भगवद गीता – अध्याय 10.2 ~ फल और प्रभाव सहित भक्तियोग का वर्णन  / Bhagwad Geeta Chapter -10

अध्याय दस  (Chapter -10)

भगवद गीता – अध्याय 10  में शलोक 08 से  शलोक 11  तक फल और प्रभाव सहित भक्तियोग  का वर्णन !

अहं    सर्वस्य    प्रभवो    मत्तः   सर्व    प्रवर्तते ।

         इति  मत्वा  भजन्ते  मां  बुधा  भावसमन्विताः ॥ ८ ॥ 

सर्वस्य   –   सबका   ;   प्रभवः   –   उत्पत्ति का कारण    ;    मत्तः   –   मुझसे  ;   सर्वम्  –  सारी वस्तुएँ   ;    अहम्  –  मैं   ;   प्रवर्तते   –  उद्भूत होती है   ;   इति   –  इस प्रकार   ;    मत्वा   – जानकर    ;    भजन्ते   –   भक्ति करते हैं    ;   माम्  –   मेरी   ;   बुधा:   –   विद्वानजन   ;   भाव-समन्विताः    –   अत्यन्त मनोयोग से

मैं समस्त आध्यात्मिक तथा भौतिक जगतों का कारण हूँ , प्रत्येक वस्तु मुझ ही से उद्भूत है । जो बुद्धिमान यह भलीभाँति जानते हैं , वे मेरी प्रेमाभक्ति में लगते हैं तथा हृदय से पूरी तरह मेरी पूजा में तत्पर होते हैं । 

तात्पर्य :- जिस विद्वान ने वेदों का ठीक से अध्ययन किया हो और भगवान् चैतन्य जैसे अधिकारियों से ज्ञान प्राप्त किया हो तथा यह जानता हो कि इन उपदेशों का किस प्रकार उपयोग करना चाहिए , वहीं यह समझ सकता है कि भौतिक तथा आध्यात्मिक जगतों के मूल श्रीकृष्ण ही हैं । इस प्रकार के ज्ञान से वह भगवद्भक्ति में स्थिर हो जाता है ।

वह व्यर्थ की टीकाओं से या मूर्खों के द्वारा कभी पथभ्रष्ट नहीं होता । सारा वैदिक साहित्य स्वीकार करता है कि कृष्ण ही ब्रह्मा , शिव तथा अन्य समस्त देवताओं के स्रोत हैं । अथर्ववेद में ( गोपालतापनी उपनिषद् १.२४ ) कहा गया है- यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्व यो वै वेदांश्च गापयति स्म कृष्णः- प्रारम्भ में कृष्ण ने ब्रह्मा को वेदों का ज्ञान प्रदान किया और उन्होंने भूतकाल में वैदिक ज्ञान का प्रचार किया ।

पुनः नारायण उपनिषद् में ( १ ) कहा गया है – अथ पुरुषो ह वै नारायणोऽकामयत प्रजाः सृजेयेति तब भगवान् ने जीवों की सृष्टि करनी चाही । उपनिषद् में आगे भी कहा गया है – 

नारायणाद् ब्रह्मा जायते नारायणाद् प्रजापतिः प्रजायते नारायणाद् इन्द्रो जायते । नारायणादष्टौ वसवो जायन्ते  नारायणादेकादश रुद्रा जायन्ते नारायणाद्वादशादित्या : – “  नारायण से ब्रह्मा उत्पन्न होते हैं , नारायण से प्रजापति उत्पन्न होते हैं , नारायण से इन्द्र और आठ वसु उत्पन्न होते हैं और नारायण से ही ग्यारह रुद्र तथा बारह आदित्य उत्पन्न होते हैं । ”

यह नारायण कृष्ण के ही अंश हैं । वेदों का ही कथन है- ब्रह्मण्यो देवकीपुत्रः – देवकी पुत्र , कृष्ण , ही भगवान् हैं । ( नारायण उपनिषद् ४ ) । तब यह कहा गया – एको वै नारायण आसीन्न ब्रह्मा न ईशानो नापो नाग्निसमौ नेमे द्यावापृथिवी न नक्षत्राणि न सूर्य : -सृष्टि के प्रारम्भ में केवल भगवान् नारायण थे । न ब्रह्मा थे , न शिव । न अग्नि थी , न चन्द्रमा , न नक्षत्र और न सूर्य ( महा उपनिषद् १ ) ।

महा उपनिषद् में यह भी कहा गया है कि शिवजी परमेश्वर के मस्तक से उत्पन्न हुए । अतः वेदों का कहना है कि ब्रह्मा तथा शिव के स्रष्टा भगवान् की ही पूजा की जानी चाहिए । 

मोक्षधर्म में कृष्ण कहते हैं –

प्रजापतिं   च   रुद्रं    चाप्यहमेव    सृजामि    वै । 

तो  हि  मां  न  विजानीतो  मम  मायाविमोहितौ ॥ 

” मैंने ही प्रजापतियों को , शिव तथा अन्यों को उत्पन्न किया , किन्तु वे मेरी माया से मोहित होने के कारण यह नहीं जानते कि मैंने ही उन्हें उत्पन्न किया । ” 

वराह पुराण में भी कहा गया है —

नारायणः   परो   देवस्तस्माज्जातश्चतुर्मुखः ।

तस्माद्रुद्रोऽभवद्देवः  स  च  सर्वज्ञतां  गतः ॥

“ नारायण भगवान् हैं , जिनसे ब्रह्मा उत्पन्न हुए और फिर ब्रह्मा से शिव उत्पन्न हुए । ” भगवान् कृष्ण समस्त उत्पत्तियों के स्रोत हैं और वे सर्वकारण कहलाते हैं । वे स्वयं कहते हैं , ” चूँकि सारी वस्तुएँ मुझसे उत्पन्न हैं , अतः में सर्वोों का मूल कारण हूँ । सारी वस्तुएँ मेरे अधीन हैं , मेरे ऊपर कोई भी नहीं है । ”

कृष्ण से बढ़कर कोई परम नियन्ता नहीं है । जो व्यक्ति प्रामाणिक गुरु से या वैदिक साहित्य से इस प्रकार कृष्ण को जान लेता है , वह अपनी सारी शक्ति कृष्णभावनामृत में लगाता है और सचमुच विद्वान पुरुष बन जाता है । उसकी तुलना में अन्य सारे लोग , जो कृष्ण को ठीक से नहीं जानते , मात्र मूर्ख सिद्ध होते हैं । केवल मूर्ख ही कृष्ण को सामान्य व्यक्ति समझेगा ।

कृष्णभावनाभावित व्यक्ति को चाहिए कि कभी मूर्खों द्वारा मोहित न हो , उसे भगवद्गीता की समस्त अप्रामाणिक टीकाओं एवं व्याख्याओं से दूर रहना चाहिए और दृढतापूर्वक कृष्णभावनामृत में अग्रसर होना चाहिए । 

मचित्ता    मद्गतप्राणा    बोधयन्तः    परस्परम् । 

      कथयन्तश्च  मां  नित्यं  तुष्यन्ति  च  रमन्ति  च ॥ ९ ॥ 

मत्-चित्ता:   –   जिनके मन मुझमें रमे हैं    ;   मत्-गत-प्राणा:    –   जिनके जीवन मुझ में अर्पित हैं   ;   बोधयन्तः   –   उपदेश देते हुए   ;   परस्परम्   –  एक दूसरे से आपस में   ;   कथयन्त:   –  बातें करते हुए   ;    च   –  भी   ;  माम्  –  मेरे विषय में   ;   नित्यम्   –  निरन्तर   ;   तुष्यन्ति  –  प्रसन्न होते हैं   ;   च   –  भी   ;   रमन्ति   –  दिव्य आनन्द भोगते हैं    ;   च  –  भी । 

मेरे शुद्धभक्तों के विचार मुझमें वास करते हैं , उनके जीवन मेरी सेवा में अर्पित रहते हैं और वे एक दूसरे को ज्ञान प्रदान करते तथा मेरे विषय में बातें करते हुए परम सन्तोष तथा आनन्द का अनुभव करते हैं । 

तात्पर्य :- यहाँ जिन शुद्ध भक्तों के लक्षणों का उल्लेख हुआ है , वे निरन्तर भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति में रमे रहते हैं । उनके मन कृष्ण के चरणकमलों से हटते नहीं । वे दिव्य विषयों की ही चर्चा चलाते हैं । इस श्लोक में शुद्ध भक्तों के लक्षणों का विशेष रूप से उल्लेख हुआ है । भगवद्भक्त परमेश्वर के गुणों तथा उनकी लीलाओं के गान में अहर्निश लगे रहते हैं ।

उनके हृदय तथा आत्माएँ निरन्तर कृष्ण में निमग्न रहती हैं और वे अन्य भक्तों से भगवान् के विषय में बातें करने में आनन्दानुभव करते हैं । भक्ति की प्रारम्भिक अवस्था में वे सेवा में ही दिव्य आनन्द उठाते हैं और परिपक्वावस्था में वे ईश्वर प्रेम को प्राप्त होते हैं । जब वे इस दिव्य स्थिति को प्राप्त कर लेते हैं , तब वे उस सर्वोच्च सिद्धि का स्वाद लेते हैं , जो भगवद्धाम में प्राप्त होती है ।

भगवान् चैतन्य दिव्य भक्ति की तुलना जीव के हृदय में बीज बोने से करते हैं । ब्रह्माण्ड के विभिन्न लोकों में असंख्य जीव विचरण करते रहते हैं । इनमें से कुछ ही भाग्यशाली होते हैं , जिनकी शुद्धभक्त से भेंट हो पाती है और जिन्हें भक्ति समझने का अवसर प्राप्त हो पाता है । यह भक्ति वीज के सदृश है ।

यदि इसे जीव के हृदय में वो दिया जाये और जीव हरे कृष्ण मन्त्र का श्रवण तथा कीर्तन करता रहे तो वीज अंकुरित होता है , जिस प्रकार कि नियमतः सींचते रहने से वृक्ष का बीज फलता है । भक्ति रूपी आध्यात्मिक पौधा क्रमशः बढ़ता रहता है , जब तक यह ब्रह्माण्ड के आवरण को भेदकर ब्रह्मज्योति में प्रवेश नहीं कर जाता ।

ब्रह्मज्योति में भी यह पौधा तब तक बढ़ता जाता है , जब तक उस उच्चतम लोक को नहीं प्राप्त कर लेता , जिसे गोलोक वृन्दावन या कृष्ण का परमधाम कहते हैं । अन्ततोगत्वा यह पौधा भगवान् के चरणकमलों की शरण प्राप्त कर वहीं विश्राम पाता है । जिस प्रकार पौधे में क्रम से फूल तथा फल आते हैं , उसी प्रकार भक्तिरूपी पौधे में भी फल आते हैं और कीर्तन तथा श्रवण के रूप में उसका सिंचन चलता रहता है ।

चैतन्य चरितामृत में ( मध्य लीला , अध्याय १ ९ ) भक्तिरूपी पौधे का विस्तार से वर्णन हुआ है । वहाँ यह बताया गया है कि जब पूर्ण पौधा भगवान् के चरणकमलों की शरण ग्रहण कर लेता है तो मनुष्य पूर्णतया भगवत्प्रेम में लीन हो जाता है , तब वह एक क्षण भी परमेश्वर के विना नहीं रह पाता , जिस प्रकार कि मछली जल के बिना नहीं रह सकती ।

ऐसी अवस्था में भक्त वास्तव में परमेश्वर के संसर्ग से दिव्यगुण • प्राप्त कर लेता है । श्रीमद्भागवत में भी भगवान् तथा उनके भक्तों के सम्बन्ध के विषय में ऐसी अनेक कथाएँ हैं । इसीलिए श्रीमद्भागवत भक्तों को अत्यन्त प्रिय है जैसा कि भागवत में ही ( १२.१३.१८ ) कहा गया है- श्रीमद्भागवतं पुराणं अमलं यद्वैष्णवानां प्रियम् । ऐसी कथा में भौतिक कार्यों , आर्थिक विकास , इन्द्रियतृप्ति या मोक्ष के विषय में कुछ भी नहीं है ।

श्रीमद्भागवत ही एकमात्र ऐसी कथा है , जिसमें भगवान् तथा उनके भक्तों की दिव्य प्रकृति का पूर्ण वर्णन मिलता है । फलतः कृष्णभावनाभावित जीव ऐसे दिव्य साहित्य के श्रवण में दिव्य रुचि दिखाते हैं , जिस प्रकार तरुण तथा तरुणी को परस्पर मिलने में आनन्द प्राप्त होता है । 

तेषां  सततयुक्तानां  भजतां   प्रीतिपूर्वकम् । 

         ददामि  बुद्धियोगं  तं  येन  मामुपयान्ति  ते ॥ १० ॥ 

तेषाम्   –  उन   ;   सतत-युक्तानाम्   –    सदैव लीन रहने वालों को   ;   भजताम्   –   भक्ति करने वालों को   ;    प्रीति-पूर्वकम्   –   प्रेमभाव सहित  ;   ददामि    –  देता हूँ   ;   बुद्धि-योगम्   –   असली बुद्धि   ;    तम्  –  वह   ;   येन   –   जिससे   ;   माम्   –   मुझको   ;   उपयान्ति  –  प्राप्त होते हैं   ;   ते   –   वे । 

जो प्रेमपूर्वक मेरी सेवा करने में निरन्तर लगे रहते हैं , उन्हें मैं ज्ञान प्रदान करता हूँ , जिसके द्वारा वे मुझ तक आ सकते हैं । 

तात्पर्य :- इस श्लोक में बुद्धि – योगम् शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है । हमें स्मरण हो कि द्वितीय अध्याय में भगवान् ने अर्जुन को उपदेश देते हुए कहा था कि मैं तुम्हें अनेक विषयों के बारे में बता चुका हूँ और अब मैं तुम्हें बुद्धियोग की शिक्षा दूंगा । अब उसी बुद्धियोग की व्याख्या की जा रही है ।

बुद्धियोग कृष्णभावनामृत में रहकर कार्य करने को कहते हैं और यही उत्तम बुद्धि है । बुद्धि का अर्थ है बुद्धि और योग का अर्थ है यौगिक गतिविधियाँ अथवा यौगिक उन्नति । जब कोई भगवद्धाम को जाना चाहता है और भक्ति में वह कृष्णभावनामृत को ग्रहण कर लेता है , तो उसका यह कार्य बुद्धियोग कहलाता है । दूसरे शब्दों में , बुद्धियोग वह विधि हैं , जिससे मनुष्य भवबन्धन से छूटना चाहता है । उन्नति करने का चरम लक्ष्य कृष्णप्राप्ति है ।

लोग इसे नहीं जानते , अतः भक्तों तथा प्रामाणिक गुरु की संगति आवश्यक है । मनुष्य को ज्ञात होना चाहिए कि कृष्ण ही लक्ष्य हैं और जब लक्ष्य निर्दिष्ट है , तो पथ पर मन्दगति से प्रगति करने पर भी अन्तिम लक्ष्य प्राप्त हो जाता है । जब मनुष्य लक्ष्य तो जानता है , किन्तु कर्मफल में लिप्त रहता है , तो वह कर्मयोगी होता है ।

यह जानते हुए कि लक्ष्य कृष्ण हैं , जब कोई कृष्ण को समझने के लिए मानसिक चिन्तन का सहारा लेता है , तो वह ज्ञानयोग में लीन होता है । किन्तु जब वह लक्ष्य को जानकर कृष्णभावनामृत तथा भक्ति में कृष्ण की खोज करता है , तो वह भक्तियोगी या बुद्धियोगी होता है और यही पूर्णयोग है । यह पूर्णयोग ही जीवन की सिद्धावस्था है ।

जब व्यक्ति प्रामाणिक गुरु के होते हुए तथा आध्यात्मिक संघ से सम्बद्ध रहकर भी प्रगति नहीं कर पाता , क्योंकि वह बुद्धिमान नहीं है , तो कृष्ण उसके अन्तर से उपदेश देते हैं , जिससे वह सरलता से उन तक पहुँच सके । इसके लिए जिस योग्यता की अपेक्षा है , वह यह है कि कृष्णभावनामृत में निरन्तर रहकर प्रेम तथा भक्ति के साथ सभी प्रकार की सेवा की जाए ।

उसे कृष्ण के लिए कुछ न कुछ कार्य करते रहना चाहिए , किन्तु प्रेमपूर्वक । यदि भक्त इतना बुद्धिमान नहीं है कि आत्म – साक्षात्कार के पथ पर प्रगति कर सके , किन्तु यदि वह एकनिष्ठ रहकर भक्तिकार्यों में रत रहता है , तो भगवान् उसे अवसर देते हैं कि वह उन्नति करके अन्त में उनके पास पहुँच जाये । 

तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं               तमः । 

      नाशयाम्यात्मभावस्थो   ज्ञानदीपेन  भास्वता ॥ ११ ॥ 

तेषाम्   –   उन पर   ;   एव   –   निश्चय ही   ;   अनुकम्पा-अर्थम्   –   विशेष कृपा करने के लिए   ;  अहम्   –   मैं   ;    अज्ञान-जम्    –   अज्ञान के कारण    ;    तमः   –  अंधकार    ;    नाशयामि   –  दूर करता हूँ    ;   आत्म-भाव   –    उनके हृदयों में   ;    स्थ:   –   स्थित  ;    ज्ञान   –   ज्ञान के  ;   दीपेन   –   दीपक द्वारा  ;    भास्वता   –   प्रकाशमान हुए

मैं उन पर विशेष कृपा करने के हेतु उनके हृदयों में वास करते हुए ज्ञान के प्रकाशमान दीपक के द्वारा अज्ञानजन्य अंधकार को दूर करता हूँ ।

तात्पर्य :- जब भगवान् चैतन्य बनारस में हरे कृष्ण महामन्त्र के कीर्तन का प्रवर्तन कर रहे थे , तो हजारों लोग उनका अनुसरण कर रहे थे । तत्कालीन बनारस के अत्यन्त प्रभावशाली एवं विद्वान प्रकाशानन्द सरस्वती उनको भावुक कहकर उनका उपहास करते थे । कभी – कभी भक्तों की आलोचना दार्शनिक यह सोचकर करते हैं कि भक्तगण अंधकार में हैं और दार्शनिक दृष्टि से भोले – भाले भावुक हैं , किन्तु यह तथ्य नहीं है ।

ऐसे अनेक बड़े – बड़े विद्वान पुरुष हैं , जिन्होंने भक्ति का दर्शन प्रस्तुत किया है । किन्तु यदि कोई भक्त उनके इस साहित्य का या अपने गुरु का लाभ न भी उठाये और यदि वह अपनी भक्ति में एकनिष्ठ रहे , तो उसके अन्तर से कृष्ण स्वयं उसकी सहायता करते हैं । अतः कृष्णभावनामृत में रत एकनिष्ठ भक्त ज्ञानरहित नहीं हो सकता ।

इसके लिए इतनी ही योग्यता चाहिए कि वह पूर्ण कृष्णभावनामृत में रहकर भक्ति सम्पन्न करता रहे । आधुनिक दार्शनिकों का विचार है कि बिना विवेक के शुद्ध ज्ञान प्राप्त नहीं किया जा सकता । उनके लिए भगवान् का उत्तर है – जो लोग शुद्धभक्ति में रत हैं , भले ही वे पर्याप्त शिक्षित न हों तथा वैदिक नियमों से पूर्णतया अवगत न हों , किन्तु भगवान् उनकी सहायता करते ही हैं , जैसा कि इस श्लोक में बताया गया है ।

भगवान् अर्जुन को बताते हैं कि मात्र चिन्तन से परम सत्य भगवान् को समझ पाना असम्भव है , क्योंकि भगवान् इतने महान हैं कि कोरे मानसिक प्रयास से उन्हें न तो जाना जा सकता है , न ही प्राप्त किया जा सकता है । भले ही कोई लाखों वर्षों तक चिन्तन करता रहे , किन्तु यदि भक्ति नहीं करता , यदि वह परम सत्य का प्रेमी नहीं है , तो उसे कभी भी कृष्ण या परम सत्य समझ में नहीं आएँगे ।

परम सत्य , कृष्ण , केवल भक्ति से प्रसन्न होते हैं और अपनी अचिन्त्य शक्ति से वे शुद्ध भक्त के हृदय में स्वयं प्रकट हो सकते हैं । शुद्धभक्त के हृदय में तो कृष्ण निरन्तर रहते हैं और कृष्ण की उपस्थिति सूर्य के समान है , जिसके द्वारा अज्ञान का अंधकार तुरन्त दूर हो जाता है ।

शुद्धभक्त पर भगवान् की यही विशेष कृपा है । करोड़ों जन्मों के भौतिक संसर्ग के कल्मष के कारण मनुष्य का हृदय भौतिकता के मल ( धूलि ) से आच्छादित हो जाता है , किन्तु जब मनुष्य भक्ति में लगता है और निरन्तर हरे कृष्ण का जप करता है तो यह मल तुरन्त दूर हो जाता है और उसे शुद्ध ज्ञान प्राप्त होता है ।

परम लक्ष्य विष्णु को इसी जप तथा भक्ति से प्राप्त किया जा सकता है , अन्य किसी प्रकार के मनोधर्म या तर्क द्वारा नहीं । शुद्ध भक्त जीवन की भौतिक आवश्यकताओं के लिए चिन्ता नहीं करता है , न तो उसे कोई और चिन्ता करने की आवश्यकता है , क्योंकि हृदय से अंधकार हट जाने पर भक्त की प्रेमाभक्ति से प्रसन्न होकर भगवान् स्वतः सब कुछ प्रदान करते हैं ।

यही भगवद्गीता का उपदेश – सार है । भगवद्गीता के अध्ययन से मनुष्य भगवान् के शरणागत होकर शुद्धभक्ति में लग जाता है । जैसे ही भगवान् अपने ऊपर भार ले लेते हैं , मनुष्य सारे भौतिक प्रयासों से मुक्त हो जाता है ।

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