भगवद गीता अध्याय 2.4~कर्मयोग का उपदेश

अध्याय दो  (Chapter -2)

भगवद गीता अध्याय 2.4 ~ कर्मयोग का उपदेश में शलोक 39 से शलोक  53  तक कर्मयोग के उपदेश का वर्णन किया गया है !

एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धियोगे विमां शण । 

बुया  युक्तो  यया  पार्थ  कर्मबन्ध  प्रहास्यसि ॥ ३९ ॥

एषा – यह सब  ;  ते – तेरे लिए  ;  अभिहिता – वर्णन किया गया  ;  सांख्ये   –  वैश्लेषिक अध्ययन द्वारा ;  योगे – निष्काम कर्म में  ; तु – लेकिन  ; इमाम् – इसे  ; बुद्धया – वृद्धि से  ; यया – जिससे  ;  पार्थ  – हे पृथापुत्र  ;  कर्म-वन्धन – कर्म के वन्धन से  ;   प्रहास्यसि  – मुक्त हो जाओगे

यहां मैने वैश्लेषिक अध्ययन ( सांख्य ) द्वारा इस ज्ञान का वर्णन किया है । अब निष्काम भाव से कर्म करना बता रहा हूँ , उसे सुनो । हे पृथापुत्र ! तुम यदि ऐसे ज्ञान से कर्म करोगे तो तुम कर्मों के बन्धन से अपने को मुक्त कर सकते हो ।   

तात्पर्य : वैदिक कोश निरुक्ति के अनुसार सांख्य का अर्थ है – विस्तार से वस्तुओं का वर्णन करने वाला तथा साख्य उस दर्शन के लिए प्रयुक्त मिलता है जो आत्मा की वास्तविक प्रकृति का वर्णन करता है । और योग का अर्थ है – इन्द्रियों का निग्रह ।  अर्जुन का युद्ध करने का प्रस्ताव इन्द्रियतृप्ति पर आधारित था ।

वह अपने प्रधान कर्तव्य को भुलाकर युद्ध से दूर रहना चाहता था क्योंकि उसने यह सोचा कि धृतराष्ट्र के पुत्रों अर्थात अपने बन्धु – यान्धवों को परास्त करके राज्यभोग करने की अपेक्षा अपने सम्बन्धियों तथा स्वजनों को न मारकर वह अधिक सुखी रहेगा ।   दोनों ही प्रकार से मूल सिद्धान्त तो इन्द्रियतृप्ति था । उन्हें जीतने से प्राप्त होने वाला सुख तथा स्वजनों को जीवित देखने का सुख ये दोनो इन्द्रियतृप्ति के धरातल पर एक है , क्योंकि इससे बुद्धि तथा कर्तव्य दोनो का अन्त होजाता है । 

अतः कृष्ण ने अर्जुन को बताना चाहा कि वह अपने पितामह के शरीर का बध करके उनकी आत्मा को नहीं मारेगा ।   उन्होंने यह बताया कि उनके सहित सारे जाद शाश्वत प्राणी हैं , वे भूतकाल में प्राणी थे , वर्तमान में भी प्राणी रूप में हैं और भविष्य में भी प्राणी बने रहेंगे क्योंकि हम सब शाश्वत आत्मा है । हम विभिन्न प्रकार से केवल अपना शारीरिक परिधान ( वस्त्र बदलते रहते हैं) और इस भौतिक वस्त्र के बन्धन से मुक्ति के बाद भी हमारी पृथक सत्ता बनी रहती है ।  

भगवान कृष्ण द्वारा आत्मा तथा का अत्यन्त विशद वैश्लेषिक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है और निरुक्ति कोश की शब्दावली में इस विशद् अध्ययन को यहाँ सांख्य कहा गया है । इस सांख्य का नास्तिक – कपिल के सांख्य – दर्शन से कोई सरोकार नहीं है ।  इस नास्तिक – कपिल के सांख्य दर्शन से बहुत पहले भगवान कृष्ण के अवतार भगवान् कपिल ने अपनी माता देवहूतिके समक्ष श्रीमदभागवत में वास्तविक सांख्य – दर्शन पर प्रवचन किया था ।  

उन्होंने स्पष्ट बताया है कि पुरुष या परमेश्वर क्रियाशील हैं और ये प्रकृति पर दृष्टिपात करके सृष्टि की उत्पत्ति करते हैं । इसको वेदों ने तथा गीता ने स्वीकार किया है ।  वेदों में वर्णन मिलता है कि भगवान् ने प्रकृति पर दृष्टिपात किया और उसमें आणविक जीवात्माएँ प्रविष्ट कर दी । ये सारे जीव भौतिक – जगत् में इन्द्रियतृप्ति के लिए कर्म करते रहते हैं । और माया के वशीभूत होकर अपने को भोक्ता मानते रहते हैं ।  

इस मानसिकता की चरम सीमा भगवान् के साथ सायुज्य प्राप्त करना है । यह माया अथवा इन्द्रियतृप्तिजन्य मोह का अन्तिम पाश है और अनेकानेक जन्मों तक इस तरह इन्द्रियतृप्ति करते हुए कोई महात्मा भगवान् कृष्ण यानी वासुदेव की शरण में जाता है जिससे परमसत्य की खोज पूरी होती है । 

अर्जुन ने कृष्ण की शरण ग्रहण करके पहले ही उन्हें गुरु रूप में स्वीकार कर लिया है – शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपत्रम् । फलस्वरूप कृष्ण अब उसे बुद्धियोग या कर्मयोग की कार्यविधि वताएँगे जो कृष्ण की इन्द्रियतृप्ति के लिए किया गया भक्तियोग है ।   यह बुद्धियोग अध्याय दस के दसवें श्लोक में वर्णित है जिसमें इसे उन भगवान् के साथ प्रत्यक्ष सम्पर्क बताया गया है जो सबके हृदय में परमात्मा रूप में विद्यमान है , किन्तु ऐसा सम्पर्क भक्ति के विना सम्भव नहीं है । 

अतः जो भगवान की भक्ति या दिव्य प्रेमाभक्ति में या कृष्णभावनामृत में स्थित होता है , वही भगवान् की विशिष्ट कृपा से बुद्धियोग को यह अवस्था प्राप्त कर पाता है ।   अतः भगवान कहते है कि जो लोग दिव्य प्रेमवश भक्ति में निरन्तर लगे रहते हैं उन्हें ही वे भक्ति का विशुद्ध ज्ञान प्रदान करते हैं । इस प्रकार भक्त सरलता से उनके चिदानन्दमय धाम में पहुँच सकते हैं ।

इस प्रकार इस श्लोक में वर्णित बुद्धियांग भगवान कृष्ण की भक्ति है और यहाँ पर उल्लिखित सांख्य शब्द का नास्तिक – कपिल द्वारा प्रतिपादित अनीश्वरवादी सांख्य – योग से कुछ भी सम्बन्ध नहीं है । अतः किसी को यह भ्रम नहीं होना चाहिए कि यहाँ पर उल्लिखित सांख्य – योग का अनीश्वरवादी सांख्य से किसी प्रकार का सम्बन्ध है ।  

न ही उस समय उसके दर्शन का कोई प्रभाव था , और न कृष्ण ने ऐसी ईश्वरविहीन दार्शनिक कल्पना का उल्लेख करने की चिन्ता को वास्तविक सांख्य – दर्शन का वर्णन भगवान् कपिल द्वारा श्रीमद्भागवत में हुआ है , किन्तु वर्तमान प्रकरणों में उस सांख्य से भी कोई सरोकार नहीं है ।   यहाँ सांख्य का अर्थ है शरीर तथा आत्मा का वैश्लेषिक अध्ययन ।

भगवान कृष्ण ने आत्मा का वैश्लेषिक वर्णन अर्जुन को बुद्धियोग या कर्मयोग तक लाने के लिए किया । अत : भगवान् कृष्ण का सांख्य तथा भागवत में भगवान् कपिल द्वारा वर्णित सांख्य एक ही हैं । ये दोनों भक्तियोग हैं ।  अतः भगवान् कृष्ण ने कहा है कि केवल अल्पज्ञ ही सांख्य योग तथा भक्तियोग में भेदभाव मानते हैं ( सांख्ययोगी पृथग्बाला प्रवदन्ति न पण्डिता ) ।  

निस्सन्देह अनीश्वरवादी सांख्य – योग का भक्तियोग से कोई सम्बन्ध नहीं है फिर भी बुद्धिहीन व्यक्तियों का दावा है कि भगवद्गीता में अनीश्वरवादी सांख्य का ही वर्णन हुआ अतः मनुष्य को यह जान लेना चाहिए कि बुद्धियोग का अर्थ कृष्णभावनामृत पूर्ण आनन्द तथा भक्ति के ज्ञान में कर्म करना है ।  जो व्यक्ति भगवान की तुष्टि के लिए कर्म करता है , चाहे वह कर्म कितना भी कठिन क्यों न हो , वह वृद्धियोग के सिद्धान्त के अनुसार कार्य करता है और दिव्य आनन्द का अनुभव करता है ।  

ऐसी दिव्य व्यस्तता के कारण उसे भगवत्कृपास स्वतः सम्पुर्ण दिव्य ज्ञान प्राप्त हो जाता है और ज्ञान प्राप्त करने के लिए अतिरिक्त श्रम किये बिना ही उसकी पूर्ण मुक्ति हो जाती है ।  कृष्णभावनाभावित कर्म तथा फल प्राप्ति की इच्छा से किये गये कर्म में , विशेषतया पारिवारिक या भौतिक सुख प्राप्त करने की इन्द्रियतृप्ति के लिए किये गये कर्म में , प्रचुर अन्तर होता है । अतः बुद्धियोग हमारे द्वारा सम्पन्न कार्य का दिव्य गुण है ।  

नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति   प्रत्यवायो  न विद्यते ।

          स्वल्पमप्यस्य   धर्मस्य  त्रायते  महतो भयात् ॥ ४० ॥

– नहीं ; इह – इस योग में   ;  अभिक्रम – प्रयत्न करने में   ;  नाश: – हानि  ;   अस्ति  –  है  ;  प्रत्यवायः – हास   ;   न – कभी नहीं   ;   विद्यते – है  ;    सु-अल्पम् –  थोड़ा   ;   अपि – वद्यपि  ;   अस्य – इस   ;  धर्मस्य  –  धर्म का   ;  त्रायते  –  मुक्त करता है   ;   महतः – महान  ; भवात् – भय से |     

इस प्रयास में न तो हानि होती है न ही ह्रास अपितु इस पथ पर की गई अल्प प्रगति भी महान भय से रक्षा कर सकती है ।

    तात्पर्य : कर्म का सर्वोच्च दिव्य गुण है , कृष्णभावनामृत में कर्म या इन्द्रियतृप्ति की आशा न करके कृष्ण के हित में कर्म करना । ऐसे कर्म का लघु आरम्भ होने पर भी कोई वाधा नहीं आती है , न कभी इस आरम्भ का विनाश होता है ।  भौतिक स्तर पर प्रारम्भ किये जाने वाले किसी भी कार्य को पूरा करना होता है अन्यथा सारा प्रयास निष्फल हो जाता है । 

किन्तु कृष्णभावनामृत में प्रारम्भ किया जाने वाला कोई भी कार्य अधूरा रह कर भी स्थायी प्रभाव डालता है । अतः ऐसे कर्म करने वाले को कोई हानि नहीं होती , चाहे यह कर्म अधूरा ही क्यों न रह जाये ।  

यदि कृष्णभावनामृत का एक प्रतिशत भी कार्य पूरा हुआ हो तो उसका स्थायी फल होता है , अतः अगली बार दो प्रतिशत से शुभारम्भ होगा , किन्तु भौतिक कर्म में जब तक शत प्रतिशत सफलता प्राप्त न हो तब तक कोई लाभ नहीं होता ।  अजामिल ने कृष्णभावनामृत में अपने कर्तव्य का कुछ ही प्रतिशत पुरा किया था , किन्तु भगवान की कृपा से उसे शत प्रतिशत लाभ मिला ।

इस सम्बन्ध में श्रीमद्भागवत में ( १ . ५ . १७ ) एक अत्यन्त सुन्दर श्लोक आया है – –    

त्यक्चा  स्वधर्म  चरणाम्बुर्ज  हरेभजनपकोऽथ  पतेततां  यदि ।

यत्र  क  बाभद्रमभूदमुष्य  को  वार्थ  आप्तांउभजतां  स्वधर्मतः ।।  

 ” यदि कोई अपना धर्म छोड़कर कृष्णभावनामृत में काम करता है और फिर काम पूरा न होने के कारण नीचे गिर जाता है तो इसमें उसको क्या हानि?  और यदि कोई अपने भौतिक कार्यों को पूरा करता है तो इससे उसको क्या लाभ होगा ? अथवा जैसा कि ईसाई कहते हैं “  यदि कोई अपनी शाश्वत आत्मा को खोकर सम्पूर्ण जगत् को पा ले तो मनुष्य को इससे क्या लाभ होगा ?

”   भौतिक कार्य तथा उनके फल शरीर के साथ ही समाप्त हो जाते हैं , किन्तुकृष्णभावनामृत में किया गया कार्य मनुष्य को इस शरीर के विनष्ट होने पर भी पुनः कृष्णभावनामृत तक ले जाता है । कम से कम इतना तो निश्चित है कि अगले जन्म में उसे सुसंस्कृत बाह्मण परिवार में या धनीमानी कुल में मनुष्य का शरीर प्राप्त हो सकेगा जिससे उसे भविष्य में ऊपर उठने का अवसर प्राप्त हो सकेगा ।कृष्णभावनामृत में सम्पन्न कार्य का यही अनुपम गुण है ।  

व्यवसायात्मिका     बुद्धिरेकेह       कुरुनन्दन ।

         बहुशाखा   ह्यनन्ताश्च  बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ॥ ४१ ॥

व्यवसाय-आत्मिका – कृष्णभावनामृत में स्थिर   ;  वृद्धिः – बुद्धि   ; एका – एकमात्र    ;  इह – इस संसार में    ;  कुरू-नन्दन   –  कुरुक्क प्रिय पुत्र    ;  बहु – शाखा:  – अनेक शाखाओं में विभक्त   ;   हि  –  निस्सन्देह   ;  अनन्ताः – असीम  ; – भी   ;   बुद्धयः – बुद्धि  ;  अव्यवसायिनाम् – जो कृष्णभावनामृत में नहीं उनकी ।      

जो इस मार्ग पर ( चलते ) है वे प्रयोजन में दृढ़ रहते हैं और उनका लक्ष्य भी एक होता है । हे कुरुनन्दन ! जो दृढप्रतिज्ञ नहीं हैं उनकी बुद्धि अनेक शाखाओं में विभक्त रहती है ।

     तात्पर्य : यह दृढ श्रद्धा कि कृष्णभावनामृत द्वारा मनुष्य जीवन की सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त कर सकेगा , व्यवसायामिका युब्दि कहलाती है ।

चैतन्य – चरितामृत में ( मध्य २२ . ६२ ) कहा गया है  

‘ श्रद्धा ‘ – शब्दे – विश्वास कहे सुदृढ निक्षय ।   

कृष्ण  भक्ति    कैले   सर्वकर्म   कृत   हय । ।  

” श्रद्धा का अर्थ है किसी अलौकिक वस्तु में अटूट विश्वास । जब कोई कृष्णभावनामृत के कार्यो में लगा होता है तो उसे परिवार , मानवता या राष्ट्रीयता से बंध कर कार्य करने की आवश्यकता नहीं होती । पूर्व में किये गये शुभ – अशुभ कर्मों के फल ही उसे सकाम कर्मों में लगाते हैं । जब कोई कृष्णभावनामृत में संलग्न हो तो उसे अपने कार्यों के शुभ फल के लिए प्रयत्नशील नहीं रहना चाहिए ।  

जव काई कृष्णभावनामृत में लीन होता है । तो उसके सारे कार्य आध्यात्मिक धरातल पर होते हैं क्योंकि उनमें अच्छे तथा वुरे का द्वैत नहीं रह जाता ।  कृष्णभावनामृत की सर्वोच्च सिद्धि देहात्मबुद्धि का त्याग है । कृष्णभावनामृत की प्रगति के साथ क्रमशः यह अवस्था स्वतः प्राप्त हो जाती है ।   कृष्णभावनाभावित व्यक्ति का दृढनिश्चय ज्ञान पर आधारित है ।

बासुदेव सर्वम इति स महात्मा सदुर्लभः –

कृष्णभावनाभावित व्यक्ति अत्यन्त दुर्लभ जीव है जो भलीभांति जानता है कि वासुदेव या कृष्ण समस्त प्रकट कारणों के मूल कारण है ।  जिस प्रकार वृक्ष की जड़ सींचने पर स्वतः ही पत्तियों तथा टहनियों में जल पहुंच जाता है उसी तरह कृष्णभावनाभावित होने पर मनुष्य प्रत्येक प्राणी की अर्थात अपनी परिवार की समाज की , मानवता की सर्वोच्य सेवा कर सकता है ।  

यदि मनुष्य के कर्मा से कृष्ण प्रसन्न हो जाएँ तो प्रत्येक व्यक्ति सन्तुष्ट होगा । किन्तु कृष्णभावनामृत में सेवा गुरु के समर्थ निर्देशन में ही ठीक से हो पाती है क्योंकि गुरु कृष्ण का प्रामाणिक प्रतिनिधि होता है जो शिष्य के स्वभाव से परिचित होता है और उसे कृष्णभावनामृत की दिशा में कार्य करने के लिए मार्ग दिखा सकता है ।  

अतः कृष्णभावनामृत में दक्ष होने के लिए मनुष्य को दृढ़ता से कर्म करना होगा और कृष्ण के प्रतिनिधि की आज्ञा का पालन करना होगा ।  उसे गुरु के उपदेशों को जीवन का लक्ष्य मान लेना होगा । श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने गुरु की प्रसिद्ध प्रार्थना में उपदेश दिया है  

यस्य प्रसादाद् भगवत्प्रसादो यस्याप्रसादान गतिः कुतोऽपि ।

ध्यायन्स्तुवस्तस्य यशस्त्रिसन्ध्यं बन्द गरोः श्रीचरणारविन्दम । ।    

” गुरु की तुष्टि से भगवान् भी प्रसन्न होते हैं । गुरु को प्रसन्न किये बिना कृष्णभावनामृत के स्तर तक पहुंच पाने की कोई सम्भावना नहीं रहती । अतः मुझे उनका चिन्तन करना चाहिए और दिन में तीन बार उनकी कृपा की याचना करनी चाहिए और अपने गुरु को सादर नमस्कार करना चाहिए । ”   किन्तु यह सम्पूर्ण पद्धति देहात्मबुद्धि से परे सैद्धान्तिक रूप में नहीं वरन् व्यावहारिक रूप में पूर्ण आत्म – ज्ञान पर निर्भर करती है , जब सकाम कर्मा से इन्द्रियतृप्ति की कोई सम्भावना नहीं रहती । जिसका मन दृढ़ नहीं है वही विभिन्न सकाम कर्मा की और आकर्षित होता है ।  

यामिमां  पुष्पितां  वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः ।

वेदवादरताः पार्थ   नान्यदस्तीति   वादिनः ॥ ४२ ॥

 
कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् ।

क्रियाविशेषबहुला     भोगैश्वर्यगति    प्रति  ॥ ४३॥

याम इमाम्  –  ये सब   ;    पुष्पिताम्  – दिखावटी   ;   वाचम्  –  शब्द    ;   प्रवदन्ति–   कहते हैं    ;  अविपश्चित:  –   अल्पक्ष व्यक्ति  ; वेद-बाद-रताः   –   वेदों के अनुयायी   ;  पार्थ   –  हे पार्थः   ;  न कभी नहीं   ;  अन्यत्  –  अन्य कुछ   ; अस्ति   –   है   ;  इति  –   इस प्रकार  ;   वादिनः  –   वोलनेवाले   ;   काम-आत्मानः   –   इन्द्रियतृप्ति के इच्छुक    ;   स्वर्ग पराः   –   स्वर्ग प्राप्ति के इछुक   ;   जन्म-कर्म-फल-प्रदाम्     –   उत्तम जन्म तथा अन्य सकाम कर्मफल प्रदान करने वाला   ;   क्रिया-विशेष   –  भड़कीले उत्सव  ;   बहुलाम्    –   विविध   ;    भोग   –   इन्द्रियतृप्ति   ;   ऐश्वर्य:  –  ऐश्वर्य   ;    गतिम्   –   प्रगति    ;   प्रति  –  को ओर

अल्पज्ञानी मनुष्य वेदों के उन अलंकारिक शब्दों के प्रति अत्यधिक आसक्त रहते हैं , जो स्वर्ग की प्राप्ति , अच्छे जन्म , शक्ति इत्यादि के लिए विविध सकाम कर्म करने की संस्तुति करते हैं । इन्द्रियतृप्ति तथा ऐश्वर्यमय जीवन की अभिलाषा के कारण वे कहते हैं कि इससे बढ़कर और कुछ नहीं हैं ।   

तात्पर्य : साधारणतः सब लोग अत्यन्त बुद्धिमान नहीं होते और वे अज्ञान के कारण वेदों के कर्मकाण्ड भाग में बताये गये सकाम कर्मों के प्रति अत्यधिक आसक्त रहते हैं । वे स्वर्ग में जीवन का आनन्द उठाने के लिए इन्द्रियतृप्ति कराने वाले प्रस्तावों से अधिक और कुछ नहीं चाहते जहाँ मदिरा तथा तरुणियाँ उपलब्ध है और भौतिक ऐश्वर्य सर्वसामान्य है । 

वेदों में स्वर्गलोक पहुँचने के लिए अनेक यज्ञों की संस्तुति है जिनमें ज्योतिष्टोम यज्ञ प्रमुख है। वास्तव में वेदों में कहा गया है कि जो स्वर्ग जाना चाहता है । उस ये यज्ञ सम्पन्न करने चाहिए आर अल्पज्ञानी पुरुष सोचत है कि वैदिक ज्ञान का सारा अभिप्राय इतना ही है ।   ऐसे लोगों के लिए कृष्णभावनामृत के दृढ कर्म में स्थित हो पाना अत्यन्त कठिन है ।

जिस प्रकार मूर्ख लोग विषैले वृक्षों के फूलों के प्रति बिना यह जाने कि इस आकर्षण का फल क्या होगा आसक्त रहते हैं उसी प्रकार अज्ञानी व्यक्ति स्वर्गिक ऐश्वर्य तथा तज्जनित इन्द्रियभोग के प्रति आकृष्ट रहते हैं ।   वेदों के कर्मकाण्ड भाग में कहा गया है – अपाम सोममृता अभूम तथा अक्षय्यं हवे चातर्मास्ययाजिनः सकतं भवति । दूसरे शब्दों में , जो लोग चातुर्मास तप करते हैं वे अमर तथा सदा सुखी रहने के लिए सोम – रस पीने के अधिकारी हो जाते हैं । 

यहाँ तक कि इस पृथ्वी में भी कुछ लोग सोम – रस के लिए अत्यन्त इच्छुक रहते हैं जिससे वे बलवान बनें और इन्द्रियतृप्ति का सुख पाने में समर्थ हों । ऐसे लोगों को भवबन्धन से मुक्ति में कोई श्रद्धा नहीं होती और बे वैदिक यज्ञों की तड़क – भड़क में विशेष आसक्त रहते हैं । वे सामान्यतया विषयी होते है और जीवन में स्वर्गिक आनन्द के अतिरिक्त और कार नहीं चाहते । 

कहा जाता है कि स्वर्ग में नन्दन – कानन नामक अनेक उद्यान हैं जिनमें दैवी सुन्दरी स्त्रियों का संग तथा प्रचुर मात्रा में सोम – रस उपलब्ध रहता है । ऐसा शारीरिक सुख निस्सन्देह विषयी है , अतः ये लोग वे है जो भौतिक जगत् के स्वामी बन कर ऐसे भौतिक अस्थायी सुख के प्रति आसक्त हैं ।  

भोगैश्वर्यप्रसक्तानां              तयापहतचेतसाम् ।

           व्यवसायात्मिका  बुद्धिः  समाधौ  न  विधीयते  ॥ ४४ ॥

भोग   –   भौतिक भोग   ; ऐश्वर्य-तथा   –   ऐश्वर्य के प्रति   ;   प्रसक्तानाम   –  आसक्तों के लिए   ; तया   –   ऐसी वस्तुओं से   ;  अपहृत-चेतसाम्   –   मोहपसित चित्त वाले    ;  व्यवसाय-आत्मिका:   – दृढ निश्चय वाली  ; बुद्धिः   –  भगवान की भक्ति  ;   समाधौ   –   नियन्त्रित मन में   ;     –  कभी नहीं   ;  विधीयते   –  घटित होती है ।

      जो लोग इन्द्रियभोग तथा भौतिक ऐश्वर्य के प्रति अत्यधिक आसक्त होने से ऐसी वस्तुओं से मोहग्रस्त हो जाते हैं , उनके मनों में भगवान के प्रति भक्ति का बढ़ निश्चय नहीं होता । 

  तात्पर्य : समाधि का अर्थ है ” स्थिर मन । ” वैदिक शब्दकोश निरुक्ति के अनुसार – सम्यग आधीयतेऽस्मिन्त्रात्मतत्त्वयाथात्म्यम् – जब मन आत्मा को समझने में स्थिर रहता है तो उसे समाधि कहते हैं ।  जो लोग इन्द्रियभोग में रुचि रखते हैं अथवा जो ऐसी क्षणिक वस्तुओं से मोहग्रस्त है उनके लिए समाधि कभी भी सम्भव नहीं है । माया के चक्कर में पड़कर वे न्यूनाधिक पतन को प्राप्त होते हैं ।    

त्रैगुण्यविषया     वेदा     निस्वैगुण्यो    भवार्जुन ।

          निर्द्वन्द्वो  नित्यसत्त्वस्थो  निर्योगक्षेम  आत्मवान् ॥ ४५ ॥

त्रै-गुण्य  –   प्राकृतिक तीनों गुणों से सम्बन्धित   ;   विषयाः  –  विषयों में  ; वेदाः  –  वैदिक साहित्य  ;  निस्त्रे गुण्यः  –  प्रकृति के तीनों गुणों से परे  ;  भव   –   होओ   ;   अर्जुन  – हे अर्जुन  ;   नित्य-सत्व -स्थ:  – नित्य शुद्धसत्त्व में स्थित  ;   नियोग-क्षेमः   –   लाभ तथा रक्षा के भावों से मुक्त  ;  आत्म बान्   –   आत्मा में स्थित

वेदों में मुख्यतया प्रकृति के तीनों गुणों का वर्णन हुआ है । हे अर्जुन ! इन तीनों गुणों से ऊपर उठो । समस्त द्वैतों और लाभ तथा सुरक्षा की सारी चिन्ताओं से मुक्त होकर आत्म – परायण बनो ।

    तात्पर्य : सारे भौतिक कार्यों में प्रकृति के तीनों गुणों की क्रियाएँ तथा प्रतिक्रियाएँ निहित होती हैं । इनका उद्देश्य कर्म – फल होता है जो भौतिक जगत में बन्धन का कारण है ।  वेदों में मुख्यतया सकाम कर्मों का वर्णन है जिससे सामान्य जन क्रमश : इन्द्रियप्ति के क्षेत्र से उठकर आध्यात्मिक धरातल तक पहुँच सके । 

कृष्ण अपने शिष्य तथा मित्र के रूप में अर्जुन को सलाह देते हैं कि वह वेदान्त दर्शन के आध्यात्मिक पद तक ऊपर उठे जिसका प्रारम्भ ब्रह्म – जिज्ञासा अथवा परम आध्यात्मिकता पर प्रश्नों से होता है ।    इस भौतिक जगत् के सारे प्राणी अपने अस्तित्व के लिए कठिन संघर्ष करते रहते हैं ।

उनके लिए भगवान् ने इस भौतिक जगत् की सृष्टि करने के पश्चात् वैदिक ज्ञान प्रदान किया जो जीवन – यापन तथा भवबन्धन से छूटने का उपदेश देता है । जब इन्द्रियतृप्ति के कार्य यथा कमकाण्ड समाप्त हो जाते हैं तो उपनिषदों के रूप में भगवत साक्षात्कार का अवसर प्रदान किया जाता है ।   ये उपनिषद् विभिन्न वेदों के अंश हैं उसी प्रकार जैसे भगवद्गीता पंचम वेद महाभारत का एक अंग हैं ।

उपनिषदों से आध्यात्मिक जीवन का शुभारम्भ होता है ।  जब तक भौतिक शरीर का अस्तित्व है तब तक भौतिक गुणों की क्रियाएँ प्रतिक्रियाएँ होती रहती है ।  मनुष्य को चाहिए कि सुख – दुख या शीत – ग्रीष्म जैसी द्वैतताओं को सहन करना सीखे और इस प्रकार हानि तथा लाभ की चिन्ता से मुक्त हो जाय । जब मनुष्य कृष्ण की इच्छा पर पूर्णतया आश्रित रहता है तो यह दिव्य अवस्था प्राप्त होती है ।  

यावानर्थउदपानेसर्वतः    सम्प्लुतोदके

         तावान्सर्वेषुवेदेषुब्राह्मणस्यविजानतः   ॥ ४६॥

यावान   –   जितना सारा   ;   अर्थः   –   प्रयोजन होता है   ;  उद-पाने   –   जलकप में   ; सर्वतः  –  सभी प्रकार से  ;  सम्प्लुत-उदके   –   विशाल जलाशय में   ;  तावान्  –  उसी तरह ;  सर्वेष  –  समस्त ;  वेदेषु  –   वेदों में  ;   ब्राह्मणस्य  –  परब्रह्म को जानने वाले का  ; विजानतः   –   पूर्ण ज्ञानी का

एक छोटे से कूप का सारा कार्य एक विशाल जलाशय से तुरन्त पूरा हो जाता है । इसी प्रकार वेदों के आन्तरिक तात्पर्य जानने वाले को उनके सारे प्रयोजन सिद्ध हो जाते हैं ।

    तात्पर्य : वेदों के कर्मकाण्ड विभाग में वर्णित अनुष्ठानों एवं यज्ञों का ध्येय आत्म साक्षात्कार के क्रमिक विकास को प्रोत्साहित करना है ।  और आत्म – साक्षात्कार का ध्येय भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय में ( १५ . १५ ) इस प्रकार स्पष्ट किया गया है – वेदअध्ययन का ध्येय जगत् के आदि कारण भगवान कृष्ण का जानना है । 

अतः आत्म साक्षात्कार का अर्थ है – कृष्ण को तथा उनके साथ अपने शाश्वत सम्बन्ध को समाना । कृष्ण के साथ जीवों के सम्बन्ध का भी उल्लेख भगवद्गीता के पंद्रहवें अध्याय में ( १५ . ७ ) ही हुआ है ।   जीवात्माएँ भगवान् के अंश स्वरूप है , अतः प्रत्येक जीव द्वारा कृष्णभावनामृत को जागृत करना वैदिक ज्ञान की सर्वोच्च पूर्णावस्था है । श्रीमदभागवत में ( ३ . ३३ . ७ ) इसकी पुष्टि इस प्रकार हुई है  

अहो यत पचोऽत्तो गरीयान् यजिवाये वर्तते नाम तभ्यम ।

तेपुस्तपस्ते जुहुः सनुरायर्या ब्रह्मानूचुर्नाम गुणन्ति येते ।

 ” हे प्रभो , आपके पवित्र नाम का जाप करने वाला भले ही चाण्डाल जैसे निम्न परिवार में क्यों न उत्पन्न हुआ हो , किन्तु वह आत्म – साक्षात्कार के सर्वोच्च पद पर स्थित होता है ।  ऐसा व्यक्ति अवश्य ही वैदिक अनुष्ठानों के अनुसार सारी तपस्याएं सम्पन्न किये होता है और अनेकानेक बार तीर्थस्थानों में स्नान करके वेदों का अध्ययन किये होता है । ऐसा व्यक्ति आर्य कुल में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है । ”

अतः मनुष्य को इतना बुद्धिमान् तो होना ही चाहिए कि केवल अनुष्ठानों के प्रति आसक्त न रहकर वेदों के उद्देश्य को समझे और अधिकाधिक इन्द्रियतृप्ति के लिए ही स्वर्गलोक जाने की कामना न करें ।   इस युग में सामान्य व्यक्ति के लिए न तो वैदिक अनुष्ठानों के समस्त विधि – विधानों का पालन करना सम्भव है और न सारे वेदान्त तथा उपनिषदों का सर्वाग अध्ययन कर पाना सहज है । 

वेदों के उद्देश्य को सम्पन्न करने के लिए प्रचर समय , शक्ति , ज्ञान तथा साधन की आवश्यकता होती है । इस युग में ऐसा कर पाना सम्भव नहीं है , किन्तु वैदिक संस्कृति का परम लक्ष्य भगवन्नाम कीर्तन द्वारा प्राप्त हो जाता है जिसकी संस्तुति पतितात्माओं के उद्धारक भगवान चैतन्य द्वारा हुई है ।  

जव चैतन्य से महान वैदिक पंडित प्रकाशानन्द सरस्वती ने पूछा कि आप वेदान्त दर्शन का अध्ययन न करके एक भावुक की भाँति पवित्र नाम का कीर्तन क्यों करते हैं ।  तो उन्होंने उत्तर दिया कि मेरे गुरु ने मुझे बड़ा मुर्ख समझकर भगवान कृष्ण के नाम का कीर्तन करने की आज्ञा दी ।

अतः उन्होंने ऐसा ही किया और वे पागल की भांति भावोन्मत्त हो गए ।  इस कलियुग में अधिकांश जनता मूर्ख है और वेदान्त दर्शन समझ पाने के लिए पर्याप्त शिक्षित नहीं है । वेदान्त दर्शन के परम उद्देश्य की पूर्ति भगवान के पवित्र नाम का कीर्तन करने से हो जाती है ।   वेदान्त वैदिक ज्ञान की पराकाष्ठा है । और वेदान्त दर्शन के प्रणेता तथा ज्ञाता भगवान् कृष्ण हैं । सबसे बड़ा वेदान्ती तो वह महात्मा है जो भगवान के पवित्र नाम का जप करने में आनन्द लेता है । सम्पूर्ण वैदिक रहस्यवाद का यही चरम उद्देश्य है ।

कर्मण्येवाधिकारस्ते   मा   फलेषु   कदाचन ।

          मा   कर्मफलहेतुर्भूर्मा  ते  सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥ ४७ ॥

कर्मणि   –   कर्म करने में   ;  एव  –  निश्चय ही  ;  अधिकारः  –  अधिकार   ;  ते  –  तुम्हारा  ;  मा  –  कभी नहीं   ;  फलेषु  –  ( कर्म ) फलों में  ;कदाचन  –  कदापि   ;    मा  –  कभी नहीं  ;  कर्म-फल –   कर्म का फल  ;  हेतुः–  कारण   ;  भूः  –  होओ  ; मा  –  कभी नहीं   ;   ते  – तुम्हारी  ;  सङ्ग:  –  आसक्ति   ;  अस्तु  –  हो   ;  अकर्मणि  –  कर्म न करने में

तुम्हें अपना कर्म ( कर्तव्य ) करने का अधिकार है , किन्तु कर्म के फलों के तुम अधिकारी नहीं हो । तुम न तो कभी अपने आपको अपने कर्मों के फलों का कारण मानो , न ही कर्म न करने में कभी आसक्त होओ ।

     तात्पर्य : यहाँ पर सीन विचारणीय वाते हैं कर्म ( स्वधर्म ) , विकर्म तथा अकर्म । कर्म ( स्वधर्म ) के कार्य हैं जिनका आदेश प्रकृति के गुणों के रूप में प्राप्त किया जाता है ।  अधिकारी की सम्मति के बिना किये गये कर्म विकर्म कहलाते हैं और अकर्म का अर्थ है – अपने कर्मा को न करना । भगवान् ने अर्जुन को उपदेश दिया कि वह निष्क्रिय न हो , अपितु फल के प्रति आसक्त हुए विना अपना कर्म करे । 

कर्म फल के प्रति आसक्त रहने वाला भी कर्म का कारण है । इस तरह वह ऐसे कर्मफलों का भोक्ता होता है ।   जहाँ तक निर्धारित कर्मों का सम्बन्ध है वे तीन उपश्रेणियों के हो सकते है – यथा नित्यकर्म , आपात्कालीन कर्म तथा इच्छित कर्म । नित्यकर्म फल की इच्छा बिना शास्त्रों के निर्देशानुसार सतोगुण में रहकर किये जाते हैं । 

फल युक्त कर्म बन्धन के कारण बनते है , अतः ऐसे कर्म अशुभ है । हर व्यक्ति को अपने कर्म पर अधिकार है , किन्तु उसे फल से अनासक्त होकर कर्म करना चाहिए । ऐसे निष्काम कर्म निस्सन्देह मुक्ति पथ की ओर ले जाने वाले हैं ।  अतएव भगवान् ने अर्जुन को फलासक्ति रहित होकर कर्म ( स्यधर्म ) के रूप में युछ करने की आज्ञा दी ।

उसका युद्ध – विमुख होना आसक्ति का दुसरा पहलु है ।  ऐसी आसक्ति से कभी मुक्ति पथ की प्राप्ति नहीं हो पाती । आसक्ति चाहे स्वीकारात्मक हो या निषेधात्मक , वह बन्धन का कारण है । अकर्म पापमय है । अतः कर्तव्य के रूप में युछ करना ही अर्जुन के लिए मुक्ति का एकमात्र कल्याणकारी मार्ग था ।    

योगस्थः  कुरु  कर्माणि  सङ्गंत्यक्त्वा   धनञ्जय ।

          सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥ ४८ ॥

योगस्थः:  –   समभाव होकर  ;   कुरु  –  करो  ;  कर्माणि  –   अपने कर्म  ;  सङ्गम्  –  आसक्ति को   ;  त्यक्त्वा   –   त्याग कर  ;  धननय  –  हे अर्जुन  ;  सिद्धि-असिद्धयोः   –   सफलता तथा विफलता में   ;  समः  –  समभाव  ; भूत्वा   –   होकर  ;  समत्वम्  –   समता  ; योगः  –   योग   ;  उच्यते   –   कहा जाता है

हे अर्जुन ! जय अथवा पराजय की समस्त आसक्ति त्याग कर समभाव से अपना कर्म करो । ऐसी समता योग कहलाती है ।

    तात्पर्य : कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि वह योग में स्थित होकर कर्म करे और योग है क्या ? योग का अर्थ है सदैव चंचल रहने वाली इन्द्रियों को वश में रखते हुए परमतत्त्व में मन को एकाग्र करना । और परमतत्त्व कौन है ? भगवान ही परमतत्त्व है और कि व स्वयं अर्जुन को युद्ध करने के लिए कह रहे हैं , अतः अर्जुन को युद्ध के फल से कोई सरोकार नहीं है । 

जय या पराजय कृष्ण के लिए विचारणीय है , अर्जुन को तो बस श्रीकृष्ण के निर्देशानुसार कर्म करना है । कृष्ण के निर्देश का पालन ही वास्तविक योग है और इसका अभ्यास कृष्णभावनामृत नामक विधि द्वारा किया जाता है ।   एकमात्र कृष्णभावनामृत के माध्यम से ही स्वामित्व भाव का परित्याग किया जा सकता है । इसके लिए उसे कृष्ण का दास या उनके दासों का दास बनना होता है ।

कृष्णभावनामूत में कर्म करने की यही एक विधि है जिससे योग में स्थित होकर कर्म किया जा सकता है ।  अर्जुन क्षत्रिय है , अतः वह वर्णाश्रम – धर्म का अनुयायी है । विष्ण – पुराण में कहा गया है कि वर्णाश्रम – धर्म का एकमात्र उद्देश्य विष्णु को प्रसन्न करना है ।  

सांसारिक नियम है । कि लोग पहले अपनी तुष्टि करते है , किन्तु यहाँ तो अपने को तुष्ट न करके कृष्ण को । तुष्ट करना है । अतः कृष्ण को तुष्ट किये बिना कोई वर्णाश्रम – धर्म का पालन कर भी नहीं सकता । यहाँ पर परोक्ष रूप से अर्जुन को कृष्ण द्वारा बताई गई विधि के अनुसार कर्म करने का आदेश है ।  

दूरेण    ह्यवरं   कर्म   बुद्धियोगाद्धनञ्जय ।

         बुद्धी  शरणमन्विच्छ  कृपणाः  फलहेतवः॥ ४९ ॥

दूरेण   –   दूर से ही त्याग दो   ;  हि  –  निश्चय ही   ;  अवरम   –   गर्हित , निन्दनीय  ;  कर्म:  –  कर्म   ;   बुद्धि योगात्   –   कृष्णभावनामृत के बल पर  ;  धनञ्जय   –   हे सम्पत्ति को जीतने वाले   ;   बुद्धी –  ऐसी चेतना में   ;  शरणम्   –   पुर्ण समर्पण , आश्रय  ; अन्विच्छ   –  प्रयत्न करो  ; कृपणा:   –    कंजूस व्यक्ति  ;   फल-हेतवः   –  सकाम कर्म की अभिलाषा वाले

हे धनंजय ! भक्ति के द्वारा समस्त गर्हित कर्मों से दूर रहो और उसी भाब से भगवान् की शरण ग्रहण करो । जो व्यक्ति अपने सकाम कर्म – फलों को भोगना चाहते हैं ,वे कृपण है ।

    तात्पर्य : जो व्यक्ति भगवान के दास रूप में अपने स्वरूप को समझ लेता है यह कृष्णभावनामृत में स्थित रहने के अतिरिक्त सारे कर्मों को छोड़ देता है । जीव के लिए ऐसी भक्ति कर्म का सही मार्ग है ।  केवल कृपण ही अपने सकाम कर्मों का फल भोगना चाहते हैं , किन्तु इससे वे भवबन्धन में और अधिक फंसते जाते हैं । कृष्णभावनामृत के अतिरिक्त जितने भी कर्म सम्पन्न किये जाते हैं ये गर्हित है क्योंकि इससे कर्ता जन्म – मृत्य के चक्र में लगातार फंसा रहता है ।

कर्मण्येवाधिकारस्ते   मा   फलेषु   कदाचन ।

          मा   कर्मफलहेतुर्भूर्मा  ते  सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥ ४७ ॥

कर्मणि   –   कर्म करने में   ;  एव  –  निश्चय ही  ;  अधिकारः  –  अधिकार    ;  ते  –  तुम्हारा  ;  मा  –  कभी नहीं   ;  फलेषु  –  ( कर्म ) फलों में  ; कदाचन  –  कदापि   ;   मा  –  कभी नहीं  ;  कर्म-फल –   कर्म का फल  ;  हेतुः–  कारण   ;  भूः  –  होओ  ; मा  –  कभी नहीं  ;   ते  – तुम्हारी  ;  सङ्ग:  –  आसक्ति  ;  अस्तु  –  हो   ;  अकर्मणि  –  कर्म न करने में

तुम्हें अपना कर्म ( कर्तव्य ) करने का अधिकार है , किन्तु कर्म के फलों के तुम अधिकारी नहीं हो । तुम न तो कभी अपने आपको अपने कर्मों के फलों का कारण मानो , न ही कर्म न करने में कभी आसक्त होओ ।

     तात्पर्य : यहाँ पर सीन विचारणीय वाते हैं कर्म ( स्वधर्म ) , विकर्म तथा अकर्म । कर्म ( स्वधर्म ) के कार्य हैं जिनका आदेश प्रकृति के गुणों के रूप में प्राप्त किया जाता है । अधिकारी की सम्मति के बिना किये गये कर्म विकर्म कहलाते हैं और अकर्म का अर्थ है – अपने कर्मा को न करना ।

भगवान् ने अर्जुन को उपदेश दिया कि वह निष्क्रिय न हो , अपितु फल के प्रति आसक्त हुए विना अपना कर्म करे ।  कर्म फल के प्रति आसक्त रहने वाला भी कर्म का कारण है । इस तरह वह ऐसे कर्मफलों का भोक्ता होता है । जहाँ तक निर्धारित कर्मों का सम्बन्ध है वे तीन उपश्रेणियों के हो सकते है – यथा नित्यकर्म , आपात्कालीन कर्म तथा इच्छित कर्म ।

नित्यकर्म फल की इच्छा बिना शास्त्रों के निर्देशानुसार सतोगुण में रहकर किये जाते हैं ।  फल युक्त कर्म बन्धन के कारण बनते है , अतः ऐसे कर्म अशुभ है । हर व्यक्ति को अपने कर्म पर अधिकार है , किन्तु उसे फल से अनासक्त होकर कर्म करना चाहिए । ऐसे निष्काम कर्म निस्सन्देह मुक्ति पथ की ओर ले जाने वाले हैं ।  

अतएव भगवान् ने अर्जुन को फलासक्ति रहित होकर कर्म ( स्यधर्म ) के रूप में युछ करने की आज्ञा दी । उसका युद्ध – विमुख होना आसक्ति का दुसरा पहलु है ।ऐसी आसक्ति से कभी मुक्ति पथ की प्राप्ति नहीं हो पाती । आसक्ति चाहे स्वीकारात्मक हो या निषेधात्मक , वह बन्धन का कारण है । अकर्म पापमय है । अतः कर्तव्य के रूप में युछ करना ही अर्जुन के लिए मुक्ति का एकमात्र कल्याणकारी मार्ग था ।    

योगस्थः  कुरु  कर्माणि  सङ्गंत्यक्त्वा   धनञ्जय ।

          सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥ ४८ ॥

योगस्थः:  –   समभाव होकर  ;   कुरु  –  करो  ;  कर्माणि  –   अपने कर्म  ;  सङ्गम्  –  आसक्ति को   ;  त्यक्त्वा   –   त्याग कर   ;  धननय  –  हे अर्जुन  ;  सिद्धि-असिद्धयोः   –   सफलता तथा विफलता में   ;  समः  –  समभाव   ; भूत्वा   –   होकर  ;   समत्वम्  –   समता  ; योगः  –   योग   ;  उच्यते   –   कहा जाता है

हे अर्जुन ! जय अथवा पराजय की समस्त आसक्ति त्याग कर समभाव से अपना कर्म करो । ऐसी समता योग कहलाती है ।

    तात्पर्य : कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि वह योग में स्थित होकर कर्म करे और योग है क्या ? योग का अर्थ है सदैव चंचल रहने वाली इन्द्रियों को वश में रखते हुए परमतत्त्व में मन को एकाग्र करना । और परमतत्त्व कौन है ? भगवान ही परमतत्त्व है और कि व स्वयं अर्जुन को युद्ध करने के लिए कह रहे हैं , अतः अर्जुन को युद्ध के फल से कोई सरोकार नहीं है ।

  जय या पराजय कृष्ण के लिए विचारणीय है , अर्जुन को तो बस श्रीकृष्ण के निर्देशानुसार कर्म करना है । कृष्ण के निर्देश का पालन ही वास्तविक योग है और इसका अभ्यास कृष्णभावनामृत नामक विधि द्वारा किया जाता है ।   एकमात्र कृष्णभावनामृत के माध्यम से ही स्वामित्व भाव का परित्याग किया जा सकता है । इसके लिए उसे कृष्ण का दास या उनके दासों का दास बनना होता है ।

कृष्णभावनामूत में कर्म करने की यही एक विधि है जिससे योग में स्थित होकर कर्म किया जा सकता है ।  अर्जुन क्षत्रिय है , अतः वह वर्णाश्रम – धर्म का अनुयायी है । विष्ण – पुराण में कहा गया है कि वर्णाश्रम – धर्म का एकमात्र उद्देश्य विष्णु को प्रसन्न करना है ।   सांसारिक नियम है । कि लोग पहले अपनी तुष्टि करते है , किन्तु यहाँ तो अपने को तुष्ट न करके कृष्ण को । तुष्ट करना है । अतः कृष्ण को तुष्ट किये बिना कोई वर्णाश्रम – धर्म का पालन कर भी नहीं सकता । यहाँ पर परोक्ष रूप से अर्जुन को कृष्ण द्वारा बताई गई विधि के अनुसार कर्म करने का आदेशहै ।  

दूरेण    ह्यवरं   कर्म   बुद्धियोगाद्धनञ्जय ।

         बुद्धी  शरणमन्विच्छ  कृपणाः  फलहेतवः॥ ४९ ॥

दूरेण   –   दूर से ही त्याग दो   ;  हि  –  निश्चय ही   ;  अवरम   –   गर्हित , निन्दनीय   ;  कर्म:  –  कर्म   ;   बुद्धि योगात्   –   कृष्णभावनामृत के बल पर  ;  धनञ्जय   –   हे सम्पत्ति को जीतने वाले  ;  बुद्धी –  ऐसी चेतना में  ;  शरणम्   –   पुर्ण समर्पण , आश्रय  ; अन्विच्छ   –  प्रयत्न करो  ; कृपणा:   –    कंजूस व्यक्ति  ;  फल-हेतवः   –  सकाम कर्म की अभिलाषा वाले

हे धनंजय ! भक्ति के द्वारा समस्त गर्हित कर्मों से दूर रहो और उसी भाब से भगवान् की शरण ग्रहण करो । जो व्यक्ति अपने सकाम कर्म – फलों को भोगना चाहते हैं ,वे कृपण है ।

    तात्पर्य : जो व्यक्ति भगवान के दास रूप में अपने स्वरूप को समझ लेता है यह कृष्णभावनामृत में स्थित रहने के अतिरिक्त सारे कर्मों को छोड़ देता है । जीव के लिए ऐसी भक्ति कर्म का सही मार्ग है । केवल कृपण ही अपने सकाम कर्मों का फल भोगना चाहते हैं , किन्तु इससे वे भवबन्धन में और अधिक फंसते जाते हैं । कृष्णभावनामृत के अतिरिक्त जितने भी कर्म सम्पन्न किये जाते हैं ये गर्हित है क्योंकि इससे कर्ता जन्म – मृत्य के चक्र में लगातार फंसा रहता है ।

अतः कभी इसकी आकांक्षा नहीं करनी चाहिए कि में कर्म का कारण बनूं ।   कृष्णभावनामृत में हर कार्य कृष्ण की तुष्टि के लिए किया जाना चाहिए । कृपणों को यह ज्ञात नहीं है कि देववश या कठोर श्रम से अर्जित सम्पत्ति का किस तरह सदुपयोग करें ।  मनुष्य को अपनी सारी शक्ति कृष्णभावनामृत अर्जित करने में लगानी चाहिए । इससे उसका जीवन सफल हो सकेगा । कृपणों की भांति अभागे व्यक्ति अपनी मानवी शक्ति को भगवान् की सेवा में नहीं लगाते ।  

बुद्धियुक्तो     जहातीह     उभे     सुकृतदुष्कृते ।

         तस्माद्योगाय  युज्यस्व  योगः  कर्मसु  कौशलम् ५०॥

बद्धि-युक्तः  –  भक्ति में लगा रहने वाला  ;  जहाति   –   मुक्त हो सकता है  ;  इह   –   इस जीवन में  ;  उभे  –  दानों  ; सकृत-दुष्कृते  –  अच्छे तथा बुरे फल   ; तस्मात्  –  अत  ;  योगाय  – भक्ति के लिए  ;  युज्यस्व  –  इस तरह लग जाओ ;  योग:   –  कृष्णभावनामृत  ;  कर्मसु  –  समस्त कार्यों में  ;  कोशलम्  –  कुशलता , कला

भक्ति में संलग्न मनुष्य इस जीवन में ही अच्छे तथा बरे कार्यों से अपने को मुक्त कर लेता है । अतः बोग के लिए प्रयत्न करो क्योंकि सारा कार्य कौशल यही है ।

    तात्पर्य : जीवात्मा अनादि काल से अपने अच्छे तथा बुरे कर्म के फलों को संचित करता रहा है । फलतः वह निरन्तर अपने स्वरूप से अनभिज्ञ बना रहा है । इस अज्ञान को भगवद्गीता के उपदेश से दूर किया जा सकता है ।  यह हमें पूर्ण रूप में भगवान् श्रीकृष्ण की शरण में जाने तथा जन्म – जन्मान्तर कर्म फल की शृंखला का शिकार बनने से मुक्त होने का उपदेश देती है, अतः अर्जुन को कृष्णभावनामृत में कार्य करने के लिए कहा गया है क्योंकि कर्मफल के शुद्ध होने की यही प्रक्रिया है ।

 अतः कभी इसकी आकांक्षा नहीं करनी चाहिए कि में कर्म का कारण बनूं ।   कृष्णभावनामृत में हर कार्य कृष्ण की तुष्टि के लिए किया जाना चाहिए । कृपणों को यह ज्ञात नहीं है कि देववश या कठोर श्रम से अर्जित सम्पत्ति का किस तरह सदुपयोग करें ।  मनुष्य को अपनी सारी शक्ति कृष्णभावनामृत अर्जित करने में लगानी चाहिए । इससे उसका जीवन सफल हो सकेगा । कृपणों की भांति अभागे व्यक्ति अपनी मानवी शक्ति को भगवान् की सेवा में नहीं लगाते ।  

कर्मजं  बुद्धियुक्ता  हि  फलं  त्यक्त्वा  मनीषिणः ।

         जन्मबन्धविनिर्मक्ताः     पदं      गच्छन्त्यनामयम् ॥ ५१ ॥

कर्म-जम्   –  सकाम कर्मा के कारण  ;  बुद्धि-युक्ताः  –  भक्ति में लगे   ; हि   –  निश्चय ही  ;  फलम्–  फल  ;   त्यक्त्वा   –   त्याग कर  ;  मनीषिणः  –  बड़े-बड़े ऋषि मुनि या भक्तगण  ;  जन्म-बन्ध  –   जन्म तथा मूत्यु के बन्धन से  ;   र्मुक्ताः  –  मुक्त   ;   पदम्   –   पद पर   ; गच्छन्ति  –  पहुंचते हैं  ; अनामयम्  –  बिना कष्ट के

इस तरह भगवद्भक्ति में लगे रहकर बड़े – बड़े ऋषि , मुनि अथवा भक्तगण अपने आपको इस भौतिक संसार में कर्म के फलों से मुक्त कर लेते हैं । इस प्रकार के जन्म – मृत्यु के चक से छूट जाते है और भगवान के पास जाकर उस अवस्था को प्राप्त करते हैं , जो समस्त दुखों से परे है ।

    तात्पर्य : मुक्त जीवों का सम्वन्ध उस स्थान से होता है जहाँ भौतिक कष्ट नहीं होते । । भागवत में ( १० . १४ . ५८ ) कहा गया है

समाश्रिता ये पदपल्लवप्लवं महत्पदं पुण्ययशा मुराः ।

 भवाम्बुधिर्वत्सपदं परं पदं पदं पदं यद्विपदां न तेषाम् । ।

   ” जिसने उन भगवान के चरणकमल रूपी नाब को ग्रहण कर लिया है, जो दृश्य जगत् के आश्रय है और मुकुन्द नाम से विख्यात है अर्थात् मुक्ति के दाता है, उसके लिए यह भवसागर गोखुर में समाये जल के समान है । उसका लक्ष्य परं पदम है अर्थात यह स्थान जहाँ भौतिक कष्ट नहीं है या कि बैकुण्ठ है ।

वह स्थान नहीं जहाँ पद – पद पर संकट हो । ”   अज्ञानवश मनुष्य यह नहीं समझ पाता कि यह भौतिक जगत् ऐसा दुखमय स्थान है जहा पद – पद पर संकट हैं । केबल अज्ञानवश अल्पज्ञानी पुरुष यह सोच कर कि कर्मों से वे सुखी रह सकेंगे सकाम कर्म करते हुए स्थिति को सहन करते हैं ।  उन्हें यह ज्ञात नहीं है कि इस संसार में कहीं भी कोई भी शरीर दुखों से रहित नहीं है । संसार में सर्वत्र जीवन के दुख – जन्म , मृत्यू , जरा तथा व्याधि – विद्यमान है ।

किन्तु जो अपने वास्तविक स्वरूप को समझ लेता है और इस प्रकार भगवान की स्थिति को समझ लेता है . वही भगवान् की प्रेमा – भक्ति में लगता है ।   फलस्वरूप वह बैंकुण्ठलोक जाने का अधिकारी बन जाता जानता भौतिक कष्टमय जीवन नही काल का प्रभाव तथा मृत्यु हीं अपने स्वरूप को जानने का अर्थ है भगवान की अलोकिक स्थिति को भी जान लेना । 

जो भ्रमवश यह सोचता है कि जीव की स्थिति तथा भगवान् की स्थिति एकसमान हैं उसे समझो कि वह अंधकार में है और स्वयं भगवद्भक्ति करने में असमर्थ है । वह अपने आपको प्रभु मान लेता है और इस तरह जन्म – मृत्यु की पुनरावृत्ति का पथ चुन लेता है । किन्तु जो यह समझते हुए कि उसकी स्थिति सेवक की है अपने को भगवान् की सेवा में लगा देता है वह तुरन्त ही बैकुण्ठलोक जाने का अधिकारी बन जाता है ।  भगवान् की सेवा कर्मयोग या बुद्धियोग कहलाती है , जिसे स्पष्ट शब्दों में भगवद्भक्ति कहते हैं ।  

यदा   ते   मोहकलिलं    बुद्धिर्व्यतितरिष्यति । 

       तदा  गन्तासि  निर्वेदं  श्रोतव्यस्य  श्रुतस्य  च ॥ ५२ ॥

यदा  –  जव  ;  ते–  तुम्हारा  ;  मोह  –  मोह के   ; कलिलम्  –  धने जंगल को   ;   बुद्धिः  –  बुद्धिमय दिव्य सेवा  ;  व्यतितरिष्यति  –  पार कर जाती है  ;  तदा  –  उस समय  ;  गन्ता असि – तुम जाओगे ;  निर्वेदम्  –  विरक्ति को   ;  श्रोतव्यस्य  –  सुनने योग्य के प्रति  ;  श्रुतस्य – सुने हुए का   ;  च  –  भी

जब तुम्हारी बुद्धि मोह रूपी सघन वन को पार कर जायेगी तो तुम सुने हुए तथा सुनने योग्य सब के प्रति अन्यमनस्क हो जाओगे ।

    तात्पर्य : भगवद्भक्तों के जीवन में ऐसे अनेक उदाहरण प्राप्त हैं जिन्हें भगवद्भक्ति के कारण वैदिक कर्मकाण्ड से विरक्ति हो गई ।  जव मनुष्य श्रीकृष्ण को तथा उनके साथ अपने सम्बन्ध को वास्तविक रूप में समझ लेता है तो वह सकाम कर्मों के अनुष्ठानों के प्रति पूर्णतया अन्यमनस्क हो जाता है , भले ही वह अनुभवी ब्राह्मण क्यों न हो ।  भक्त परम्परा के महान भक्त तथा आचार्य श्री माधवेन्द्रपुरी का कहना है

  सन्ध्यावन्दन भद्रमस्तु भवतो भोः स्नान तुभ्यं नमो ।

भो देवाः पितरश्च तर्पणविधौ नाहं क्षमः क्षम्यताम् । ।

यत्र   कापि   निषद्य  यादवकलोत्तमस्य  कंसद्विषः ।

स्मारं  स्मारमघं  हरामि तदलं  मन्ये  किमन्येन मे। ।

  ” हे मेरी त्रिकाल प्रार्थनाओ, तुम्हारी जय हो । हे स्नान, तुम्हें प्रणाम है । हे देवपितगण, अब में आप लोगों के लिए तर्पण करने में असमर्थ हूँ ।  अब तो जहाँ भी वैठता हूँ , यादव कुलवंशी , कंस के हंता श्रीकृष्ण का ही स्मरण करता हूँ और इस तरह में अपने पापमय बन्धन से मुक्त हो सकता हूँ । मैं सोचता हूँ कि यही मेरे लिए पर्याप्त है । ”

वैदिक रस्में तथा अनुष्ठान यथा त्रिकाल संध्या , प्रातःकालीन स्नान , पितृ तर्पण आदि नवदीक्षितों के लिए अनिवार्य है ।   किन्त जब कोई पुर्णतया कृष्णभावनाभावित हो और कृष्ण की दिव्य प्रेमाभक्ति में लगा हो , तो वह इन विधि – विधानों के प्रति उदासीन हो जाता है , क्योंकि उसे पहले ही सिद्धि प्राप्त हो चुकी होती है ।

यदि कोई परमेश्वर कृष्ण की सेवा करके ज्ञान को प्राप्त होता है तो उसे शास्त्रों में वर्णित विभिन्न प्रकार की तपस्याएँ तथा यज्ञ करने की आवश्यकता नहीं रह जाती ।  इसी प्रकार जो यह नहीं समझता कि वेदों का उद्देश्य कृष्ण तक पहुँचना है और अपने आपको अनुष्ठानादि में व्यस्त रखता है , वह केवल अपना समय नष्ट करता है । कृष्णभावनाभावित व्यक्ति शब्द ब्रह्म की सीमा या वेदों तथा उपनिषदों की परिधि को भी लाँघ जाते हैं ।

श्रुतिविप्रतिपन्ना   ते  यदा  स्थास्यति  निश्चला ।

         समाधावचला   बुद्धिस्तदा   योगमवाप्स्यसि ॥ ५३ ॥

श्रुति  –   वैदिक ज्ञान के   ;   विप्रतिपन्ना  –  कर्मफलों से प्रभावित हुए बिना   ;  ते   –  तुम्हारा  ;  यदा  –  जव  ;  स्थास्यति   –   स्थिर हो जाएगा   ; निश्चला   –  एकनिष्ठ  ;  समाधौ   –   दिव्य चेतना या कृष्णभावनामृत में   ; अचला   –  स्थिर  ;  बुद्धिः  –   बुद्धि  ;  तदा   –  तव   ;  योगम्-आत्म  –  साक्षात्कार   ;  अवाप्स्यसि  –  तुम प्राप्त करोगे

जब तुम्हारा मन वेदों की अलंकारमयी भाषा से विचलित न हो और वह आत्म साक्षात्कार की समाधि में स्थिर हो जाय , तब तुम्हें दिव्य चेतना प्राप्त हो जायेगी ।

     तात्पर्य : कोई समाधि में है ‘ इस कथन का अर्थ यह होता है कि वह पूर्णतया कृष्णभावनाभावित है अर्थात् उसने पूर्ण समाधि में ब्रह्म , परमात्मा तथा भगवान् को प्राप्त कर लिया है ।  आत्म – साक्षात्कार की सर्वोच्च सिद्धि यह जान लेना है कि मनुष्य कृष्ण का शाश्वत दास है और उसका एकमात्र कर्तव्य कृष्णभावनामृत में अपने सारे कर्म करना है कृष्णभावनाभावित व्यक्ति या भगवान् के एकनिष्ठ भक्त को न तो वेदों की अलंकारमयी वाणी से विचलित होना चाहिए न ही स्वर्ग जाने के उद्देश्य से सकाम कर्मों में प्रवृत्त होना चाहिए ।

” अतः कृष्णभावनामृत में मनुष्य कृष्ण के सान्निध्य में रहता है और कृष्ण से प्राप्त सारे आदेश उस दिव्य अवस्था में समझे जा सकते हैं । ऐसे कार्यों के परिणामस्वरूप निश्चयात्मक ज्ञान की प्राप्ति निश्चित है । उसे कृष्ण या उनके प्रतिनिधि गुरु की आज्ञाओं का पालन मात्र करना होगा ।”

भगवद गीता अध्याय 2.4 ~ कर्मयोग का उपदेश / Powerful Bhagavad Gita karamyog Ch2.4
श्रीमद भगवद गीता – अध्याय 2 _ कर्मयोग का उपदेश Bhagavad Geeta Chapter -2

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