भगवद गीता अध्याय 11.7~भगवान द्वारा अपने चतुर्भुज और सौम्य रूप का और विश्वरूप के दर्शन की महिमा का वर्णन / Powerful Bhagavad Gita Chaturbhuj, vishavroop Ch11.7

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अध्याय ग्यारह (Chapter -11)

भगवद गीता अध्याय 11.7 में शलोक 47 से  शलोक 50 तक भगवान द्वारा अपने चतुर्भुज और सौम्य रूप का और विश्वरूप के दर्शन की महिमा का वर्णन !

श्रीभगवानुवाच 

मया      प्रसन्नेन      तवार्जुनेदं 

रूपं   परं   दर्शितमात्मयोगात् ।   

तेजोमयं         विश्वमनन्तमाद्यं

यन्मे   त्वदन्येन   न    दृष्टपूर्वम् ॥ ४७ ॥

श्रीभगवान्  उवाच   –    श्रीभगवान ने कहा    ;   मया   –   मेरे द्वारा   ;    प्रसन्नेन  –  प्रसन्न   ;   तब   –    तुमको   ;   अर्जुन   –  अर्जुन   ;   इदम्   –   इस   ;  रूपम्   –   रूप को  ;   परम्   –   दिव्य  ;   दर्शितम्    –    दिखाया गया  ;    आत्म-योगात्   –   अपनी अन्तरंगाशक्ति से   ;    तेजः मयम्   –  तेज से पूर्ण  ;     विश्वम्   –   समग्र ब्रह्माण्ड को   ;    अनन्तम्   –   असीम   ;   आद्यम्   –  आदि   ; यत्    –   जो   ;    मे   –   मेरा    ;     त्वत्  अन्येन    –    तुम्हारे अतिरिक्त अन्य के द्वारा   ;   न  दृष्ट-पूर्वम्    –    किसी ने पहले नहीं देखा । 

भगवान् ने कहा हे अर्जुन ! मैंने प्रसन्न होकर अपनी अन्तरंगा शक्ति के बल पर तुम्हें इस संसार में अपने इस परम विश्वरूप का दर्शन कराया है । इसके पूर्व अन्य किसी ने इस असीम तथा तेजोमय आदि – रूप को कभी नहीं देखा था । 

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तात्पर्य :-  अर्जुन भगवान के विश्वरूप को देखना चाहता था , अतः भगवान् कृष्ण ने अपने भक्त अर्जुन पर अनुकम्पा करते हुए उसे अपने तेजोमय तथा ऐश्वर्यमय विश्वरूप का दर्शन कराया । यह रूप सूर्य की भाँति चमक रहा था और इसके मुख निरन्तर परिवर्तित हो रहे थे ।

कृष्ण ने यह रूप अर्जुन की इच्छा को शान्त करने के लिए ही दिखलाया । यह रूप कृष्ण की उस अन्तरंगाशक्ति द्वारा प्रकट हुआ जो मानव कल्पना से परे है । अर्जुन से पूर्व भगवान् के इस विश्वरूप का किसी ने दर्शन नहीं किया था , किन्तु जब अर्जुन को यह रूप दिखाया गया तो स्वर्गलोक तथा अन्य लोकों के भक्त भी इसे देख सके ।

उन्होंने इस रूप को पहले नहीं देखा था , केवल अर्जुन के कारण वे इसे देख पा रहे थे । दूसरे शब्दों में , कृष्ण की कृपा से भगवान् के सारे शिष्य भक्त उस विश्वरूप का दर्शन कर सके , जिसे अर्जुन देख रहा था । किसी ने टीका की है कि जब कृष्ण सन्धि का प्रस्ताव लेकर दुर्योधन के पास गये थे , तो उसे भी इसी रूप का दर्शन कराया गया था ।

दुर्भाग्यवश दुर्योधन ने शान्ति प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया , किन्तु कृष्ण ने उस अपने कुछ रूप दिखाए थे । किन्तु वे रूप अर्जुन को दिखाये गये इस रूप से सर्वथा भिन्न थे । यह स्पष्ट कहा गया है कि इस रूप को पहले किसी ने भी नहीं देखा था । 

न      वेदयज्ञाध्ययनैर्न       दाने 

र्न   च    क्रियाभिर्न  तपोभिरुग्रैः ।

एवंरूपः   शक्य   अहं   नृलोके 

द्रष्टुम्    त्वदन्येन     कुरुप्रवीर ॥ ४८ ॥ 

न   –   कभी नहीं   ;    वेद-यज्ञ     –   यज्ञ द्वारा  ;   अध्ययनैः   –   या वेदों के अध्ययन से   ;   न   –   कभी नहीं   ;   दानेः  –  दान के द्वारा   ;    न  –   कभी नहीं  ;   च   –   भी   ;    क्रियाभिः   –   पुण्य कर्मों से   ;    न   –   कभी नहीं   ;    तपोभिः   –   तपस्या के द्वारा   ;    उग्रै:   –   कठोर   ;   एवम्-रूपः    –   इस रूप में   ;    शक्यः    –    समर्थ    ;    अहम्   –   मैं   ;    नृ-लोके    –   इस भौतिक जगत में  ;   द्रष्टुम्   –  देखे जाने में    ;   त्वत्   –   तुम्हारे अतिरिक्त   ; अन्येन   –   अन्य के द्वारा  ;    कुरु-प्रवीर   –    कुरु योद्धाओं में श्रेष्ठ । 

हे कुरुश्रेष्ठ ! तुमसे पूर्व मेरे इस विश्वरूप को किसी ने नहीं देखा , क्योंकि मैं न तो वेदाध्ययन के द्वारा , न यज्ञ , दान , पुण्य या कठिन तपस्या के द्वारा इस रूप में , इस संसार में देखा जा सकता हूँ । 

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तात्पर्य :-  इस प्रसंग में दिव्य दृष्टि को भलीभाँति समझ लेना चाहिए । तो यह दिव्य दृष्टि किसके पास हो सकती है ? दिव्य का अर्थ है देवी । जब तक कोई देवता के रूप में दिव्यता प्राप्त नहीं कर लेता , तब तक उसे दिव्य दृष्टि प्राप्त नहीं हो सकती । और देवता कौन है ?

वैदिक शास्त्रों का कथन है कि जो भगवान् विष्णु के भक्त हैं , वे देवता है ( विष्णुभक्ताः स्मृता देवा ) । जो नास्तिक है , अर्थात् जो विष्णु में विश्वास नहीं करते या जो कृष्ण के निर्विशेष अंश को परमेश्वर मानते हैं , उन्हें यह दिव्य दृष्टि नहीं प्राप्त हो सकती ।

ऐसा सम्भव नहीं है कि कृष्ण का विरोध करके कोई दिव्य दृष्टि भी प्राप्त कर सके । दिव्य बने बिना दिव्य दृष्टि प्राप्त नहीं की जा सकती । दूसरे शब्दों में , जिन्हें दिव्य दृष्टि प्राप्त है , वे भी अर्जुन की ही तरह विश्वरूप देख सकते हैं । 

भगवद्गीता में विश्वरूप का विवरण है । यद्यपि अर्जुन के पूर्व यह विवरण अज्ञात था , किन्तु इस घटना के बाद अब विश्वरूप का कुछ अनुमान लगाया जा सकता है । जो लोग सचमुच ही दिव्य हैं , वे भगवान् के विश्वरूप को देख सकते हैं ।

किन्तु कृष्ण का शुद्धभक्त बने बिना कोई दिव्य नहीं बन सकता । किन्तु जो भक्त सचमुच दिव्य प्रकृति के हैं , और जिन्हें दिव्य दृष्टि प्राप्त है , वे भगवान् के विश्वरूप का दर्शन करने के लिए उत्सुक नहीं रहते ।

जैसा कि पिछले श्लोक में कहा गया है , अर्जुन ने कृष्ण के चतुर्भुजी विष्णु रूप को देखना चाहा , क्योंकि विश्वरूप को देखकर वह सचमुच भयभीत हो उठा था । में इस श्लोक में कुछ महत्त्वपूर्ण शब्द हैं , यथा वेदयज्ञाध्ययनैः जो वेदों तथा यज्ञानुष्ठानों से सम्बन्धित विषयों के अध्ययन का निर्देश करता है ।

वेदों का अर्थ है , समस्त प्रकार का वैदिक साहित्य यथा चारों वेद ( ऋग , यजु , साम तथा अथर्व ) एवं अठारहों पुराण , सारे उपनिषद् तथा वेदान्त सूत्र मनुष्य इन सबका अध्ययन चाहे घर में करे या अन्यत्र इसी प्रकार यज्ञ विधि के अध्ययन करने के अनेक सूत्र हैं- कल्पसूत्र तथा मीमांसा – सूत्र ।

सुपात्र को दान देने के अर्थ में आया है ; जैसे वे लोग जो भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति में लगे रहते हैं , यथा ब्राह्मण तथा वैष्णव । इसी प्रकार क्रियाभिः शब्द अग्निहोत्र के लिए है और विभिन्न वर्णों के कर्मों का सूचक है ।

शारीरिक कष्टों को स्वेच्छा से अंगीकर करना तपस्या है । इस तरह मनुष्य भले ही इन सारे कार्यों – तपस्या , दान , वेदाध्ययन आदि को करे , किन्तु जब तक वह अर्जुन की भाँति भक्त नहीं होता , तब तक वह विश्वरूप का दर्शन नहीं कर सकता ।

निर्विशेषवादी भी कल्पना करते रहते हैं कि वे भगवान् के विश्वरूप का दर्शन कर रहे हैं , किन्तु भगवद्गीता से हम जानते हैं । कि निर्विशेषवादी भक्त नहीं हैं । फलतः वे भगवान् के विश्वरूप को नहीं देख पाते । ऐसे अनेक पुरुष हैं जो अवतारों की सृष्टि करते हैं । वे झूठे ही सामान्य व्यक्ति को अवतार मानते हैं , किन्तु यह मूर्खता है ।

हमें तो भगवद्गीता का अनुसरण करना चाहिए , अन्यथा पूर्ण आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्ति की कोई सम्भावना नहीं है । यद्यपि भगवद्गीता को भगवत्तत्व का प्राथमिक अध्ययन माना जाता है , तो भी यह इतना पूर्ण है कि कौन क्या है , इसका अन्तर बताया जा सकता है ।

छद्म अवतार के समर्थक यह कह सकते हैं कि उन्होंने भी ईश्वर के दिव्य अवतार विश्वरूप को देखा है , किन्तु यह स्वीकार्य नहीं , क्योंकि यहाँ पर यह स्पष्ट उल्लेख हुआ है कि कृष्ण का भक्त बने बिना ईश्वर के विश्वरूप को नहीं देखा जा सकता ।

अतः पहले कृष्ण का शुद्धभक्त बनना होता है , तभी कोई दावा कर सकता है कि यह विश्वरूप का दर्शन करा सकता है , जिसे उसने देखा है । कृष्ण का भक्त कभी भी छद्म अवतारों को या इनके अनुयायियों को मान्यता नहीं देता ।

मा  ते  व्यथा  मा  च  विमूढभावा 

दृष्ट्    रूपं      घोरमीदृङममेदम् ।   

व्यपेतभीः     प्रीतमनाः    पुनस्त्वं

तदेव      मे     रूपमिदं    प्रपश्य ॥ ४ ९ ॥ 

मा   –   न हो   ;    ते  –   तुम्हें   ;    व्यथा   –   पीड़ा , कष्ट  ;   मा  –   न हो   ;   च   –   भी  ;   विमूढ-भाव:   –   मोह  ;   दृष्ट्वा   –  देखकर  ;   रूपम्   –   रूप को    ;   घोरम्   –  भयानक  ;   ईदृक्   –   इस प्रकार का  ;   मम    –  मेरे  ;   इदम्   –   इस   ;   व्यपेत-भी:    –   सभी प्रकार के भय से मुक्त   ;   प्रीत-मनाः   –   प्रसन्न चित्त  ;   पुनः   –   फिर  ;   त्वम्   –   तुम    ;   तत्   – उस  ;   एव   –   इस प्रकार    ;    मे   –   मेरे  ;   रूपम्   –   रूप को   ;    इदम्   – इस    ;   प्रपश्य  – देखो

तुम मेरे इस भयानक रूप को देखकर अत्यन्त विचलित एवं मोहित हो गये हो । अब इसे समाप्त करता हूँ । हे मेरे भक्त ! तुम समस्त चिन्ताओं से पुनः मुक्त हो जाओ । तुम शान्त चित्त से अब अपना इच्छित रूप देख सकते हो । 

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तात्पर्य :-  भगवद्गीता के प्रारम्भ में अर्जुन अपने पूज्य पितामह भीष्म तथा गुरु द्रोण के वध के विषय में चिन्तित था । किन्तु कृष्ण ने कहा कि उसे अपने पितामह का वध करने से डरना नहीं चाहिए । जब कौरवों की सभा में धृतराष्ट्र के पुत्र द्रौपदी को विवस्त्र करना चाह रहे थे , तो भीष्म तथा द्रोण मौन थे , अतः कर्तव्यविमुख होने के कारण इनका वध होना चाहिए ।

कृष्ण ने अर्जुन को अपने विश्वरूप का दर्शन यह दिखाने के लिए कराया कि ये लोग अपने कुकृत्यों के कारण पहले ही मारे जा चुके हैं । यह दृश्य अर्जुन को इसलिए दिखलाया गया , क्योंकि भक्त शान्त होते हैं और ऐसे जघन्य कर्म नहीं कर सकते । विश्वरूप प्रकट करने का अभिप्राय स्पष्ट हो चुका था । अब अर्जुन कृष्ण के चतुर्भुज रूप को देखना चाह रहा था ।

अतः उन्होंने यह रूप दिखाया । भक्त कभी भी विश्वरूप देखने में रुचि नहीं लेता क्योंकि इससे प्रेमानुभूति का आदान – प्रदान नहीं हो सकता । भक्त या तो अपना पूजाभाव अर्पित करना चाहता है या दो भुजा वाले कृष्ण का दर्शन करना चाहता है जिससे वह भगवान् के साथ प्रेमाभक्ति का आदान – प्रदान कर सके । 

सञ्जय उवाच 

इत्यर्जुनं    वासुदेवस्तथोक्त्वा 

स्वकं  रूपं  दर्शयामास  भूयः । 

आश्वासयामास   च   भीतमेनं

भूत्वा  पुनः  सौम्यवपुर्महात्मा ॥ ५० ॥ 

सञ्जयः  उवाच   –   संजय ने कहा    ;    इति   –   इस प्रकार   ;   अर्जुनम्    –   अर्जुन को  ;   वासुदेव:   –   कृष्ण ने   ;     तथा   –   उस प्रकार से   ;  उक्त्वा – कहकर  ;   स्वकम्   –   अपना , स्वीय   ;   रूपम्    –   रूप को   ;    दर्शयाम्  आस    –   दिखलाया  ;   भूवः   –   फिर   ; आश्वासयाम्  आस   –   धीरज धराया   ;   च   –   भी   ;   भीतम्   –   भयभीत    ;    एनम्   –  उसको  ;   भूत्वा   –   होकर   ;   पुनः   –   फिर   ;   सौम्य  वपुः   –   सुन्दर रूप  ;   महा-आत्मा    –    महापुरुष । 

संजय ने धृतराष्ट्र से कहा – अर्जुन से इस प्रकार कहने के बाद भगवान् कृष्ण ने अपना असली चतुर्भुज रूप प्रकट किया और अन्त में दो भुजाओं वाला अपना रूप प्रदर्शित करके भयभीत अर्जुन को धैर्य बँधाया । 

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तात्पर्य :-  जब कृष्ण वसुदेव तथा देवकी के पुत्र रूप में प्रकट हुए तो पहले वे चतुर्भुज नारायण रूप में ही प्रकट हुए , किन्तु जब उनके माता – पिता ने प्रार्थना की तो उन्होंने सामान्य वालक का रूप धारण कर लिया ।

उसी प्रकार कृष्ण को ज्ञात था कि अर्जुन उनके चतुर्भुज रूप को देखने का इच्छुक नहीं है , किन्तु चूँकि अर्जुन ने उनको इस रूप में देखने की प्रार्थना की थी , अतः कृष्ण ने पहले अपना चतुर्भुज रूप दिखलाया और फिर वे अपने दो भुजाओं वाले रूप में प्रकट हुए । सौम्यवपुः शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है ।

इसका अर्थ है सुन्दर रूप । जब कृष्ण विद्यमान थे तो सारे लोग उनके रूप पर ही मोहित हो जाते थे और चूँकि कृष्ण इस विश्व के निर्देशक हैं , अतः उन्होंने अपने भक्त अर्जुन का भय दूर किया और पुनः उसे अपना सुन्दर ( सौम्य ) रूप दिखलाया ।

ब्रह्मसंहिता में ( ५.३८ ) कहा गया है- प्रेमाञ्जनच्छुरित भक्तिविलोचनेन – जिस व्यक्ति की आँखों में प्रेमरूपी अंजन लगा है , वही कृष्ण के सौम्यरूप का दर्शन कर सकता है । 

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