण जीवन के बहुगुणित फलों के कारण है । अज्ञान ही पापपूर्ण जीवन का कारण है और पापपूर्ण जीवन ही इस भातिक जगत् में अस्तित्व का कारण है । 

मनुष्य जीवन ही वह द्वार है जिससे होकर इस वन्धन से बाहर निकला जा सकता है । अतः वेद हमें धर्म , अर्थ , काम तथा मोक्ष का मार्ग दिखलाकर बाहर निकलने का अवसर प्रदान करते हैं । धर्म या ऊपर संस्तुत अनेक प्रकार के यज्ञ हमारी आर्थिक समस्याओं को स्वतः हल कर देते हैं । 

जनसंख्या में वृद्धि होने पर भी यज्ञ सम्पन्न करने से हमें प्रचुर भोजन , प्रचुर दूध इत्यादि मिलता रहता है । जब शरीर की आवश्यकता पूर्ण होती रहती है , तो इन्द्रियों को तुष्ट करने की बारी आती है । अतः वेदों में नियमित इन्द्रियतृप्ति के लिए पवित्र विवाह का विधान है । 

इस प्रकार मनुष्य भौतिक बन्धन से क्रमशः छूटकर उच्चपद की ओर अग्रसर होता है और मुक्त जीवन की पूर्णता परमेश्वर का सान्निध्य प्राप्त करने में है । यह पूर्णता यज्ञ सम्पन्न करके प्राप्त की जाती है , जैसा कि पहले बताया जा चुका है ।  फिर भी यदि कोई व्यक्ति वेदों के अनुसार यज्ञ करने के लिए तत्पर नहीं होता , तो वह इस शरीर में सुखी जीवन की कैसे आशा कर सकता है ?

फिर दूसरे लोक में दूसरे शरीर से सुखी जीवन की आशा तो व्यर्थ ही है । विभिन्न स्वर्गों में भिन्न – भिन्न प्रकार की जीवन – सुविधाएँ हैं और जो लोग यज्ञ करने में लगे हैं उनके लिए तो सर्वत्र परम सुख मिलता है ।  किन्तु सर्वश्रेष्ठ सुख वह है जिसे मनुष्य कृष्णभावनामृत के अभ्यास द्वारा वैकुण्ठ जाकर प्राप्त करता है । अतः कृष्णभावनाभावित जीवन ही इस भौतिक जगत की समस्त समस्याओं का हल है

एवं   बहुविधा   यज्ञा   वितता   ब्रह्मणो    मुखे ।

          कर्मजान्विद्धि  तान्सर्वानेवं  ज्ञात्वा  विमोक्ष्यसे ॥ ३२ ॥

एवम्    –    इस प्रकार    ;     बहु-विधाः   –    विविध प्रकार के    ;  यज्ञाः  –   यज्ञ   ;   वितताः  – फैले हुए हैं     ;     ब्रह्मणः  –    वेदों के    ;    मुखे   –   मुख में   ;   कर्म-जान्   –   कर्म से उत्पन्न   ; विद्धि   –   जानो   ;   तान्   –   उन    ;   सर्वान्   –   सवको   ;   एवम्   –   इस तरह  ;     ज्ञात्वा   –   जानकर    ;    विमोक्ष्यसे    –   मुक्त हो जाओगे । 

 ये विभिन्न प्रकार के यज्ञ वेदसम्मत हैं और ये सभी विभिन्न प्रकार के कर्मों से उत्पन्न हैं । इन्हें इस रूप में जानने पर तुम मुक्त हो जाओगे ।

भगवद गीता अध्याय 4.4, भगवद गीता अध्याय 4.4, भगवद गीता अध्याय 4.4

    तात्पर्य : –  जैसा कि पहले बताया जा चुका है वेदों में कर्ताभेद के अनुसार विभिन्न प्रकार के यज्ञों का उल्लेख है । चूँकि लोग देहात्मबुद्धि में लीन हैं , अतः इन यज्ञों की व्यवस्था इस प्रकार की गई है कि मनुष्य उन्हें अपने शरीर , मन अथवा बुद्धि के अनुसार सम्पन्न कर सके । किन्तु देह से मुक्त होने के लिए ही इन सबका विधान है । इसी की पुष्टि यहाँ पर भगवान् ने अपने श्रीमुख से की है । 

श्रेयान्द्रव्यमयाद्    यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः       परन्तप  ।

          सर्वं    कर्माखिलं   पार्थ    ज्ञाने    परिसमाप्यते ॥ ३३ ॥ 

श्रेयान्   –    श्रेष्ठ   ;     द्रव्य-मयात्    –   सम्पत्ति के   ;    यज्ञात्   –   यज्ञ से    ;    ज्ञान-यज्ञः    –ज्ञानयज्ञः   ;    परन्तप   –    हे शत्रुओं को दण्डित करने वाले    ;   सर्वम्   –   सभी   ;    कर्म  –  कर्म ;      अखिलम्     –   पूर्णतः    ;   पार्थ   –   हे पृथापुत्र   ;   ज्ञाने  –  ज्ञान में   ;    परिसमाप्यते   –  समाप्त होते हैं

 हे परंतप ! द्रव्ययज्ञ से ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है । हे पार्थ ! अन्ततोगत्वा सारे कर्मयज्ञों का अवसान दिव्य ज्ञान में होता है । 

भगवद गीता अध्याय 4.4, भगवद गीता अध्याय 4.4, भगवद गीता अध्याय 4.4

   तात्पर्य : –  समस्त यज्ञों का यही एक प्रयोजन है कि जीव को पूर्णज्ञान प्राप्त हो जिससे वह भौतिक कष्टों से छुटकारा पाकर अन्त में परमेश्वर की दिव्य सेवा कर सके । तो भी इन सारे यज्ञों की विविध क्रियाओं में रहस्य भरा है और मनुष्य को यह रहस्य जान लेना चाहिए । 

कभी – कभी कर्ता की श्रद्धा के अनुसार यज्ञ विभिन्न रूप धारण कर लेते हैं । जब यज्ञकर्ता की श्रद्धा दिव्यज्ञान के स्तर तक पहुँच जाती है तो उसे ज्ञानरहित द्रव्ययज्ञ करने वाले से श्रेष्ठ माना जाता है क्योंकि ज्ञान के बिना यज्ञ भौतिक स्तर पर रह जाते हैं और इनसे कोई आध्यात्मिक लाभ नहीं हो पाता । 

यथार्थ ज्ञान का अंत कृष्णभावनामृत में होता है जो दिव्यज्ञान की सर्वोच्च अवस्था है । ज्ञान की उन्नति के विना यज्ञ मात्र भौतिक कर्म बना रहता है । किन्तु जब उसे दिव्यज्ञान के स्तर तक पहुँचा दिया जाता है तो ऐसे सारे कर्म आध्यात्मिक स्तर प्राप्त कर लेते हैं ।

भगवद गीता अध्याय 4.4, भगवद गीता अध्याय 4.4, भगवद गीता अध्याय 4.4

चेतनाभेद के अनुसार ऐसे यज्ञकर्म कभी – कभी कर्मकाण्ड कहलाते हैं और कभी ज्ञानकाण्ड । यज्ञ वही श्रेष्ठ है , जिसका अन्त ज्ञान में हो

भगवद गीता अध्याय 4.4 ~ फलसहित विभिन्न यज्ञों का वर्णन / Powerful Bhagavad Gita yagyon ka barnan Ch4.4
भगवद गीता अध्याय 4.4 ~ फलसहित विभिन्न यज्ञों का वर्णन

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