भगवद गीता – अध्याय 11.4 ~ अर्जुन द्वारा भगवान के विश्वरूप का देखा जाना और उनकी स्तुति का वर्णन  / Bhagwad Geeta Chapter -11  

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अध्याय ग्यारह  (Chapter -11)

भगवद गीता – अध्याय 11  में शलोक 15 से  शलोक 31 तक अर्जुन द्वारा भगवान के विश्वरूप का देखा जाना और उनकी स्तुति का वर्णन !

अर्जुन उवाच

पश्यामि   देवांस्तव   देव   देहे 

सर्वांस्तथा    भूतविशेषसङ्घान् ।

ब्रह्माणमीशं      कमलासनस्थ –

मृषींश्च  सर्वानुरगांश्च   दिव्यान् ॥ १५ ॥  

अर्जुनः  उवाच   –   अर्जुन ने कहा   ;   पश्यामि  –   देखता हूँ  ;   देवान्   –  समस्त देवताओं को   ;   तब   –  आपके  ;   देव  –   हे प्रभु  ;   देहे   –  शरीर में  ;   सर्वान्   –  समस्त   ;   तथा   –  भी  ;  भूत   –   जीव  ;   विशेष-सड्यान्   –   विशेष रूप से एकत्रित  ;   ब्रह्माणम्  –   ब्रह्मा को  ;   ईशम् –  शिव को   ;   कमल-आसन-स्थम्    –   कमल के ऊपर आसीन  ;   ऋषीन्   –   ऋषियों को   ;   च   –   भी  ;   सर्वान्  –  समस्त   ;   उरगान्   –   सर्पों को   ;   च   –  भी   ;   दिव्यान्  –  दिव्य । 

अर्जुन ने कहा हे भगवान् कृष्ण ! मैं आपके शरीर में सारे देवताओं तथा अन्य विविध जीवों को एकत्र देख रहा हूँ । मैं कमल पर आसीन ब्रह्मा , शिवजी तथा समस्त ऋषियों एवं दिव्य सर्पों को देख रहा हूँ । 

तात्पर्य :-  अर्जुन ब्रह्माण्ड की प्रत्येक वस्तु देखता है , अतः वह ब्रह्माण्ड के प्रथम प्राणी ब्रह्मा को तथा उस दिव्य सर्प को , जिस पर गर्भोदकशायी विष्णु ब्रह्माण्ड के अधोतल में शयन करते हैं , देखता है । इस शेष- शय्या के नाग को वासुकि भी कहते है । अन्य सर्पों को भी वासुकि कहा जाता है ।

अर्जुन गर्भोदकशायी विष्णु से लेकर कमललोक स्थित ब्रह्माण्ड के शीर्षस्थ भाग को जहाँ ब्रह्माण्ड के प्रथम जीव ब्रह्मा निवास करते हैं , देख सकता है । इसका अर्थ यह है कि अर्जुन आदि से अन्त तक की सारी वस्तुएँ अपने रथ में एक ही स्थान पर बैठे – बैठे देख सकता था । यह सब भगवान् कृष्ण की कृपा से ही सम्भव हो सका । 

अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं 

पश्यामि   त्वां   सर्वतोऽनन्तरूपम् । 

नान्तं    न    मध्यं   न   पुनस्तवादिं 

पश्यामि       विश्वेश्वर      विश्वरूप ॥ १६ ॥ 

अनेक   –   कई   ;   बाहु   –   भुजाएँ  ;   उदर   –  पेट   ;   वका   –  मुख  ;   नेत्रम्  –  आँखें   ; पश्यामि  –   देख रहा हूँ   ;   त्वाम्   –   आपको   ;   सर्वतः  –   चारों ओर   ;   अनन्त-रूपम्    – असंख्य रूप   ;    न  अन्तम्  –   अन्तहीन, कोई अन्त नहीं है    ;   न मध्यम्   –   मध्य रहित    ;   न पुनः   –   न फिर   ;    तव   –  आपका   ;   आदिम्   –   प्रारम्भ  ;    पश्यामि  –  देखता हूँ   ;   विश्व-ईश्वर    –   हे ब्रह्माण्ड के स्वामी   ;     विश्वरूप  –   ब्रह्माण्ड के रूप में । 

हे विश्वेश्वर , हे विश्वरूप ! मैं आपके शरीर में अनेकानेक हाथ , पेट , मुँह तथा आँखें देख रहा हूँ , जो सर्वत्र फैले हैं और जिनका अन्त नहीं है । आपमें न अन्त दीखता है , न मध्य और न आदि । 

तात्पर्य :- कृष्ण भगवान् हैं और असीम हैं , अतः उनके माध्यम से सब कुछ देखा जा सकता था ।

किरीटिनं      गदिनं      चक्रिणं    च 

तेजोराशिं     सर्वतो      दीप्तिमन्तम् । 

पश्यामि    त्वां    दुर्निरीक्ष्यं   समन्ता 

द्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम्           ॥ १७ ॥  

किरीटिनम्   –   मुकुट युक्त   ;   गदिनम्   –   गदा धारण किये    ;   चक्रिणम्   –   चक्र समेत  ;   च  –   तथा   ;    तेज:  राशिम्    –     तेज   ;    सर्वतः   –   चारों ओर  ;   दीप्ति-मन्तम्    –   प्रकाश युक्त    ;    पश्यामि   –   देखता हूँ  ;   त्वाम्  –   आपको   ;   दुर्निरीक्ष्यम्   –   देखने में कठिन   ; समन्तात्   –   सर्वत्र  ;   दीप्त-अनल   –   प्रज्ज्वलित अग्नि  ;   अर्क   –   सूर्य की   ;    द्युतिम्   –  धूप  ;   अप्रमेयम्   –   अनन्त । 

आपके रूप को उसके चकाचौंध तेज के कारण देख पाना कठिन है , क्योंकि वह प्रज्ज्वलित अग्नि की भाँति अथवा सूर्य के अपार प्रकाश की भाँति चारों ओर फैल रहा है । तो भी मैं इस तेजोमय रूप को सर्वत्र देख रहा हूँ , जो अनेक मुकुटों , गदाओं तथा चक्रों से विभूषित है । 

त्वमक्षरं         परमं          वेदितव्यं 

त्वमस्य   विश्वस्य     परं    निधानम् । 

त्वमव्ययः             शाश्वतधर्मगोप्ता

शाश्वतधर्मगोप्ता   पुरुषो   मतो   मे ॥ १८ ॥  

त्वम्   –   आप   ;    अक्षरम्   –  अच्युत   ;   परमम्   –   परम   ;   वेदितव्यम्   –   जानने योग्य  ;   त्वम्   –   आप  ;   अस्य   –  इस  ;   विश्वस्य   –   विश्व के  ;    परम्   –   परम   ;   निधानम्   – आधार    ;    त्वम्    –   आप   ;    अव्ययः  –   अविनाशी   ;   शाश्वत-धर्म-गोप्ता      –    शाश्वत धर्म के पालक   ;    सनातनः   –   शाश्वत   ;    त्वम्   –   आप   ;   पुरुष:   –    परमपुरुष  ;   मतः  मे   – मेरा मत है । 

आप परम आद्य ज्ञेय वस्तु हैं । आप इस ब्रह्माण्ड के परम आधार ( आश्रय ) हैं । आप अव्यय तथा पुराण पुरुष हैं । आप सनातन धर्म के पालक भगवान् हैं । यही मेरा मत है । 

अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्य-

मनन्तबाहुं              शशिसूर्यनेत्रम् । 

पश्यामि     त्वां     दीप्तहुताशवक्त्रंस्वतेजसा 

स्वतेजसा      विश्वमिदं         तपन्तम् ॥ १९॥ 

अनादि   –  आदिरहित   ;   मध्य   –   मध्य   ;   वीर्यम्   –   महिमा  ;   अनन्त   –  असीम  ;  अनन्त –  असंख्य   ;    बाहुम्   –   भुजाएँ   ;    शशि   –   चन्द्रमा  ;    सूर्य   –   तथा सूर्य   ;   नेत्रम्   –  आँखें  ;   पश्यामि  –   देखता हूँ  ;   त्वाम्   –   आपको   ;   दीप्त   –   प्रज्ज्वलित   ;   हुताश-वक्त्रम्  –    आपके मुख से निकलती अग्नि को  ;     स्व-तेजसा   –   अपने तेज से   ;   विश्वम्   –   विश्व को   ; इदम्   –   इस   ;    तपन्तम्   –   तपाते हुए

आप आदि , मध्य तथा अन्त से रहित हैं । आपका यश अनन्त है । आपकी असंख्य भुजाएँ हैं और सूर्य तथा चन्द्रमा आपकी आँखें हैं । मैं आपके मुख से प्रज्ज्वलित अग्नि निकलते और आपके तेज से इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को जलते हुए देख रहा हूँ । 

तात्पर्य :- भगवान् के षड्ऐश्धयों की कोई सीमा नहीं है । यहाँ पर तथा अन्यत्र भी पुनरुक्ति पाई जाती है , किन्तु शास्त्रों के अनुसार कृष्ण की महिमा की पुनरुक्ति कोई साहित्यिक दोष नहीं है । कहा जाता है कि मोहग्रस्त होने या परम आहह्लाद के समय या आश्चर्य होने पर कथनों की पुनरुक्ति हुआ करती है । यह कोई दोष नहीं है । 

द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं           हि

व्याप्तं   त्वयैकेन    दिशश्च   सर्वाः । 

दृष्ट्वाद्भुतं       रूपमुग्रं      तवेदं

लोकत्रयं    प्रव्यथितं     महात्मन् ॥ २०॥ 

द्यो   –   बाह्य आकाश से लेकर  ;   आ-पृथिव्योः   –   पृथ्वी तक   ;    इदम्   –   इस    ;    अन्तरम्   –    मध्य में  ;   हि   –   निश्चय ही   ;    व्याप्तम्   –   व्याप्त   ;     त्वया    –   आपके द्वारा   ;   एकेन  –   अकेला   ;   दिशः   –   दिशाएँ  ;   च   –  तथा   ;   सर्वा:   –  सभी   ;   दृष्ट्वा   –  देखकर  ;  अद्भुतम्   –   अद्भुत  ;   रूपम्   –  रूप को   ;    उग्रम्   –   भयानक   ;   तव   –   आपके  ;   इदम्   –   इस   ;    लोक   –   लोक   ;    त्रयम्   –   तीन   ;   प्रव्यथितम्    –   भयभीत , विचलित   ; महा-आत्मन्    –   हे महापुरुष 

यद्यपि आप एक हैं , किन्तु आप आकाश तथा सारे लोकों एवं उनके बीच के समस्त अवकाश में व्याप्त हैं । हे महापुरुष ! आपके इस अद्भुत तथा भयानक रूप को देखकर सारे लोक भयभीत हैं । 

तात्पर्य :- इस श्लोक में द्याव् – आ – पृथिव्योः ( धरती तथा आकाश के बीच का स्थान ) तथा लोकत्रयम् ( तीनों संसार ) महत्त्वपूर्ण शब्द हैं , क्योंकि ऐसा लगता है कि न केवल अर्जुन ने इस विश्वरूप को देखा , बल्कि अन्य लोकों के वासियों ने भी इसे देखा । अर्जुन द्वारा विश्वरूप का दर्शन स्वप्न न था । भगवान् ने जिन जिनको दिव्य दृष्टि प्रदान की , उन्होंने युद्धक्षेत्र में उस विश्वरूप को देखा । 

अमी    हि    त्वां   सुरसङ्घा    विशन्ति 

केचिद्धीताः       प्राञ्जलयो       गृणन्ति । 

स्वस्तीत्युक्त्वा          महर्षिसिद्धसङ्घाः 

स्तुवन्ति   त्वां   स्तुतिभिः   पुष्कलाभिः ॥ २१ ॥ 

अमी   –    वे सब   ;   हि   –    निश्चय ही   ;    त्वाम्   –   आपको   ;    सुर-सङ्घाः   –    देव समूह   ; विशन्ति    –   प्रवेश कर रहे हैं   ;   केचित्    –    उनमें से कुछ  ;    भीताः   –   भयवशः   ;   प्राञ्जलय:   –   हाथ जोड़े   ;     गृणन्ति   –    स्तुति कर रहे हैं    ;    स्वस्ति   –   कल्याण हो   ;    इति  –    इस प्रकार    ;   उक्त्वा   –   कहकर   ;    महा-ऋषि   –   महर्षिगण  ;    सिद्ध-सया:   –   सिद्ध लोग   ;    स्तुवन्ति   –   स्तुति कर रहे हैं   ;    त्वाम्   –   आपकी   ;   स्तुतिभिः   –   प्रार्थनाओं से  ;  पुष्कलाभिः   –   वैदिक स्तोत्रों से

देवों का सारा समूह आपकी शरण ले रहा है और आपमें प्रवेश कर रहा है । उनमें से कुछ अत्यन्त भयभीत होकर हाथ जोड़े आपकी प्रार्थना कर रहे हैं । महर्षियों तथा सिद्धों के समूह ” कल्याण हो ” कहकर वैदिक स्तोत्रों का पाठ करते हुए आपकी स्तुति कर रहे हैं । 

तात्पर्य :-  समस्त लोकों के देवता विश्वरूप की भयानकता तथा प्रदीप्त तेज से इतने भयभीत थे कि वे रक्षा के लिए प्रार्थना करने लगे । 

रुद्रादित्या   वसवो  ये  च   साध्या 

विश्वेऽश्विनी          मरुतश्चोष्मपाश्च । 

गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घा 

वीक्षन्ते   त्वां   विस्मिताश्चैव   सर्वे ॥ २२ ॥ 

रुद्र   –   शिव का रूप   ;   आदित्या:   –   आदित्यगण   ;   वसवः   –   सारे वसु  ;   ये   –    जो   ;    च   –   तथा   ;   साध्या:   –   साध्य  ;   मरुतः    –   मरुद्गण   ;   च   –   तथा   ;   उष्म-पाः   –  पितर   ;   विश्वे   –   विश्वेदेवता   ;   अश्विनी   –   अश्विनीकुमार  ;   च   –  तथा  ;   गन्धर्व  –   गन्धर्व  ;   यक्ष   –   यक्ष  ;   असुर   –   असुर  ;    सिद्ध   –   तथा सिद्ध देवताओं के  ;   सड्याः   –   समूह  ;   बीक्षन्ते  –   देख रहे हैं   ;   त्वाम्   –   आपको  ;    विस्मिताः   –   आश्चर्यचकित होकर  ;   च  –  भी  ;   एव   –    निश्चय ही   ;    सर्व   –   सब । 

शिव के विविध रूप , आदित्यगण , वसु , साध्य , विश्वेदेव , दोनों अश्विनीकुमार , मरुद्गण , पितृगण , गन्धर्व , यक्ष , असुर तथा सिद्धदेव सभी आपको आश्चर्यपूर्वक देख रहे हैं । 

रूपं          महत्ते        बहुवक्त्रनेत्रं 

महाबाहो              बहुबाहूरुपादम् । 

बहूदरं                    बहुदंष्ट्राकरालं

दृष्ट्वा   लोकाः   प्रव्यथितास्तथाहम् ॥ २३ ॥ 

रूपम्   –   रूप   ;   महत्   –   विशाल  ;   ते   –   आपका  ;   बहु  –   अनेक  ;   वक्त्र   –   मुख   ; नेत्रम्   –   तथा आँखें  ;   महा बाहो   –   हे बलिष्ठ भुजाओं वाले   ;   बहु  –   अनेक  ;   बाहु   –   भुजाएँ   ;   ऊरु    –   जाँघे   ;    पादम्   –   तथा पाँव   ;    बहु-उदरम्    –   अनेक पेट   ;   बहु-दंष्ट्रा   –     अनेक दाँत   ;     करालम्   –   भयानक  ;   दृष्ट्वा   –   देखकर   ;   लोका:   –    सारे लोक  ;   प्रव्यचिताः   –   विचलित  ;   तथा  –   उसी प्रकार  ;   अहम्  –   में । 

हे महाबाहु ! आपके इस अनेक मुख , नेत्र , बाहु , जंघा , पाँव , पेट तथा भयानक दाँतों वाले विराट रूप को देखकर देवतागण सहित सभी लोक अत्यन्त विचलित हैं और उन्हीं की तरह में भी हूँ । 

नभःस्पृशं             दीप्तमनेकवर्णं 

व्यात्ताननं         दीप्तविशालनेत्रम् ।

दृष्ट्वा   हि  त्वां   प्रव्यथितान्तरात्मा 

धृतिं  न  विन्दामि  शमं  च  विष्णो ॥ २४ ॥ 

नभःस्पृशम्   –   आकाश छूता हुआ   ;    दीप्तम्   –   ज्योतिर्मय   ;   अनेक   –  कई  ;   वर्णम्   –  रंग   ;   व्यात   –   खुले हुए   ;   आननम्   –   मुख  ;  दीप्त   –   प्रदीप्त  ;   विशाल   –   वडी – बड़ी  ;   नेत्रम्   –   आँखें  ;   दृष्ट्वा   –  देखकर   ;   हि   –   निश्चय ही  ;   त्वाम्   –  आपको   ;   प्रव्यथितः  –    विचलित  , भयभीत ;    अन्तः   –   भीतर   ;   आत्मा   –   आत्मा  ;   धृतिम्  –   दृढता या धैर्य को  ;   न   –   नहीं  ;   विन्दामि  –  प्राप्त हूँ  ;   शमम्   –   मानसिक शान्ति को  ;   च   –   भी  ;   विष्णो   –   हे विष्णु  । 

हे सर्वव्यापी विष्णु ! नाना ज्योतिर्मय रंगों से युक्त आपको आकाश का स्पर्श करते , मुख फैलाये तथा बड़ी – बड़ी चमकती आँखें निकाले देखकर भय से मेरा मन विचलित है । मैं न तो धैर्य धारण कर पा रहा हूँ , न मानसिक संतुलन ही पा रहा हूँ । 

दंष्ट्राकरालानि    च   ते    मुखान 

दृष्ट्दैव         कालानलसन्निभानि । 

दिशो  न  जाने  न  लभे  च  शर्म 

प्रसीद        देवेश      जगन्निवास ॥ २५ ॥  

दंष्ट्रा   –   दाँत   ;    करालानि   –   विकराल  ;   च   –   भी   ;   ते   –  आपके  ;   मुखानि   –   मुखों को   ;    दृष्ट्वा   –   देखकर  ;   एव   –   इस प्रकार  ;   काल-अनल   –   प्रलय की  ;   सन्नि-भानि   –   मानो  ;   दिशः   –   दिशाएँ  ;   न  –  नहीं  ;   जाने   –   जानता हूँ   ;  न  –  नहीं  ;   लभे  –  प्राप्त करता हूँ  ;   च   –  तथा   ;    शर्म  –  आनन्द   ;   प्रसीद   –   प्रसन्न हों   ;    देव-ईश   –   हे देवताओं के स्वामी   ;    जगत्-निवास    –   हे समस्त जगतों के आश्रय

हे देवेश ! हे जगन्निवास ! आप मुझ पर प्रसन्न हो । मैं इस प्रकार से आपके प्रलयाग्नि स्वरूप मुखों को तथा विकराल दाँतों को देखकर अपना सन्तुलन नहीं रख पा रहा । मैं सब ओर से मोहग्रस्त हो रहा हूँ । 

अमी  च   त्वां  धृतराष्ट्रस्य   पुत्राः 

सर्वे            सहेवावनिपालसङ्घैः । 

भीष्मो    द्रोणः   सूतपुत्रस्तथासौ 

सहास्मदीयैरपि          योधमुख्यैः ॥ २६ ॥  

वक्त्राणि   ते  त्वरमाणा  विशन्ति 

दंष्ट्राकरालानि          भयानकानि । 

केचिद्विलग्ना             दशनान्तरेषु 

सन्दृश्यन्ते          चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः ॥ २७ ॥  

अमी   –   ये    ;   च   –   भी    ;   त्वाम्   –   आपको  ;    धृतराष्ट्रस्य    –    धृतराष्ट्र के  ;   पुत्राः   –  पुत्र   ;   सर्व   –   सभी  ;   सह   –   सहित   ;    एव   –   निस्सन्देह   ;   अवनि-पाल   –   वीर राजाओं के   ;   सङ्घः   –   समूह   ;    भीष्मः   –   भीष्मदेव   ;    अस्मदीये:   –   हमारे  ;    द्रोण:   – द्रोणाचार्य    ;     सूत-पुत्रः   –    कर्ण  ;    तथा   –  भी   ;  असो  –  वह  ;    सह   –   साथ  ;   अपि   –    भी   ;    योध-मुख्यैः   –    मुख्य योद्धा   ;   वक्त्राणि   –   मुखों में   ;   ते   –   आपके  ;   त्वरमाणा:   –   तेजी से    ;    विशन्ति   –   प्रवेश कर रहे हैं   ;    दंष्ट्रा   –   दाँत   ;   करालानि    – विकराल  ;   भयानकानि   –   भयानक  ;     केचित्   –   उनमें से कुछ    ;     विलग्नाः   –   लगे रहकर  ;   दशन-अन्तरेषु   –  दाँतों के बीच में  ;    सन्दृश्यन्ते   –  दिख रहे हैं   ;   चूर्णितः   –   चूर्ण हुए   ;    उत्तम-अङ्गैः    –   शिरों से । 

धृतराष्ट्र के सारे पुत्र अपने समस्त सहायक राजाओं सहित तथा भीष्म , द्रोण , कर्ण एवं हमारे प्रमुख योद्धा भी आपके विकराल मुख में प्रवेश कर रहे हैं । उनमें से कुछ के शिरों को तो मैं आपके दाँतों के बीच चूर्णित हुआ देख रहा हूँ । 

तात्पर्य :-  एक पिछले श्लोक में भगवान् ने अर्जुन को वचन दिया था कि यदि वह कुछ देखने का इच्छुक हो तो वे उसे दिखा सकते हैं । अब अर्जुन देख रहा है कि विपक्ष के नेता ( भीष्म , द्रोण , कर्ण तथा धृतराष्ट्र के सारे पुत्र ) तथा उनके सैनिक और अर्जुन के भी सैनिक विनष्ट हो रहे हैं ।

यह इसका संकेत है कि कुरुक्षेत्र में एकत्र समस्त व्यक्तियों की मृत्यु के बाद अर्जुन विजयी होगा । यहाँ यह भी उल्लेख है कि भीष्म भी , जिन्हें अजेय माना जाता है , ध्वस्त हो जायेंगे । वही गति कर्ण की होनी है । न केवल विपक्ष के भीष्म जैसे महान योद्धा विनष्ट हो जाएँगे , अपितु अर्जुन के पक्ष वाले कुछ महान योद्धा भी नष्ट होंगे । 

यथा    नदीनां     बहवोऽम्बुवेगा: 
समुद्रमेवाभिमुखा           द्रवन्ति । 
तथा       तवामी     नरलोकवीरा 
विशन्ति    वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति ॥ २८ ॥ 

यथा    –   जिस प्रकार   ;    नदीनाम्   –  नदियों की    ;   बहवः   –   अनेक  ;   अम्बु-वेगा:    –  जल की तरंगें   ;   समुद्रम्   –   समुद्र  ;   एव  –   निश्चय ही   ;   अभिमुखाः   –   की ओर   ;   द्रवन्ति    – दौड़ती हैं  ;    तथा  –   उसी प्रकार से   ;   तव   –   आपके   ;   अमी  –   ये सव   ;    नर-लोक-वीराः   –   मानव समाज के राजा    ;     विशन्ति   –   प्रवेश कर रहे हैं     ;    वक्त्राणि    –    मुखों में  ;    अभिविज्वलन्ति   –    प्रज्ज्वलित हो रहे हैं । 

जिस प्रकार नदियों की अनेक तरंगें समुद्र में प्रवेश करती हैं , उसी प्रकार ये समस्त महान योद्धा भी आपके प्रज्ज्वलित मुखों में प्रवेश कर रहे हैं । 

यथा    प्रदीप्तं    ज्वलनं   पतङ्गा 
विशन्ति    नाशाय     समृद्धवेगाः । 
तथैव   नाशाय   विशन्ति  लोका-
स्तवापि    वक्त्राणि   समृद्धवेगाः ॥ २ ९ ॥  

यथा   –    जिस प्रकार  ;    प्रदीप्तम्   –   जलती हुई   ;    ज्वलनम्   –   अग्नि में  ;    पतङ्गाः   –  पतिंगे , कीड़े मकोड़े  ;    विशन्ति   –   प्रवेश करते हैं   ;    नाशाय   –   विनाश के लिए   ;   समृद्ध   –    पूर्ण   ;    वेगा:   –   वेग   ;    तथा  एव   –   उसी प्रकार से   ;     नाशाय    –   विनाश के लिए  ;   विशन्ति    –    प्रवेश कर रहे हैं   ;    लोका:   –   सारे लोग   ;    तब   –   आपके   ;    अपि   –   भी   ;    वक्त्राणि   –   मुखों में    ;    समृद्ध  वेगा:   –   पूरे वेग से । 

मैं समस्त लोगों को पूर्ण वेग से आपके मुख में उसी प्रकार प्रविष्ट होते देख रहा हूँ , जिस प्रकार पतिंगे अपने विनाश के लिए प्रज्ज्वलित अग्नि में कूद पड़ते हैं । 

लेलिसे       ग्रसमानः      समन्ता –
ल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः 
तेजोभिरापूर्य             जगत्समग्रं 
भासस्तवोग्राः   प्रतपन्ति   विष्णो ॥ ३० ॥ 

लेलिसे   –    चाट रहे हैं    ;    ग्रसमानः   –   निगलते हुए  ;   समन्तात्   –   समस्त दिशाओं से   ; लोकान्   –   लोगों को   ;    समग्रान्   –   सभी   ;    वदनेः  –   मुखों से   ;   ज्वलद्भिः   –   जलते हुए ;   तेजोभिः   –   तेज से  ;   आपूर्य   –    आच्छादित करके   ;    जगत्   –    ब्रह्माण्ड को    ;   समग्रम् –    समस्त   ;    भासः   –   किरणें  ;   तव   –   आपकी   ;   उग्रा:   –   भयंकर   ;   प्रतपन्ति   – झुलसा रही हैं   ;     विष्णो   –     हे विश्वव्यापी भगवान् । 

हे विष्णु ! मैं देखता हूँ कि आप अपने प्रज्ज्वलित मुखों से सभी दिशाओं के लोगों को निगले जा रहे हैं । आप सारे ब्रह्माण्ड को अपने तेज से आपूरित करके अपनी विकराल झुलसाती किरणों सहित प्रकट हो रहे हैं । 

आख्याहि   मे   को   भवानुग्ररूपो 
नमोऽस्तु     ते     देववर      प्रसीद । 
विज्ञातुमिच्छामि          भवन्तमाद्यं 
न   हि    प्रजानामि   तव   प्रवृत्तिम् ॥ ३१ ॥ 

आख्याहि   –   कृपया बताएँ   ;   मे  –   मुझको   ;    कः  –  कौन   ;    भवान्   –   आप   उग्र-रूपः   –    भयानक रूप    ;    नमः-अस्तु   –   नमस्कार हो   ;    ते   –   आपको    ;    देव-वर    –   हे देवताओं में श्रेष्ठ   ;     प्रसीद    –   प्रसन्न हों   ;    विज्ञातुम्   –   जानने के लिए   ;     इच्छामि  –   इच्छुक हूँ  ;    भवन्तम्   –   आपको  ;    आद्यम्   –   आदि  ;   न   –   नहीं   ;    हि   –   निश्चय ही   ; प्रजानामि   –    जानता हूँ    ;    तब    –   आपका  ;    प्रवृत्तिम्  –  प्रयोजन

हे देवेश ! कृपा करके मुझे बतलाइये कि इतने उग्ररूप में आप कौन हैं ? मैं आपको नमस्कार करता हूँ , कृपा करके मुझपर प्रसन्न हों । आप आदि – भगवान् हैं । मैं आपको जानना चाहता हूँ , क्योंकि मैं नहीं जान पा रहा हूँ कि आपका प्रयोजन क्या है ।

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