भगवद गीता अध्याय 18.6~फलसहित भक्तिसहित कर्मयोग के विषय का वर्णन

अध्याय अठारह (Chapter -18)

भगवद गीता अध्याय 18.6 में शलोक 56 से  शलोक 66  फलसहित भक्तिसहित कर्मयोग के विषय का वर्णन !

सर्वकर्माण्यपि  सदा  कुर्वाणो  मद्व्यपाश्रयः । 

मत्प्रसादादवाप्नोति   शाश्वतं    पदमव्ययम् ॥ ५६ ॥  

सर्व   –  समस्त   ;    कर्माणि    –   कार्यकलाप को     ;      अपि   –   यद्यपि    ;     व्यपाश्रयः    –   मेरे संरक्षण में     ;    सदा     – सदैव    ;     कुर्वाण:    – करते हुए   ;    मत्   –    मत्    ;   प्रसादात्   –    मेरी कृपा से     ;    अवाप्नोति   –    प्राप्त करता है    ; शाश्वतम्    –    नित्य    ; पदम्     –   धाम को    ;    अव्ययम्    –   अविनाशी । 

मेरा शुद्ध भक्त मेरे संरक्षण में , समस्त प्रकार के कार्यों में संलग्न रह कर भी मेरी कृपा से नित्य तथा अविनाशी धाम को प्राप्त होता है । 

तात्पर्य :-  मद् – व्यपाश्रयः शब्द का अर्थ है परमेश्वर के संरक्षण में भौतिक कल्पय से रहित होने के लिए शुद्ध भक्त परमेश्वर या उनके प्रतिनिधि स्वरूप गुरु के निर्देशन में कर्म करता है । उसके लिए समय की कोई सीमा नहीं है । वह सदा , चौबीसों घंटे , शत प्रतिशत परमेश्वर के निर्देशन में कार्यों में संलग्न रहता है ।

ऐसे भक्त पर जो कृष्णभावनामृत में रत रहता है , भगवान् अत्यधिक दयालु होते हैं । यह समस्त कठिनाइयों के बावजूद अन्ततोगत्वा दिव्यधाम या कृष्णलोक को प्राप्त करता है । वहाँ उसका प्रवेश सुनिश्चित रहता है , इसमें कोई संशय नहीं है । उस परम धाम में कोई परिवर्तन नहीं होता , वहाँ प्रत्येक वस्तु शाश्वत , अविनश्वर तथा ज्ञानमय होती है । 

चेतसा  सर्वकर्माणि  मयि  संन्यस्य  मत्परः । 

बुद्धियोगमुपाश्रित्य   मचित्तः   सततं   भव ॥ ५७ ॥ 

चेतसा    –   बुद्धि से    ;    सर्व  कर्माणि    –    समस्त प्रकार के कार्य     ;     मयि    –    मुझ में    ; संन्यस्य    –     त्यागकर   ;      मत्-पर:   –     मेरे संरक्षण में     ;    बुद्धि-योगम्    –     भक्ति के कार्यों की     ;      उपाश्रित्य    –    शरण लेकर    ; मत्-चित्तः    –     मेरी चेतना में     ;    सततम्   –    चौबीसों घंटे   ; भव   –   होओ । 

सारे कार्यों के लिए मुझ पर निर्भर रहो और मेरे संरक्षण में सदा कर्म करो । ऐसी भक्ति में मेरे प्रति पूर्णतया सचेत रहो । 

तात्पर्य :-  जब मनुष्य कृष्णभावनामृत में कर्म करता है , तो वह संसार के स्वामी के रूप में कर्म नहीं करता । उसे चाहिए कि वह सेवक की भाँति परमेश्वर के निर्देशानुसार कर्म करे । सेवक को स्वतन्त्रता नहीं रहती । वह केवल अपने स्वामी के आदेश पर कार्य करता है , उस पर लाभ – हानि का कोई प्रभाव नहीं पड़ता ।

वह भगवान् के आदेशानुसार अपने कर्तव्य का सच्चे दिल से पालन करता है । अब कोई यह तर्क दे सकता है कि अर्जुन कृष्ण के व्यक्तिगत निर्देशानुसार कार्य कर रहा था , लेकिन जब कृष्ण उपस्थित न हाँ तो कोई किस तरह कार्य करे ? यदि कोई इस पुस्तक में दिये गये कृष्ण के निर्देश के अनुसार तथा कृष्ण के प्रतिनिधि के मार्गदर्शन में कार्य करता है , तो उसका फल बैसा ही होगा ।

इस श्लोक में मत्परः शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है । यह सूचित करता है कि मनुष्य जीवन में कृष्ण को प्रसन्न करने के लिए कृष्णभावनाभावित होकर कार्य करने के अतिरिक्त अन्य कोई लक्ष्य नहीं होता । जब वह इस प्रकार कार्य कर रहा हो तो उसे केवल कृष्ण का ही चिन्तन इस प्रकार से करना चाहिए- ” कृष्ण ने मुझे इस विशेष कार्य को पूरा करने के लिए नियुक्त किया है । ” और इस तरह कार्य करते हुए उसे स्वाभाविक रूप से कृष्ण का चिन्तन हो आता है ।

यही पूर्ण कृष्णभावनामृत है । किन्तु यह ध्यान रहे कि मनमाना कर्म करके उसका फल परमेश्वर को अर्पित न किया जाय । इस प्रकार का कार्य कृष्णभावनामृत की भक्ति में नहीं आता । मनुष्य को चाहिए कि कृष्ण के आदेशानुसार कर्म करे । यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण बात है । कृष्ण का यह आदेश गुरु परम्परा द्वारा प्रामाणिक गुरु से प्राप्त होता है ।

अतएव गुरु के आदेश को जीवन का मूल कर्तव्य समझना चाहिए । यदि किसी को प्रामाणिक गुरु प्राप्त हो जाता है और वह निर्देशानुसार कार्य करता है , तो कृष्णभावनामय जीवन की सिद्धि सुनिश्चित है ।

मचित्तः     सर्वदुर्गाणि    मत्प्रसादात्तरिष्यसि । 

अथ  चेत्त्वमहङ्कारान्न  श्रोष्यसि  विनङ्क्ष्यसि ॥ ५८ ॥  

मत्    –    मेरी   ;    चित्त:   –   चेतना में   ;    सर्व    –   सारी    ;   दुर्गाणि    –    बाधाओं को   ;    मत्-प्रसादात्    –   मेरी कृपा से   ;     तरिष्यसि    –    तुम पार कर सकोगे   ;   अथ   –    लेकिन   ;   चेत्    –   यदि    ;    त्वम्   –    तुम   ;    अहङ्कारात्    –    मिथ्या अहंकार से    ;     न  श्रोष्यसि     –   नहीं सुनते हो ;     विनइक्ष्यसि    –   नष्ट हो जाओगे । 

यदि तुम मुझसे भावनाभावित होगे , तो मेरी कृपा से तुम बद्ध जीवन के सारे अवरोधों को लाँघ जाओगे । लेकिन यदि तुम मिथ्या अहंकारवश ऐसी चेतना में कर्म नहीं करोगे और मेरी बात नहीं सुनोगे , तो तुम विनष्ट हो जाओगे । 

तात्पर्य :- पूर्ण कृष्णभावनाभावित व्यक्ति अपने अस्तित्व के लिए कर्तव्य करने के विषय में आवश्यकता से अधिक उद्विग्न नहीं रहता । जो मूर्ख है , वह समस्त चिन्ताओं से मुक्त कैसे रहे , इस बात को नहीं समझ सकता । जो व्यक्ति कृष्णभावनामृत में कर्म करता है , भगवान् कृष्ण उसके घनिष्ठ मित्र बन जाते हैं ।

वे सदैव अपने मित्र की सुविधा का ध्यान रखते हैं ओर जो मित्र चौबीसों घंटे उन्हें प्रसन्न करने के लिए निष्ठापूर्वक कार्य में लगा रहता है , वे उसको आत्मदान कर देते हैं । अतएव किसी को देहात्मबुद्धि के मिथ्या अहंकार में नहीं वह जाना चाहिए । उसे झूठे ही यह नहीं सोचना चाहिए कि वह प्रकृति के नियमों से स्वतन्त्र है , या कर्म करने के लिए मुक्त है । वह पहले से कठोर भौतिक नियमों के अधीन है ।

लेकिन जैसे ही वह कृष्णभावनाभावित होकर कर्म करता है , तो वह भौतिक दुश्चिन्ताओं से मुक्त हो जाता है । मनुष्य को यह भलीभाँति जान लेना चाहिए कि जो कृष्णभावनामृत में सक्रिय नहीं है , वह जन्म – मृत्यु रूपी सागर के की भंवर में पड़कर अपना विनाश कर रहा है ।

कोई भी बद्धजीव यह सही सही नहीं जानता कि क्या करना है और क्या नहीं करना है , लेकिन जो व्यक्ति कृष्णभावनाभावित होकर कर्म अन्तर से करता है , वह कर्म करने के लिए मुक्त है , क्योंकि प्रत्येक किया हुआ कर्म कृष्ण द्वारा प्रेरित तथा गुरु द्वारा पुष्ट होता है ।

यदहङ्कारमाश्रित्य    न   योत्स्य   इति   मन्यसे । 

मिथ्येष  व्यवसायस्ते  प्रकृतिस्त्वां  नियोक्ष्यति ॥ ५९ ॥ 

यत्    –   यदि    ;    अहङ्कारम्     –    मिथ्या अहंकार की    ;     आश्रित्य   –    शरण लेकर    ;    न योत्स्ये    –     मैं नहीं लड़ेंगा   ;     इति   –    इस प्रकार    ;     मन्यसे    –     तुम सोचते हो    ; मिथ्या-एष    –     तो यह सब झूठ है    ;     व्यवसाय:     –    संकल्प    ;     ते    –   तुम्हारा    ; प्रकृतिः    –     भौतिक प्रकृति    ;     त्वाम्    –    तुमको    ;     नियोक्ष्यति    –     लगा लेगी । 

तुम यदि तुम मेरे निर्देशानुसार कर्म नहीं करते और युद्ध में प्रवृत्त नहीं होते कुमार्ग पर जाओगे । तुम्हें अपने स्वभाववश युद्ध में लगना होगा ।

तात्पर्य :- अर्जुन एक सैनिक था और क्षत्रिय स्वभाव लेकर जन्मा था । अतएव उसका स्वाभाविक कर्तव्य था कि वह युद्ध करे । लेकिन मिथ्या अहंकारवश वह डर रहा था कि अपने गुरु , पितामह तथा मित्रों का वध करके वह पाप का भागी होगा । वास्तव में वह अपने को अपने कर्मों का स्वामी जान रहा था , मानो वही ऐसे कमों के अच्छे बुरे फलों का निर्देशन कर रहा हो ।

वह भूल गया कि वहाँ पर साक्षात् भगवान् उपस्थित हैं और उसे युद्ध करने का आदेश दे रहे हैं । यही है वद्धजीव की विस्मृति । परमपुरुष निर्देश देते हैं कि क्या अच्छा है और क्या बुरा है और मनुष्य को जीवन – सिद्धि प्राप्त करने के लिए केवल कृष्णभावनामृत में कर्म करना है । कोई भी अपने भाग्य का निर्णय ऐसे नहीं कर सकता जैसे भगवान् कर सकते हैं ।

अतएव सर्वोत्तम मार्ग यही है कि परमेश्वर से निर्देश प्राप्त करके कर्म किया जाय । भगवान् या भगवान् के प्रतिनिधि स्वरूप गुरु के आदेश की वह कभी भी उपेक्षा न करे । भगवान् के आदेश को बिना किसी हिचक के पूरा करने के लिए वह कर्म करे इससे सभी परिस्थितियों में सुरक्षित रहा जा सकेगा । 

स्वभावजेन   कौन्तेय   निबद्धः   स्वेन   कर्मणा । 

कर्तुं  नेच्छसि  यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि  तत् ॥ ६० ॥  

स्वभाव-जेन    –    अपने स्वभाव से उत्पन्न    ;    कौन्तेय    –    हे कुन्तीपुत्र   ;    निबद्धः   –   बद्ध   ;     स्वेन    –     तुम अपने    ;     कर्मणा    – कार्यकलापों से    ;      कर्तुम्    –     करने के लिए    ;   न    –    नहीं    ;     इच्छसि   –     इच्छा करते हो    ;    यत्   –    जो   ;    मोहात्    –    मोह से    ; करिष्यसि     –    करोगे   ;    अवश:   –   अनिच्छा से    ;    अपि   –   भी    ;    तत्   –   वह । 

इस समय तुम मोहवश मेरे निर्देशानुसार कर्म करने से मना कर रहे हो । लेकिन हे कुन्तीपुत्र ! तुम अपने ही स्वभाव से उत्पन्न कर्म द्वारा बाध्य होकर वही सब करोगे । 

तात्पर्य :-  यदि कोई परमेश्वर के निर्देशानुसार कर्म करने से मना करता है , तो वह उन गुणों द्वारा कर्म करने के लिए बाध्य होता है , जिनमें वह स्थित होता है । प्रत्येक व्यक्ति प्रकृति के गुणों के विशेष संयोग के वशीभूत है और तदनुसार कर्म करता है । किन्तु जो स्वेच्छा से परमेश्वर के निर्देशानुसार कार्यरत होता है , वही गौरवान्वित होता है । 

ईश्वरः   सर्वभूतानां    हृद्देशेऽर्जुन    तिष्ठति । 

भ्रामयन्सर्वभूतानि   यन्त्रारूढानि   मायया ॥ ६१ ॥  

ईश्वरः    –    भगवान्    ;     सर्व  भूतानाम्    –    समस्त जीवों के   ;    हृत्  देशे   –    हृदय में   ;    अर्जुन    –    हे अर्जुन   ;    तिष्ठति   –    वास करता है    ; भ्रामयन्    –    भ्रमण करने के लिए बाध्य करता हुआ     ;      सर्व  भूतानि    –     समस्त जीवों को    ;    यन्त्र   –    यन्त्र में    ;   आरूढानि     –     सवार , चढ़े हुए    ;     मायया   –     भौतिक शक्ति के वशीभूत होकर । 

हे अर्जुन ! परमेश्वर प्रत्येक जीव के हृदय में स्थित हैं और भौतिक शक्ति से निर्मित यन्त्र में सवार की भाँति बैठे समस्त जीवों को अपनी माया से घुमा ( भरमा ) रहे है । 

तात्पर्य :-  अर्जुन परम ज्ञाता न था और लड़ने या न लड़ने का उसका निर्णय उसके क्षुद्र विवेक तक सीमित था । भगवान् कृष्ण ने उपदेश दिया कि जीवात्मा ( व्यक्ति ) ही सर्वेसर्वा नहीं है । भगवान् या स्वयं कृष्ण अन्तर्यामी परमात्मा रूप में हृदय में स्थित होकर जीव को निर्देश देते हैं । शरीर – परिवर्तन होते ही जीव अपने विगत कर्मों को भूल जाता है , लेकिन परमात्मा जो भूत , वर्तमान तथा भविष्य का ज्ञाता है , उसके समस्त कार्यों का साक्षी रहता है ।

अतएव जीवों के सभी कार्यों का संचालन इसी परमात्मा द्वारा होता है । जीव जितना योग्य होता है उतना ही पाता है और उस भौतिक शरीर द्वारा वहन किया जाता है , जो परमात्मा के निर्देश में भौतिक शक्ति द्वारा उत्पन्न किया जाता है । ज्याही जीव को किसी विशेष प्रकार के शरीर में स्थापित कर दिया जाता है , वह शारीरिक अवस्था के अन्तर्गत कार्य करना प्रारम्भ कर देता है ।

अत्यधिक तेज मोटरकार में बैठा व्यक्ति कम तेज कार में बैठे व्यक्ति से अधिक तेज जाता है , भले ही जीव अर्थात् चालक एक ही क्यों न हो । इसी प्रकार परमात्मा के आदेश से भौतिक प्रकृति एक विशेष प्रकार के जीव के लिए एक विशेष शरीर का निर्माण करती है , जिससे वह अपनी पूर्व इच्छाओं के अनुसार कर्म कर सके जीव स्वतन्त्र नहीं होता ।

मनुष्य को यह नहीं सोचना चाहिए कि वह भगवान् से स्वतन्त्र है । व्यक्ति तो सदैव भगवान् के नियन्त्रण में रहता है । अतएव उसका कर्तव्य है कि वह शरणागत हो और अगले श्लोक का यही आदेश है । 

तमेव      शरणं      गच्छ       सर्वभावेन      भारत । 

तत्प्रसादात्परां  शान्तिं  स्थानं  प्राप्स्यसि  शाश्वतम् ॥ ६२ ॥  

तम्    –    उसकी   ;     एव   –   निश्चय ही     ;      शरणम्  गच्छ    –    शरण में जाओ    ;    सर्व-भावेन     –    सभी प्रकार से     ;     भारत   –    हे भरतपुत्र ;   तत्  प्रसादात्    –    उसकी कृपा से    पराम्    –    दिव्य    ;     शान्तिम्   –    शान्ति को    ;    स्थानम्   –   धाम को    ;    प्राप्सयसि   – प्राप्त करोगे    ; शाश्वतम्    –    शाश्वत । 

हे भारत ! सब प्रकार से उसी की शरण में जाओ।उसकी कृपा से तुम परम शान्ति को तथा परम नित्यधाम को प्राप्त करोगे । 

तात्पर्य :-  अतएव जीव को चाहिए कि प्रत्येक हृदय में स्थित भगवान् की शरण ले । इससे इस संसार के समस्त प्रकार के दुखों से छुटकारा मिल जाएगा । ऐसी शरण पाने से मनुष्य न केवल इस जीवन के सारे कष्टों से छुटकारा पा सकेगा , अपितु अन्त में वह परमेश्वर के पास पहुँच जाएगा । वैदिक साहित्य में ( ऋग्वेद १.२२.२० ) दिव्य जगत् तद्विष्णो : परमं पदम् के रूप में वर्णित है ।

चूँकि सारी सृष्टि ईश्वर का राज्य है , अतएव इसकी प्रत्येक भौतिक वस्तु वास्तव में आध्यात्मिक है , लेकिन परमं पदम् विशेषतया नित्यधाम को बताता है , जो आध्यात्मिक आकाश या वैकुण्ठ कहलाता है । भगवद्गीता के पन्द्रहवें अध्याय में कहा गया है- सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टः भगवान् प्रत्येक जीव के हृदय में स्थित हैं ।

अतएव इस कथन कि मनुष्य अन्तःस्थित परमात्मा की शरण ले , का अर्थ है कि वह भगवान् कृष्ण की शरण ले । कृष्ण को पहले ही अर्जुन ने परम स्वीकार कर लिया है । दसवें अध्याय में उन्हें परम ब्रह्म परम धाम के रूप में स्वीकार किया जा चुका है । अर्जुन ने कृष्ण को भगवान् तथा समस्त जीवों के परम धाम के रूप में स्वीकार कर रखा है , इसलिए नहीं कि यह उसका निजी अनुभव है , वरन् इसलिए भी कि नारद , असित , देवल , व्यास जैसे महापुरुष इसके प्रमाण हैं ।

इति  ते  ज्ञानमाख्यातं  गुह्याद्गुह्यतरं  मया । 

विमृश्यैतदशेषेण    यथेच्छसि    तथा   कुरु ॥ ६३ ॥ 

इति    –    इस प्रकार    ;     ते   –   तुमको    ;     ज्ञानम्   –    ज्ञान   ;    आख्यातम्     –    वर्णन किया गया   ;      गुह्यात्     –    गुह्य से गुह्य    ;   तरम्   – अधिक गुह्य    ;    मया    –   मेरे द्वारा   ;    विमृश्य     –    मनन करके   ;    एतत्    –    इस     ;     अशेषेण   –    पूर्णतया    ;    यथा   –    जैसी   ;    इच्छसि –    इच्छा हो   ;     तथा    –   वैसा ही   ;    कुरु   –    करो । 

इस प्रकार मैंने तुम्हें गुह्यतर ज्ञान बतला दिया । इस पर पूरी तरह से मनन करो और तब जो चाहो सो करो । 

तात्पर्य :-  भगवान् ने पहले ही अर्जुन को ब्रह्मभूत ज्ञान वतला दिया है । जो इस ब्रह्मभूत अवस्था में होता है , वह प्रसन्न रहता है , न तो वह शोक करता है , न किसी वस्तु की कामना करता है । ऐसा गुह्यज्ञान के कारण होता है । कृष्ण परमात्मा का ज्ञान भी प्रकट करते हैं । यह ब्रह्मज्ञान भी है , लेकिन यह उससे श्रेष्ठ है ।

यहाँ पर यथेच्छसि तथा कुरु जैसी इच्छा हो वैसा करो – यह सूचित करता है कि ईश्वर जीव की यत्किंचित स्वतन्त्रता में हस्तक्षेप नहीं करता । भगवद्गीता में भगवान् ने सभी प्रकार से यह बतलाया है कि कोई अपनी जीवन दशा को किस प्रकार अच्छी बना सकता है । अर्जुन को उनका सर्वश्रेष्ठ उपदेश यह है कि हृदय में आसीन परमात्मा की शरणागत हुआ जाए ।

सही विवेक से मनुष्य को परमात्मा के आदेशानुसार कर्म करने के लिए तैयार होना चाहिए । इससे मनुष्य निरन्तर कृष्णभावनामृत में स्थित हो सकेगा , जो मानव जीवन की सर्वोच्च सिद्धि है । अर्जुन को भगवान् प्रत्यक्षतः युद्ध करने का आदेश दे रहे हैं । भगवत् शरणागत होना जीवों के सर्वाधिक हित में है ।

इसमें परमेश्वर का कोई हित नहीं है । शरणागत होने के पूर्व जहाँ तक बुद्धि काम करे मनुष्य को इस विषय पर मनन करने की छूट मिली है और भगवान् के आदेश को स्वीकार करने की यही सर्वोत्तम विधि है । ऐसा आदेश कृष्ण के प्रामाणिक प्रतिनिधिस्वरूप गुरु के माध्यम से भी प्राप्त होता है ।

सर्वगुह्यत       भूयः      शृणु     मे    परमं    वचः । 

इष्टोऽसि  मे  दृढमिति  ततो  वक्ष्यामि  ते  हितम् ॥ ६४ ॥  

सर्व-गुह्य-तमम्      –    सर्वो में अत्यन्त    ;     गुह्य    –   भूय  , पुन    ;     शृणु    –   सुनो    ;    मे   – मुझसे   ;     परमम्   –    परम   ;    वच:    –   आदेश    ; इष्टः असि   –    तुम प्रिय हो     ;    मे   –    मेरे    ;    दृढम्    –    अत्यन्त    ;    इति    –    इस प्रकार     ;   ततः     –   अतएव   ;    वक्ष्यामि   –     कह रहा हूँ    ;     ते    –   तुम्हारे    ;     हितम्    –    लाभ के लिए । 

चूँकि तुम मेरे अत्यन्त प्रिय मित्र हो , अतएव मैं तुम्हें अपना परम आदेश , जो सर्वाधिक गुह्यज्ञान है , बता रहा हूँ । इसे अपने हित के लिए सुनो । 

तात्पर्य :-  अर्जुन को गुह्यज्ञान ( ब्रह्मज्ञान ) तथा गुह्यतरज्ञान ( परमात्मा ज्ञान प्रदान करने के बाद भगवान् अब उसे गुह्यतम ज्ञान प्रदान करने जा रहे हैं – यह है भगवान् के • शरणागत होने का ज्ञान नवें अध्याय के अन्त में उन्होंने कहा था- मन्मना : – सदैव मेरा चिन्तन करो । उसी आदेश को यहाँ पर भगवद्गीता के सार के रूप में जोर देने के लिए दुहराया जा रहा है , यह सार सामान्यजन की समझ में नहीं आता ।

लेकिन जो कृष्ण को सचमुच अत्यन्त प्रिय है , कृष्ण का शुद्धभक्त है , वह समझ लेता है । सारे वैदिक साहित्य में यह सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण आदेश है । इस प्रसंग में जो कुछ कृष्ण कहते हैं , वह ज्ञान का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण अंश है और इसका पालन न केवल अर्जुन द्वारा होना चाहिए , अपितु समस्त जीवों द्वारा होना चाहिए । 

मन्मना  भव  मद्भक्तो  मद्याजी  मां  नमस्कुरु । 

मामेवैष्यसि  सत्यं  ते  प्रतिजाने  प्रियोऽसि  मे ॥ ६५ ॥ 

मत्-मनाः    –    मेरे विषय में सोचते हुए     ;     भव    –    होओ    ;    मत्-भक्त:    –    मेरा भक्त   ;     मत्-याजी    –     मेरा पूजक    ;     माम्    – मुझको   ;    नमस्कुरु    –     नमस्कार करो   ; माम्    –    मेरे पास    ;     एव   –   ही    ;     एष्यसि   –   आओगे    ;    सत्यम्   –   सच  सच    ;    ते     –    तुमसे   ;    प्रतिजाने   –    वायदा या प्रतिज्ञा करता हूँ     ;    प्रियः   –   प्रिय    ;    असि   – हो    ;    मे    –    मुझको । 

सदैव मेरा चिन्तन करो , मेरे भक्त बनो , मेरी पूजा करो और मुझे नमस्कार करो । इस प्रकार तुम निश्चित रूप से मेरे पास आओगे । मैं तुम्हें वचन देता हूँ , क्योंकि तुम मेरे परम प्रिय मित्र हो ।

तात्पर्य :-  ज्ञान का गुह्यतम अंश है कि मनुष्य कृष्ण का शुद्ध भक्त बने , सदेव उन्हीं का चिन्तन करे और उन्हीं के लिए कर्म करे । व्यावसायिक ध्यानी बनना ठीक नहीं । जीवन को इस प्रकार ढालना चाहिए कि कृष्ण का चिन्तन करने का सदा अवसर प्राप्त हो । मनुष्य इस प्रकार कर्म करे कि उसके सारे नित्य कर्म कृष्ण के लिए हों ।

वह अपने जीवन को इस प्रकार व्यवस्थित करे कि चौबीसों घण्टे कृष्ण का ही चिन्तन करता रहे और भगवान् की यह प्रतिज्ञा है कि जो इस प्रकार कृष्णभावनामय होगा , वह निश्चित रूप से कृष्णधाम को जाएगा जहाँ वह साक्षात् कृष्ण के सान्निध्य में रहेगा । यह गुह्यतम ज्ञान अर्जुन को इसीलिए बताया गया , क्योंकि वह कृष्ण का प्रिय मित्र ( सखा ) है ।

जो कोई भी अर्जुन के पथ का अनुसरण करता है , वह कृष्ण का प्रिय सखा बनकर अर्जुन जैसी ही सिद्धि प्राप्त कर सकता है । ये शब्द इस बात पर बल देते हैं कि मनुष्य को अपना मन उस कृष्ण पर एकाग्र करना चाहिए जो दोनों हाथों से वंशी धारण किये , सुन्दर मुखवाले तथा अपने वालों में मोर पंख धारण किये हुए साँवले बालक के रूप में हैं । कृष्ण का वर्णन ब्रह्मसंहिता तथा अन्य ग्रंथों में पाया जाता है ।

मनुष्य को परम ईश्वर के आदि रूप कृष्ण पर अपने मन को एकाग्र करना चाहिए । उसे अपने मन को भगवान् के अन्य रूपों की ओर नहीं मोड़ना चाहिए । भगवान् के नाना रूप हैं , यथा विष्णु , नारायण , राम , वराह आदि । किन्तु भक्त को चाहिए कि अपने मन को उस एक रूप पर केन्द्रित करे जो अर्जुन के समक्ष था । कृष्ण के रूप पर मन की यह एकाग्रता ज्ञान का गुह्यतम अंश है जिसका प्रकटीकरण अर्जुन के लिए किया गया , क्योंकि वह कृष्ण का अत्यन्त प्रिय सखा है । 

सर्वधर्मान्परित्यज्य      मामेकं     शरणं     व्रज  । 

अहं  त्वां  सर्वपापेभ्यो  मोक्षयिष्यामि  मा  शुचः ॥ ६६ ॥

सर्व-धर्मान्    –    समस्त प्रकार के धर्म     ;      परित्यज्य    –    त्यागकर   ;    माम्   –   मेरी    ;   एकम्    –    एकमात्र    ;     शरणम्    –   शरण में    ;     ब्रज    –   जाओ    ;    अहम्    –   में   ;     त्वाम्     –    तुमको    ;     सर्व    –   समस्त    ;    पापेभ्य:    –     पापों से     ;     मोक्षविष्यामि    – उद्धार करूंगा   ;     मा-मतः-शुचः    –    चिन्ता करो 

समस्त प्रकार के धर्मों का परित्याग करो और मेरी शरण में आओ । में समस्त पापों से तुम्हारा उद्धार कर दूँगा , डरो मत

तात्पर्य :-  भगवान् ने अनेक प्रकार के ज्ञान तथा धर्म की विधियाँ बताई है – परब्रह्म का ज्ञान , परमात्मा का ज्ञान , अनेक प्रकार के आश्रमों तथा वर्णों का ज्ञान , संन्यास का ज्ञान , अनासक्ति , इन्द्रिय तथा मन का संयम , ध्यान आदि का ज्ञान । उन्होंने अनेक प्रकार से नाना प्रकार के धर्मों का वर्णन किया है ।

अब , भगवद्गीता का सार प्रस्तुत करते हुए भगवान् कहते हैं कि हे अर्जुन ! अभी तक बताई गई सारी विधियों का परित्याग करके , अब केवल मेरी शरण में आओ । इस शरणागति से वह समस्त पापों से बच जाएगा , क्योंकि भगवान् स्वयं उसकी रक्षा का वचन दे रहे हैं । सातवें अध्याय में यह कहा गया था कि वही कृष्ण की पूजा कर सकता है , जो सारे पापों से मुक्त हो गया हो ।

इस प्रकार कोई यह सोच सकता है कि समस्त पापों से मुक्त हुए बिना कोई शरणागति नहीं पा सकता है । ऐसे सन्देह के लिए यहाँ यह कहा गया है कि कोई समस्त पापों से मुक्त न भी हो तो केवल श्रीकृष्ण के शरणागत होने पर स्वतः मुक्त कर दिया जाता है । पापों से मुक्त होने के लिए कठोर प्रयास करने की कोई आवश्यकता नहीं है ।

मनुष्य को बिना झिझक के कृष्ण को समस्त जीवों के रक्षक के रूप में स्वीकार कर लेना चाहिए । उसे चाहिए कि श्रद्धा तथा प्रेम से उनकी शरण ग्रहण करे । हरि भक्तिविलास में ( ११.६७६ ) कृष्ण की शरण ग्रहण करने की विधि का वर्णन हुआ है-  

आनुकूल्यस्य सङ्कल्पः प्रातिकूल्यस्य वर्जनम् । 

रक्षिष्यतीति विश्वासो गोतृत्वे   वरणं तथा । 

आत्मनिक्षेप कार्पण्ये  षड्वधा शरणागतिः ॥  

भक्तियोग के अनुसार मनुष्य को वही धर्म स्वीकार करना चाहिए , जिससे अन्ततः भगवद्भक्ति हो सके । समाज में अपनी स्थिति के अनुसार कोई एक विशेष कर्म कर सकता है , लेकिन यदि अपना कर्म करने से कोई कृष्णभावनामृत तक नहीं पहुंच पाता , तो उसके सारे कार्यकलाप व्यर्थ हो जाते हैं ।

जिस कर्म से कृष्णभावनामृत की पूर्णावस्था न प्राप्त हो सके उससे बचना चाहिए । मनुष्य को विश्वास होना चाहिए कि कृष्ण समस्त परिस्थितियों में उसकी सभी कठिनाइयों से रक्षा करेंगे । इसके विषय में सोचने की कोई आवश्यकता नहीं कि जीवन निर्वाह कैसे होगा ? कृष्ण इसको सँभालेंगे ।

मनुष्य को चाहिए कि वह अपने आप को निस्सहाय माने और अपने जीवन की प्रगति के लिए कृष्ण को ही अवलम्ब समझे । पूर्ण कृष्णभावनाभावित होकर भगवद्भक्ति में प्रवृत्त होते ही वह प्रकृति के समस्त कल्मष से मुक्त हो जाता है । धर्म की विविध विधियों हैं और ज्ञान , ध्यानयोग आदि जैसे शुद्ध करने वाले अनुष्ठान हैं , लेकिन जो कृष्ण के शरणागत हो जाता है , उसे इतने सारे अनुष्ठानों के पालन की आवश्यकता नहीं रह जाती ।

कृष्ण की शरण में जाने मात्र से वह व्यर्थ समय गँवाने से बच जाएगा । इस प्रकार वह तुरन्त सारी उन्नति कर सकता है और समस्त पापों से मुक्त हो सकता है । श्रीकृष्ण की सुन्दर छवि के प्रति मनुष्य को आकृष्ट होना चाहिए । उनका नाम कृष्ण इसीलिए पड़ा , क्योंकि वे सर्वाकर्षक हैं । जो व्यक्ति कृष्ण की सुन्दर , सर्वशक्तिमान छवि से आकृष्ट होता है , वह भाग्यशाली है ।

अध्यात्मवादी कई प्रकार के होते हैं कुछ निर्गुण ब्रह्म के प्रति आकृष्ट होते हैं , कुछ परमात्मा के प्रति लेकिन जो भगवान के साकार रूप के प्रति आकृष्ट होता है और इससे भी बढ़कर जो साक्षात् भगवान् कृष्ण के प्रति आकृष्ट होता है , वह सर्वोच्च योगी है । दूसरे शब्दों में , अनन्यभाव से कृष्ण की भक्ति गुह्यतम ज्ञान है और सम्पूर्ण गीता का यही सार है ।

अतएव कर्मयोगी , दार्शनिक , योगी तथा भक्त सभी अध्यात्मवादी कहलाते हैं , लेकिन इनमें से शुद्धभक्त ही सर्वश्रेष्ठ है । यहाँ पर मा शुचः ( मत डरो , मत झिझको , मत चिन्ता करो ) विशिष्ट शब्दों का प्रयोग अत्यन्त सार्थक है । मनुष्य को यह चिन्ता होती है कि वह किस प्रकार सारे धर्मों को त्यागे और एकमात्र कृष्ण की शरण में जाए , लेकिन ऐसी चिन्ता व्यर्थ है ।

भगवद गीता अध्याय 18.6~फलसहित भक्तिसहित कर्मयोग के विषय का वर्णन / Powerful Bhagavad Gita fal or bhakti karmyog Ch18.6
भगवद गीता अध्याय 18.6~फलसहित भक्तिसहित कर्मयोग के विषय का वर्णन
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