भगवद गीता – अध्याय 11.2 ~ भगवान द्वारा अपने विश्व रूप का वर्णन  / Bhagwad Geeta Chapter -11

अध्याय ग्यारह  (Chapter -10)

भगवद गीता – अध्याय 11  में शलोक 05 से  शलोक 08 तक भगवान द्वारा अपने विश्व रूप का वर्णन !

श्रीभगवानुवाच

पश्य  मे  पार्थ  रूपाणि  शतशोऽथ  सहस्त्रशः । 

        नानाविधानि   दिव्यानि  नानावर्णाकृतीनि   च ॥ ५ ॥ 

श्रीभगवान्  उवाच    –    भगवान् ने कहा   ;    पश्य  –  देखो  ;     मे  –  मेरा   ;   पार्थ    –  हे पृथापुत्र   ;    रूपाणि   –   रूप   ;    शतश:   –   सैकड़ों  ;   अथ  –   भी   ;   सहस्वशः  –   हजारों  ;   नाना-विधानि   –   नाना रूप बाले   ;    दिव्यानि   –  दिव्य   ;   नाना  –  नाना प्रकार के   ;   वर्ण –   रंग  ;   आकृतीनि –   रूप   ;    च   –   भी । 

भगवान् ने कहा- हे अर्जुन , हे पार्थ ! अब तुम मेरे ऐश्वर्य को , सैकड़ों हजारों प्रकार  के देवी तथा विविध रंगों वाले रूपों को देखो । 

तात्पर्य :- अर्जुन कृष्ण के विश्वरूप का दर्शनाभिलाषी था , जो दिव्य होकर भी दृश्य जगत् के लाभार्थ प्रकट होता है । फलतः वह प्रकृति के अस्थाई काल द्वारा प्रभावित है । जिस प्रकार प्रकृति ( माया ) प्रकट – अप्रकट है , उसी तरह कृष्ण का यह विश्वरूप भी प्रकट तथा अप्रकट होता रहता है ।

यह कृष्ण के अन्य रूपों की भाँति वैकुण्ठ में नित्य नहीं रहता । जहाँ तक भक्त की बात है , वह विश्वरूप देखने के लिए तनिक भी इच्छुक नहीं रहता , लेकिन चूंकि अर्जुन कृष्ण को इस रूप में देखना चाहता था , अतः वे यह रूप प्रकट करते हैं । सामान्य व्यक्ति इस रूप को नहीं देख सकता । श्रीकृष्ण द्वारा शक्ति प्रदान किये जाने पर ही इसके दर्शन हो सकते हैं । 

पश्यादित्यान्वसून्रुद्रानश्विनौ      मरुतस्तथा । 

       बहून्यदृष्टपूर्वाणि     पश्याश्चर्याणि     भारत ॥ ६ ॥ 

पश्य   –   देखो   ;   आदित्यान्    –   अदिति के बारहों पुत्रों को   ;    वसून्   –   आठों वसुओं को   ;  रुद्रान्    –    रुद्र के ग्यारह रूपों को   ;   अश्विनो   –   दो अश्विनी कुमारों को    ;    मरुतः   –   उञ्चासों मरुतों को   ;    तथा   –  भी   ;    बहूनि   –  अनेक  ;   अदृष्ट  –  न देखे हुए  ;    पूर्वाणि    – पहले , इसके पूर्व   ;   पश्य   –   देखो   ;   आश्चर्याणि   –   समस्त आश्चर्यो को  ;   भारत   –   हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ  ।

 हे भारत ! लो , तुम आदित्यों , वसुओं , रुद्रों , अश्विनीकुमारों तथा अन्य देवताओं के विभिन्न रूपों को यहाँ देखो । तुम ऐसे अनेक आश्चर्यमय रूपों को देखो , जिन्हें पहले किसी ने न तो कभी देखा है , न सुना है । 

तात्पर्य :- यद्यपि अर्जुन कृष्ण का अन्तरंग सखा तथा अत्यन्त विद्वान था , तो भी वह उनके विषय में सब कुछ नहीं जानता था । यहाँ पर यह कहा गया है कि इन समस्त रूपों को न तो मनुष्यों ने इसके पूर्व देखा है , न सुना है । अब कृष्ण इन आश्चर्यमय रूपों को प्रकट कर रहे हैं ।

इहैकस्थं   जगत्कृत्स्नं   पश्याद्य   सचराचरम् । 

       मम  देहे  गुडाकेश  यच्चान्यद्  द्रष्टुमिच्छसि ॥ ७ ॥ 

 

इह   –   इसमें    ;    एक-स्थम्   –   एक स्थान में   ;   जगत्  –  ब्रह्माण्ड  ;   कृत्स्नम्   –  पूर्णतया  ;   पश्य   –   देखो  ;   अद्य  –   तुरन्त   ;    स    –   सहित   ;  चर   –   जंगम   ;   अचरम्   –   तथा अचर , जड़  ;   मम  –   मेरे  ;    देहे   –  शरीर में  ;     गुडाकेश   –   हे अर्जुन  ;   यत्   –   जो   ;   च   –   भी   ;  अन्यत्  –  अन्य , और  ;   द्रष्टुम्   –   देखना   ;    इच्छसि   –  चाहते हो । 

हे अर्जुन ! तुम जो भी देखना चाहो , उसे तत्क्षण मेरे इस शरीर में देखो । तुम इस समय तथा भविष्य में भी जो भी देखना चाहते हो , उसको यह विश्वरूप दिखाने वाला है । यहाँ एक ही स्थान पर चर – अचर सब कुछ । 

तात्पर्य :- कोई भी व्यक्ति एक स्थान में बैठे – बैठे सारा विश्व नहीं देख सकता । यहाँ तक कि बड़े से बड़ा वैज्ञानिक भी यह नहीं देख सकता कि ब्रह्माण्ड के अन्य भागों में क्या हो रहा है । किन्तु अर्जुन जैसा भक्त यह देख सकता है कि सारी वस्तुएँ जगत् में कहाँ कहाँ स्थित हैं । कृष्ण उसे शक्ति प्रदान करते हैं , जिससे वह भूत , वर्तमान तथा भविष्य , जो कुछ देखना चाहे , देख सकता है । इस तरह अर्जुन कृष्ण के अनुग्रह से सारी वस्तुएँ देखने में समर्थ है । 

न   तु   मां   शक्यसे   द्रष्टुमनेनैव   स्वचक्षुषा । 

       दिव्यं  ददामि  ते   चक्षुः  पश्य  मे  योगमैश्वरम् ॥ ८ ॥ 

न   –   कभी नहीं   ;    तु   –   लेकिन   ;   माम्   –   मुझको   ;   शक्यसे   –   तुम समर्थ होगे   ;   द्रष्टुम्   –    देखने में  ;    अनेन   –   इन   ;   एव   –   निश्चय ही    ;  स्व-चक्षुषा   –   अपनी आँखों से  ;    दिव्यम्   –   दिव्य  ;    ददामि  –   देता हूँ   ;   ते   –   तुमको  ;   चक्षुः  –   आँखें  ;   पश्य  –   देखो  ;   मे  –  मेरी   ; योगम्  ऐश्वरम्   –   अचिन्त्य योगशक्ति । 

किन्तु तुम मुझे अपनी इन आँखों से नहीं देख सकते । अतः मैं तुम्हें दिव्य आँखें दे रहा हूँ । अब मेरे योग ऐश्वर्य को देखो ।

तात्पर्य :- शुद्धभक्त कृष्ण को , उनके दोभुजी रूप के अतिरिक्त , अन्य किसी भी रूप में देखने की इच्छा नहीं करता । भक्त को भगवत्कृपा से ही उनके विराट रूप का दर्शन दिव्य चक्षुओं ( नेत्रों ) से करना होता है , न कि मन से । कृष्ण के विराट रूप का दर्शन करने के लिए अर्जुन से कहा जाता है कि वह अपने मन को नहीं , अपितु दृष्टि को बदले ।

कृष्ण का यह विराट रूप कोई महत्त्वपूर्ण नहीं है , यह बाद के श्लोकों से पता चल जाएगा । फिर भी , चूँकि अर्जुन इसका दर्शन करना चाहता था , अतः भगवान् ने उसे इस विराट रूप को देखने के लिए विशिष्ट दृष्टि प्रदान की । जो भक्त कृष्ण के साथ दिव्य सम्बन्ध से बँधे हैं , वे उनके ऐश्वयों के ईश्वरविहीन प्रदर्शनों से नहीं , अपितु उनके प्रेममय स्वरूपों से आकृष्ट होते हैं ।

कृष्ण के वालसंगी , कृष्ण के सखा तथा कृष्ण के माता – पिता यह कभी नहीं चाहते कि कृष्ण उन्हें अपने ऐश्वयों का प्रदर्शन कराएँ । वे तो शुद्ध प्रेम में इतने निमग्न रहते हैं कि उन्हें पता ही नहीं चलता कि कृष्ण भगवान् हैं । वे प्रेम के आदान – प्रदान में इतने विभोर रहते हैं कि वे भूल जाते हैं कि श्रीकृष्ण परमेश्वर हैं ।

श्रीमद्भागवत में कहा गया है कि कृष्ण के साथ खेलने वाले बालक अत्यन्त पवित्र आत्माएँ हैं और कृष्ण के साथ इस प्रकार खेलने का अवसर उन्हें अनेकानेक जन्मों के बाद प्राप्त हुआ है । ऐसे बालक यह नहीं जानते कि कृष्ण भगवान् हैं । वे उन्हें अपना निजी मित्र मानते हैं । अतः शुकदेव गोस्वामी यह श्लोक सुनाते हैं-

इत्थं      सतां     ब्रह्म-सुखानुभूत्या

दास्यं         गतानां       परदैवतेन ।

मायाश्रितानां             नरदारकेण

साकं    विजह्रुः    कृत-पुण्य-पुञ्जाः ।।

“ यह वह परमपुरुष है , जिसे ऋषिगण निर्विशेष ब्रह्म करके मानते हैं , भक्तगण भगवान् मानते हैं और सामान्यजन प्रकृति से उत्पन्न हुआ मानते हैं । ये बालक , जिन्होंने अपने पूर्वजन्मों में अनेक पुण्य किये हैं , अब उसी भगवान् के साथ खेल रहे हैं । ”

( श्रीमद्भागवत १०.१२.११ ) । तथ्य तो यह है कि भक्त विश्वरूप को देखने का इच्छुक नहीं रहता , किन्तु अर्जुन कृष्ण के कथनों की पुष्टि करने के लिए विश्वरूप का दर्शन करना चाहता था , जिससे भविष्य में लोग यह समझ सकें कि कृष्ण न केवल सैद्धान्तिक या दार्शनिक रूप से अर्जुन के समक्ष प्रकट हुए , अपितु साक्षात् रूप में प्रकट हुए थे ।

अर्जुन को इसकी पुष्टि करनी थी , क्योंकि अर्जुन से ही परम्परा – पद्धति प्रारम्भ होती है । जो लोग वास्तव में भगवान् को समझना चाहते हैं और अर्जुन के पदचिन्हों का अनुसरण करना चाहते हैं , उन्हें यह जान लेना चाहिए कि कृष्ण न केवल सैद्धान्तिक रूप में , अपितु वास्तव में अर्जुन के समक्ष परमेश्वर के रूप में प्रकट हुए ।

भगवान् ने अर्जुन को अपना विश्वरूप देखने के लिए आवश्यक शक्ति प्रदान की , क्योंकि वे जानते थे कि अर्जुन इस रूप को देखने के लिए विशेष इच्छुक न था , जैसा कि हम पहले बतला चुके हैं ।

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